भारत से दूर जा रहा ईरान

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Iran moving away from India
ईरान कभी भारत के मित्र देशों में शुमार था, विशेष रूप से दक्षिणी एशिया में शक्ति संतुलन कायम रखने और पड़ोसी देश पाकिस्तान संबंधी रणनीति के लिए ईरान का सहयोग भारत के लिए महत्वपूर्ण था। भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए समझौता कर ईरान में अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में कदम आगे बढ़ा लिए थे, किंतु इस मामले पर चीन की भी आंख थी और उसने ईरान-अमरीका के बिगड़ रहे संबंधों के बीच भारत को स्थिति को कमजोर करने के लिए चाबहार बंदरगाह से रेल निर्माण के लिए हुए समझौते से हटाने का प्रयास किया है। भले ही यह बाहरी तौर पर सामने आ रहा है कि ईरान ने भारत द्वारा फंड भेजने में देरी को निर्णय का कारण बताया है लेकिन इस बात की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह सब चीन के इशारे पर हो रहा है।
पिछले दिनों चीन और ईरान के बीच 400 अरब डॉलर के निवेश का समझौता हुआ था। दरअसल ईरान में भारत का प्रभाव उस वक्त से कमजोर पड़ गया था जब अमेरिका ने कई देशों पर ईरान से तेल खरीदने पर पाबंदियां लगा दी थीं। भारत-अमेरिका संबंधों का भारत-ईरान संबंधों पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। भारत-अमेरिका की बढ़ रही मित्रता के बाद चीन ने गलवान घाटी के विवाद में पीछे हटते ही भारत के प्रति ईरान के बदल रहे रवैये को भांप लिया। इससे पहले भारत ईरान गैस पाइप लाईन प्रोजैक्ट भी सिरे नहीं चढ़ सका। यह दौर भारत के लिए एशिया में अपनी विदेश नीति को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है। भारत के साथ बिगड़ते संबंधों के कारण चीन भारत के पुराने मित्रों को छीनने की हर संभव कोशिश कर रहा है। नेपाल तो अब खुलकर चीन की भाषा बोल रहा है। श्रीलंका भी चीन का समर्थन कर रहा है। बांग्लादेश और भूटान पर भी चीन की पैनी नजर है इसीलिए यह आवश्यक हो गया है कि भारत अपने मित्र देशों की घट रही संख्या के प्रति चिंतन कर ठोस रणनीति बनाए। कश्मीर के मामले में भी ईरान का समर्थन भारत के लिए जरूरी है।
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