Ancient traditions : आधुनिकता की दौड़ में गायब हुआ पुरातन सोलह श्रृंगार

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Jewelry and archaic traditions are losing their existence

 पुराने वक्त में पहनावे और चाल-ढाल से होती थी हरियाणवीं लोगों की पहचान | Ancient traditions

  • युवा पीढ़ी प्राचीन परंपराओं और पहनावे से अंजान
भट्टू/फतेहाबाद (मनोज सोनी)।

आधुनिकता की चकाचौंध में पुरातन परंपराए (Ancient traditions) और पहनावा आज अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। खान-पान, रहन-सहन, पहनावे से लेकर श्रृंगार में प्रयोग होने वाले आभूषण भी इनमें शामिल हैं। एक वक्त था जब हरियाणा के लोगों की पहचान उनके चाल-ढाल और पहनावे से होती थी। वो आज विलुप्त प्राय नजर आता है। श्रृंगार सौंदर्य के लिए नए आभूषणों के आने से पुराने आभूषण अस्तित्व खोते जा रहे हैं।

बोरले की थी निराली शान | Ancient traditions

पुराने जमाने में महिलाएं भारी-भरकम चांदी व सोने के आभूषण पहनकर सोलह श्रृंगार करती थी। लेकिन आज की पीढ़ी इन वजनी आभूषणों को पहनने में असहज महसूस करती है। सुहाग की निशानी के रूप में महिला के सिर पर सजने वाला बोरला भी आधुनिकता की चकाचौंध कहीं खो गया है, जिसे सोने-चांदी, हीरे-मोती, जवाहरात जैसे रत्नों से सजाया जाता था। हस्तकला से इन बोरलों पर रंग-बिरंगे मनकों व चीड़ के साथ कढ़ाई करके सुंदर रूप दिया जाता था।

मनभावन था महिलाओं का श्रृंगार

अगर हरियावणवीं महिलाओं के पहनावे और श्रृंगार की बात करें तो बड़ा ही मनभावन होता था। महिलाएं लोंग, बुजली पत्ती, डांडिया, गलसरी, हमेल, हंसली, टड्डा, मादलिया, कंठी, कड़ी, नेवरिया, सादा नेवरिया, छैल कड़िया, चार लड़ा छैल कड़िया, तागड़ी, सिंगार पट्टी ,बोरिया, गुलीबंद, पतरी ताबीज, मोरकंठी, कडुला, पोंची, गजरा, बाजूबंद, कर्णफूल, शीशफूल, तागड़ी, पंचबैनी, मुर्की, गोखरू, मोहर, गंगा जमुना कंठी, झांझर, छैल कड़े, बेल चूड़ी, कांगनी, हथफूल, मटर माला आदि बड़े चाव से पहनती थी। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में ये गहने अब गायब हो चुके हैं। इस बदलाव के दौर में इन गहनों की झलक तक दुर्लभ हो गई। उक्त जेवर गिनी-चुनी वृद्ध महिलाओं के पास ही देखने को मिलते हैं।

हल्के गहनों ने ली पुरातन आभूषणों की जगह

वर्तमान समय में इन जेवरों का स्थान लाइटवेट की पायल, गले का हार, अंगूठी, टॉप्स, कांटे आदि ने ले लिया है। बरसों पहले महिलाएं कान में गोखरू पहनती थी। लेकिन आज महिलाएं कानों के बाहर की साइड छोटी-छोटी बालियां को का पहन कर इतिश्री कर लेती हैं। पहले महिलाएं पैरों में 2 से 3 किलो वजनी चांदी की कड़ी पहनती थी, जिनका स्थान आज हल्की-फुल्की पाजेब ने ले लिया है।

गोपाल सोनी ने सहेजे पुरातन आभूषण

  • स्वर्ण अमित, गोपाल सोनी का कहना है कि आभूषणों के प्रति लोगों का रुझान कम नहीं हुआ है
  • बल्कि युवा पीढ़ी की सोच बदल गई है।
  • 100 बरस पहले पहने जाने वाले आभूषण आज भी उनके प्रतिष्ठान पर सहेज कर रखे हुए हैं।
  • ताकि आने वाली पीढ़ियों को इनकी बनावट और पहनावे का स्वरूप दिखाया जा सके।
  • उन्होंने बताया कि पुराने समय में महिलाएं 16 प्रकार के आभूषणों को पहनती थी।
  • जो कि सम्पूर्ण श्रृंगार माना जाता था। लेकिन आज वो सब गायब हो गया है।

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