लोक अदालतों से कम होगा मुकदमों का अंबार

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यह वास्तव में चिंतनीय है कि देश की अदालतों में करीब एक हजार मामलें आधी शताब्दी यानी की 50 साल से लंबित चल रहे है तो करीब दो लाख मामलें एक चैथाई सदी यानी की 25 साल से लंबित हैं। पिछले दिनों गुवाहाटी में आयोजित एक समारोह को संबोधित करते देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने अदालतों में लंबित प्रकरणों की चर्चा करते हुए गहरी चिंता व्यक्त की और प्रकरणों के शीघ्र निस्तारण के लिए रोडमेप का खाखा भी खींचा। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में निचली अदालत से लेकर शीर्ष अदालत तक करीब साढ़े तीन करोड़ मामलें लंबित है। इनमें से करीब 55 हजार मामले सर्वोच्च न्यायालय में तो 32 लाख से अधिक मामले देश के 24 हाईकोर्टों में लंबित चल रहे हैं। करीब करीब पौने तीन करोड़ मामले देश की निचली अदालतों में विचाराधीन हैं। यह अपने आप में बहुत बहुत बड़ी संख्या है तो हमारी न्याय व्यवस्था के लिए चिंतनीय भी। हांलाकि अब सर्वोच्च न्यायालय में पहलीबार 34 न्यायाधीश हो गए हैं। स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में प्रतिदिन 10 पुराने मामलों को सुनवाई के लिए विशेष बैंच के सामने रखने के निर्देश दिए हैं।

अभी पिछले दिनों ही केन्द्र सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि देश की अदालतों में साढ़े तीन करोड़ से अधिक मामलें लंबित चल रहे हैं। नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के ताजातरीन आंकड़ों के अनुसार देश की अधीनस्थ अदालतों में 3 करोड़ 12 लाख से अधिक प्रकरण विचाराधीन चल रहे हैं। इनमें 3 लाख 86 हजार मुकदमें तो 20 से 30 साल पुराने हैं। यही कारण कि पिछले साल देश की सर्वोच्च अदालत ने केन्द्र सरकार से उच्च न्यायालयों में 93 और अधीनस्थ न्यायालयों में 2773 न्यायाधीशों के पद सृजन करने का आग्रह किया है। आज देश भर के न्यायालयों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। जॉली एलएलबी 2 के अंतिम दृश्य में माननीय न्यायाधीश द्वारा यह कहना कि लोगों का आज भी न्यायपालिका पर विश्वास है। इनमें से कई मुकदमें इस प्रकृति के भी हैं कि जिनका निस्तारण आपसी समझाइश व सरकार के सकारात्मक रुख से आसानी से हो सकता है।

हांलाकि पिछले कुछ सालों से लोक अदालतें आयोजित कर मुकदमों के अंबार को कम करने के सकारात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। लोकअदालत की अच्छी बात यह भी है कि इसमें निस्तारित मुकदमों की अपील नहीं की जा सकती, इससे बड़ी राहत मिलती है नहीं तो अपील दर अपील मुकदमें एक अदालत से दूसरी अदालत तक चलते ही रहते हैं और अंतिम निस्तारण की स्थिति आती ही नहीं। दशकों तक वाद का निस्तारण नहीं होने से वादी भी निरुत्साहित और ठगा हुआ महसूस करता है। हांलाकि मुकदमों के अंबार को कम करने की दिशा में ठोस प्रयास निरतंर जारी है। कम्प्यूटरीकरण के माध्यम से मुकदमों की स्थिति, वाद की तारीख और अन्य जानकारी मुहैया कराई जाने लगी है।

हमारे देश में 14 हजार के लगभग निचली अदालतें कार्यरत हैं। इसी तरह से 24 हाईकोर्ट और इनकी 300 बैंच सेवाएं दे रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न बैंचों में अब 34 न्यायाधीपतियों द्वारा मुकदमों का निस्तारण किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय देश में लंबित मुकदमों के प्रति काफी गंभीर है। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पुराने मामलों को प्राथमिकता से निस्तारित करने के निर्देश दिए हैं तो पांच साल से पुराने मामलों की सूची तैयार कर इन्हें शीघ्र निस्तारित करने को कहा है। लाखों मामलें जहां समझाइश से निपटाए जा सकते हैं या एक ही पेशी में निस्तारित करने की सिथति में होते हैं जैसे यातायात नियमों का उल्लंघन या मामूली कहासुनी या कुछ इसी तरह के अन्य मामलें जो लाखों की संख्या में हैं पर जिनका फैसला बिना अगली तारीख दिए हो सकता है।

सबसे चिंतनीय यह है कि अदालतों में करीब 90 लाख मामले दीवानी प्रकृति के हैं और इनमें से एक मोटे अनुमान के अनुसार 20 लाख मामलों में तो सम्मन तक जारी नहीं हुए है। इसके अलावा बहुत से मामले ऐसे भी हैं जिनकी सुनवाई होते होते सजा की अवधि तक पूरी हो चुकी है पर अपील आज तक लंबित चल रही है। ऐसे मामलोें को सीधे बहस में लेकर निपटाया जा सकता है। हांलाकि जिस तरह से अदालतों में अब कम्प्यूटरीकरण के बाद आॅनलाइन व्यवस्थाएं होने लगी हैं उससे मानवीय श्रम की बचत होने लगी है। निश्चित रुप से इससे काम का अनावश्यक दबाव भी कम होगा। पिछले दिनों में जिस तरह से अनावश्यक पीएलआई के प्रति न्यायालय गंभीर हुए हैं और अनावश्यक दावों के प्रति सख्ती का रुख अपनाना आरंभ किया है उससे नई आशा का संचार हुआ है। ऐसे में आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में न्यायालयों में मुकदामों के अंबार में कमी आएगी।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

 

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