सम्पादकीय

राजनीतिक नूरा कुश्तियां

Lok Sabha, Elections

राजनीति गंभीर विषय है जिसमें हर बात को सोच-समझकर व जिम्मेदारी से कहा जाता है। फिर भी राजनीति में नेताओं के एक दूसरे पर फिकरे, मजाक की नूरा कुश्ती के दौर चलते रहते हैं। तेज तर्रार नेता कई बार ऐसे तौर तरीकों को अपनाते हैं जो अपने आप में हंसी के पात्र बनते हैं, ऐसे तरीके अजमाने वाले को खुद को ही चित्त कर देते हैं। लोक सभा चुनाव के संबंध में कुछ ऐसी ही मजाकिया व खिसयानी बातें भी सामने आई हैं। पहले बात करते हैं लोक सभा क्षेत्र अमृतसर की, जहां से कांग्रेस के मौजूदा एमपी गुरजीत सिंह औजला के पार्टी विरोधियों ने उनकी टिकट कटवाने के लिए एक नया फार्मूला निकाला। औजला विरोधी पक्ष पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के पास इस बात की मांग लेकर पहुंचा कि दो बार प्रधानमंत्री रह चुके डॉ. मनमोहन सिंह को अमृतसर से टिकट दिया जाए। जबकि यह बात सभी जानते हैं कि डॉ. सिंह का स्वास्थ्य और आयु के लिहाज से यह संभव नहीं था फिर मनमोहन सिंह दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं वह यूं भी अब सक्रिय राजनीति के प्रति अनिच्छुक हैं, औजला के विरोधी अब अपना सा मुंह लेकर बैठे हुए हैं।

औजला कांग्रेस पार्टी के मौजूदा सांसद है, स्पष्ट है उनकी जगह पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम की चर्चा शुरू करना औजला विरोधियों की ईर्ष्या से अधिक कुछ नहीं। राजनीति को अपनी बपौती समझने का एक और नमूना सुखपाल सिंह खैहरा ने भी छोड़ा है। उन्होंने नवजोत कौर सिद्धू को चंडीगढ़ से अपनी पार्टी का टिकट देने की पेशकश कर दी। जबकि चर्चा है कि खैहरा की पार्टी को अभी तक चुनाव चिन्ह् भी नहीं मिला।

खैहरा की पंजाबी एकता पार्टी की चंडीगढ़ में कोई ईकाई भी नहीं है। एक और नूरा कुश्ती हुई, पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह को बठिंडा हलके से चुनाव लड़ने का सुझाव दिया जो शायद उनकी मुख्यमंत्री प्रति नाराजगी को व्यक्त करता है। अमरिन्दर सिंह बठिंडा सीट के लिए भले ही मजबूत नेता क्यों न हों, लेकिन एक मुख्यमंत्री तौर पर पार्टी के पास अभी उनके सिवा कोई और नेता नहीं है।

यूं भी भाजपा में रहते हुए पार्टी से नाराज रहने वाली सिद्धू जोड़ी को कांग्रेस की प्रदेश इकाई में कोई भाव भी नहीं मिल रहा। पिछली बार अमृतसर से भाजपा ने नवजोत सिद्धू की टिकट काटी थी और अब कांग्रेस से चंडीगढ़ में नवजोत कौर सिद्धू टिकट नहीं ले सकी। नाराजगी व हिसाब बराबर करने के ये राजनीतिक तौर-तरीके यही दर्शाते हैं कि नेताओं के निजी स्वार्थ व ईर्ष्या के सामने पार्टियों के सिद्धांत व जनभावनाएं कोई मायने नहीं रखते और ये हैं कि नूरा कुश्ती से बाज नहीं आते।

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