जजों की गुंडई-भ्रष्टाचार से बदनाम होती है न्यायपालिका

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Infamous Judiciary

पंच को परमेश्वर कहा जाता है। पंच को परमेश्वर क्यों कहा जाता है? इसलिए पंच को परमेश्वर कहा जाता है कि उनमें निष्पक्षता होती है, उनमें ईमानदारी होती है, वे लाभ-हानि से ऊपर होते हैं, उनका आचरण भी सर्वश्रेष्ठ होता है, प्रेरक होता है, विश्वसनीयता भी होती है। पंच परमेश्वर  का आधुनिक रूप न्यायपालिका है। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका तीन अंग संविधान के हैं। इनमें न्यायपालिका के उपर संविधान की रक्षा करने के साथ ही साथ न्याय करने की भी जिम्मेदारी है।

न्याय करने की जिम्मेदारी न्यायपालिका ने सर्वश्रेष्ठ स्तर पर निभायी है, न्यायपालिका ने प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को अपने न्याय से दंडित करने का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि न्यायपालिका पर देशवासियों का सर्वाधिक विश्वास है, न्यायपालिका को आम जनता सर्वाधिक विश्वास की नजर से देखती है। जनता का जो अधिकार संसद और विधान सभाएं, कार्यपालिकाएं वंचित कर बैठी रहती हैं या फिर हनन कर बैठ जाती हैं, उस अधिकार को न्यायपालिका अपने फैसले से जनता को उपलब्ध करा देती हैं।

कार्यपालिका भी न्यायपालिका के फैसले को लागू करने के लिए बाध्य होती हैं। अगर यह कहें कि कार्यपालिका आज न्ययपालिका के फैसले से डरती है तो कोई गलत बात नहीं होगी। न्यायपालिका के पास अवमानना का अधिकार भी है। अगर कोई संस्थान या फिर कोई व्यक्ति न्यायपालिका के फैसले को लागू करने में उदासीन होते हैं, पैंतरेबाजी दिखाते हैं, टालते हैं तो फिर न्यायपालिका वैसे व्यक्ति या फिर वैसे संस्थानों को अवमानना का दोषी मान बैठती है। अवमानना की सजा सिर्फ जेल होती है।

अवमानना का दोषी बनने से बचने के लिए एक साधारण व्यक्ति से लेकर कार्यपालिका के सर्वश्रेष्ठ पद पर बैठे व्यक्ति भी कोशिश करते हैं। देश में बड़े-बड़े जो बदलाव हुए हैं उनमें न्यायपालिका के फैसले की अहम भूमिका रही है। पर अब न्यायपालिका की भी छवि धूमिल होने लगी है, न्यायपालिका पर भी आंच आने लगी है, न्यायपालिका पर भी भ्रष्टचार, कदाचार और अमान्य प्रवृतियां अपनाने के आरोप लगने लगे हैं। आम धारणा भी यही बन रही है कि कार्यपालिका और विधायिका की तरह न्यायपालिका भी अब स्वच्छ नही रही, निष्पक्ष नहीं रही, भ्रष्टचार मुक्त नहीं रही। आखिर ऐसी अवधारणा बनी क्यों? क्या ऐसी अवधारणाएं सही हैं या फिर सिर्फ मात्र कल्पना है? वास्तव में ऐसी अवधारणाएं कोई रातों-रात नहीं बनी है।

न्यायपालिका क्षेत्र में न्यायधीशों के अमान्य आचरण, कदाचार और भ्रष्टचार की खबरें आती रहती हैं। कभी-कभी तो न्यायधीशों से जुड़ी ऐसी खबरें होती हैं, जो न केवल आश्चर्य में डालती हैं, बल्कि यह सोचने के लिए बाध्य करती हंै कि आखिर ऐसे न्यायधीशों का चयन क्यों होता है और ऐसे न्यायधीशों को नियंत्रित करने के लिए चाकचौबंद व्यवस्थाएं क्यों नहीं बन पाती हैं? अभी-अभी एक न्यायधीश की गुंडई ने तो न्यायपालिका की छवि को और भी धूमिल किया है।

झारखंड राज्य के पलामू जिला के एक न्यायधीश ने एक विवाद में पहले पुलिस को बुलाया और पुलिस की उपस्थिति में पलामू बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सचिदानंद तिवारी को न केवल कॉलर पकड़ लिया बल्कि उसकी पिटाई भी कर डाली। पीड़ित व्यक्ति का कहना है कि उक्त जिला न्यायधीश ने पुलिस की उपस्थिति में उसे भद्दी-भद्दी गालियां भी बकी हैं। यह घटना झारखंड में बड़ी चर्चित हुई है। झारखंड बार एसोसिएशन ने इस घटना के खिलाफ पूरे राज्य में आंदोलन भी किया है, हड़ताल भी किया। पीड़ित व्यक्ति ने उक्त न्यायधीश के खिलाफ थाने में एफआईआर भी दर्ज करा दिया है। झारखंड हाईकोर्ट ने पूरी घटना की आंतरिक जांच बैठायी है। जांच रिपोर्ट कुछ भी आ सकती है। पर एक न्यायधीश के अस्वीकार आचरण के कारण पूरे न्यायपालिका की छवि जरूर खराब हुई है।

पटना हाईकोर्ट के जज राकेश कुमार कुछ दिन पूर्व ही यह कह कर तहलका मचा दिया था कि न्यायपालिका में ऐसे जज भरे पड़े हैं, जो अपराधियों और बईमानों के साथ ही साथ भ्रष्टाचारियों से भी मिले हुए होते हैं, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने इतना तक कह डाला था कि ऐसे न्यायधीश हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं डरते हैं, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और निर्देशों को धता बताते हुए अपराधियों, भ्रष्टाचारियों को जमानत दे देते हैं।

न्यायपालिका के बाहर से नहीं बल्कि न्यायपालिका कें अंदर से ही न्यायधीशों के भ्रष्टचार, कदाचार और गुंडई के खिलाफ आवाज उठ रही है। न्यायपालिका के अंदर में ही कई ऐसे वीर हैं, जो न्यायपालिका की छवि को बचाने और भ्रष्ट, गुंडई संस्कृति के न्यायधीशों पर कार्यवाही करने का अभियान भी जारी रखे हुए हैं। यह एक सुखद स्थिति है। पर स्वयं न्यायपालिका अभी तक इन सभी समस्यागत प्रवृतियों के खिलाफ कोई चाकचौबंद व्यवस्थाएं करने में असफल रही है। बहुत साल पहले सुप्रीम के एक जज मार्कण्डेय काटजू ने यह कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में फैसले बेचे जाते हैं। दो भिन्न-भिन्न हाईकोर्ट के दो न्यायधीशों के खिलाफ सीबीआई ने भ्रष्टचार की जांच की थी और इन दोनों पर मुकदमा चलाने की स्वीकृति भी मांगी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में फैसले बेचने वाले न्यायधीशों के खिलाफ जांच की या नहीं, यह कोई नहीं जानता है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने जांच की थी तब जांच में सही-गलत क्या प्रमाणित हुआ था? इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने जनता को बताने की जरूरत क्यों नहीं समझी थी? हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कुव्यवस्थाएं, अमान्य गतिविधियों और अस्वीकृत आचरणों पर अभी भी बृहद विमर्श के केन्द्र में नहीं हैं पर निचली अदालतों में अराजकता, भ्रष्टचार, गुंडई जैसी कुव्यस्थाएं, अमान्य गतिविधियां, अस्वीकृत आचरण बृहद विमर्श के केन्द्र में जरूर है। खास निचली अदालतों में खुल्लम-खुल्ला भ्रष्टचार और रिश्वत खोरी चरम पर होती है।

निचली अदालतों में जजों के पेशकार खुलेआम रिश्वत लेते हुए सरेआम देखे जा सकते हैं। उपस्थिति लगाने, एफआईआर के नकल लेने, फैसले की कॉपी लेने में सरेआम रिश्वत ली जाती है। सरेआम रिश्वत तो कार्यपालिका में भी नहीं ली जाती है पर न्यायपालिका की निचली अदालतों में सरेआम रिश्वतखोरी कभी रूकती ही नहीं है। ये बातें हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक जानते हैं। वकील और निचली अदालतों के जज ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जज बनते हैं।

मूर्खतापूर्ण चयन का यह सब दुष्परिणाम है। अब यह अवधारणा बन गयी है कि मूर्खतापूर्ण चयन के कारण भ्रष्ट, बेईमान और पक्षपातपूर्ण संस्कृति के लोग न्यायधीश बन जाते हैं। जब इस संस्कृति के लोग न्यायधीश की कुर्सी पर बैठेंगे तो फिर न्यायधीश न्याय की हत्या कैसे नहीं करेंगे? भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच मूर्खतापूर्ण चयन पर विवाद अभी भी जारी है। भारत सरकार ने न्यायधीशों के चयन और जिम्मेदारी पर एक नियमावली बनायी थी जिसे संसद के दोनों सदनों और विधान सभाओं ने स्वीकृति दी थी। पर उसे सुप्रीम कोर्ट ने अमान्य कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट पर भी यूनियनबाजी करने जैसे आरोप लग रह हैं।

अब न्यायपालिका को भी अपनी धूमिल छवि पर आत्ममंथन करना होगा। निचली अदालतों में सरेआम भ्रष्टचार की कहानी को बंद करना होगा, न्यायधीशों के भ्रष्टचार, बईमानी, भाई-भतीजावाद पर रोक लगाना होगा। अगर न्यायपालिका ऐसा नही करेगी तो फिर जनता की नजरों मे न्यायपालिका भी भ्रष्ट मानी जायेगी। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि अवमानना के अधिकार के खिलाफ जनता अभियानी बन सकती है।

पटना हाईकोर्ट के जज राकेश कुमार ने अपनी एक सुनवाई में यह पाया था कि जिला न्यायधीश ने ऐसे भ्रष्टचारी को जमानत देने का अस्वीकार कार्य किया था। जिसकी जमानत हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ठुकरा दी थी। ऐसे जिला न्यायधीश पर कार्यवाही होनी चाहिए थी पर पटना हाईकोर्ट ने कार्यवाही ही नहीं की थी। पटना हाईकोर्ट के जज राकेश कुमार के उस फैसले की पूरे देश में चर्चा हुई थी, न्यायपालिका की छवि खराब हुई थी। पटना हाईकोर्ट की एक बड़ी बेंच ने अपने ही साथी के फैसले को पलट दिया था। पर न्यायपालिका की छवि तो खराब हो चुकी थी।

जनता के बीच संदेश यह गया था कि पटना हाईकोर्ट ने उक्त भ्रष्ट न्यायधीश को बचाने के लिए न्याय की हत्या की थी। इलाहाबाद होईकोर्ट के एक वरिष्ठ जज रंगनाथ पांडेय का अनुभव तो पूरी न्यायपालिका को ही कठघरे में खडेÞ करने का काम किया था। रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखे एक पत्र में कहा था कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ऐसे-ऐसे न्यायधीश हैं, जिन्हें न्याय का सामान्य ज्ञान भी नही होता है पर वे न्यायधीश की कुर्सी पर बैठ कर न्याय की हत्या कर रहे हैं।
विष्णुगुप्त

 

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