मदरसों को मुख्य धारा में लाए जाने की आवश्यकता

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क्या राज्य द्वारा संचालित मदरसों को बंद कर सामान्य स्कूलों की तरह बनाया जाना चाहिए? जैसा कि असम सरकार ने प्रस्ताव किया है। क्या मुस्लिम विद्वानों और शिक्षाविदों को पूरे देश के मदरसों में आधुनिक शिक्षा देने के लिए एक रूपरेखा बनानी चाहिए? केन्द्र ने एक बार अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, कुछ भारतीय प्रबंधन संस्थानों और जामिया मिलिया इस्लामिया से बातचीत की थी कि मदरसा अध्यापकों के लिए कार्यकारी विकास कार्यकम शुरू किया जाए। इस विषय पर सही परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाना चाहिए।

मदरसों ने इस्लामिक सभ्यता के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। उन्होंने न्यायशास्त्र, दर्शन, खगोल शास्त्र, विज्ञान, साहित्य और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में क्रांतिकारी उपलब्धियां प्राप्त की हैं। इस्लाम के स्वर्णिय युग का पतन शुरू होने के साथ मदरसों ने अपनी शैक्षणिक और बौद्धिक शुद्धता को खो दिया और पश्चिम आधारित शिक्षा को स्थान दिया। इस्लामिक इतिहास में मदरसे धार्मिक और वैज्ञानिक शिक्षा के रूप रहे हैं जैसा कि यूरोप में चर्चों द्वारा संचालित स्कूल और विश्वविद्यालय रहे हैं। वे इस्लाम की बौद्धिक परंपरा के केन्द्र रहे हैं और उन्होंने विश्व में इस्लामिक शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मदरसों के आधुनिकीकरण के समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उनकी परंपरागत सांस्कृतिक सोच को समाप्त नहीं किया जाए।

हम एक ऐसे संक्रमणकालीन दौर में हैं जहां पर मदरसे इस संबंध में पहल कर रहे हैं हालांकि यह पहल धीमी है और वे शिक्षण पद्वति और पाठ्यक्रम में सुधार करने का प्रयास कर रहे हैं। मदरसे आधुनिक स्कूलों को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते हैं। किंतु जो लोग अपने बच्चों को आधुनिक स्कूलों में नहीं भेज सकते हैं उनके पास मदरसे एकमात्र विकल्प होते है। मदरसों के अभाव में इस वर्ग में अशिक्षा और फैलने का डर है। माता-पिता को भी यह समझना होगा यदि वे इन बच्चों के पालन-पोषण के लिए वित्तीय संसाधनों को वहन नहीं कर सकते हैं तो उन्हें अपने परिवारों का आकार उस अनुकूल बनाए रखना होगा। मदरसों को अनाथ आश्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

वर्तमान में मदरसों के पाठ्यक्रम का पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मानकीकरण किया गया है और यह कार्य लगभग दो सदी पूर्व 18वीं सदी के विद्वान मुल्ला निजामुददीन सेहलवी ने किया था। इसलिए इनके पाठ्यकम को दर्श-ए-निजामी कहा जाता है। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल, ओडिशा और बिहार प्रांत में समा्रट शाह आलम से राजस्व एकत्र करने का अधिकार खरीदा था तो इस खरीद समझौत में एक शर्त यह भी थी कि ब्रिटिश कंपनी इन प्रांतों में कानूनी और प्रशासनिक प्रणालियों को नहीं बदलेगी। इन प्रणालियों को संचालित करने के लिए न्यायधीशों और प्रशासकों को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कंपनी ने इन मदरसों के लिए एक पाठ्यकम विकसित किया ताकि वे इन स्कूलों से संभावित कर्मचारियों को लें।

यह बदलाव हनफी मुस्लिम कानूनों के अंतर्गत किया गया। यह पाठ्यकम मूल दर्श-ए-निजामी के अनुरूप था जिसे अबु अली हसन बिन अली ने तैयार किया था जिसे निजाम-ए-मुल्क कहा जाता था। उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए लगभग छह दशक पूर्व उन्होंने सजदिक सुल्तानों के प्रधानमंत्री की नियुक्ति की। इन संस्थानों को निजामिया कहा गया और उनके पाठ्यक्रम को दर्श-ए-निजामिया या दर्श-ए-निजामी कहा गया। किंतु दक्षिण एशिया पर अंग्रेजों के आधिपत्य के बाद परंपरागत मदरसों को नजरंदाज किया जाने लगा और शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव आने लगा। ईस्ट इंडिया कंपनी के कारण 1930 में शासकीय पत्र व्यवहार में फारसी भाषा का स्थान अंग्रेजी ने लिया और मिशनरी अंग्रेजी भाषा के स्कूल बनने लगे जो धार्मिक स्कूलों के विकल्प बने। सबसे बडा बदलाव 1857 की क्रांति के बाद आया।

उसके बाद भारत में देवबंद में दारूल उलूमा मदरसा की स्थापना हुई उसके बाद लखनऊ में दारूल-उलूम-नदवतुल की 1898 में और 1904 में बरेली में जामिया रिजविया मंजर-ए-इस्लाम की स्थापना की गयी। मदरसों में भी बदलाव और सुधार की आवश्यकता है। कुछ उलेमा दावा करते हैं कि वे उनकी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट हैं। वस्तुत: अधिकतर प्रमुख उलेमा मदरसा प्रणाली में बदलाव के प्रति सजग हैं। उनके छात्र जब भारत और विदेशों में रोजगार के लिए जाते हंैं तो वे महसूस करते हैं कि इस शिक्षा प्रणाली में बदलाव की आवश्यकता है। इसके अलावा मुस्लिम समुदाय, राज्य और मीडिया की ओर से मदरसा शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग उठने लगी है। मदरसों में भी बदलाव आ रहा है। यह बदलाव क्रमिक है और यह बदलाव समुचित इस्लामिक शिक्षा के अनुरूप है। परंपरागतवादियों का मानना है कि मदरसों का उद्देश्य आधुनिक स्कूलों से अलग है।

आलोचक अनेक मदरसा छात्रों में नैतिक मानदंडों में गिरावट की भी बातें करते हैं। यहां तक कि परपंरागत रूप से शिक्षित धार्मिक विद्वान भी मदरसों के अनेक पहलुओं की आलोचना करते हैं। मदरसों के पाठ्यक्रम में अंग्रेजी गणित और विज्ञान को शामिल करने से छात्र विश्व की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे और उनमें व्यापक सोच विकसित करवा सकेंगे। केवल प्रौद्योगिकी तक पहुंच से किसी व्यक्ति में प्रगतिशील और उदारवादी दृष्टिकोण विकसित नहीं हो सकता है। ये विषय केवल साधन हंै। सोच यह परिभाषित करती है कि इन साधनों का किस तरह उपयोग किया जाए। जब हम बहुलवादी समाज में रहते हैं तो यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हमें अन्य धर्मों की बुनियादी जानकारी हो।

इस बारे में लोगों में आम सहमति है कि मदरसों में बदलते समय के अनुसार बदलाव लाया जाए। उन्हें अपने वैश्विक विचारों को व्यापक बनाना होगा और बदलती दुनिया के बारे में अपने विचारों में बदलाव लाना होगा। सांस्कृतिक अलगाव से अस्थिरता ही आ सकती है। इस दिशा में सही दृष्टिकोण यह होगा कि प्राचीन और परंपरागत शिक्षा पद्वति को उदार विचारों से जोडा जाए। इससे एक ऐसी संस्कृति का निर्माण होगा जिसमें दो शिक्षा प्रणालियों के बीच आदान-प्रदान होगा। इससे इन मदरसे के छात्रों को अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने और आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने में सहायता मिलेगी। इससे इन छात्रों को अपना और अपने समुदाय का भविष्य बनाने में हितधारक बनने में सहायता मिलेगी। किसी भी समाज के लिए प्रभुत्व और उत्पादक मानव पूंजी सर्वाधिक बहुमूय संपत्ति है और मदरसा इस बहुमूल्य संपति को उपलब्ध करा सकते हैं। आधुनिक विषयों से छात्रों को धर्मनिरपेक्ष विषयों और तकनीकी कौशल सीखने में भी सहायता मिलेगी ताकि वे बढते प्रतिस्पर्धी और वैश्विक कार्य वातावरण में पिछड न जाएं।

                                                                                                                   -मोइन काजी

 

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