अर्थव्यवस्था की धीमी होती रफ्तार

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Economy

भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो गई है। अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र मांग की कमी से प्रभावित है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर फिसलते हुए 4.5 फीसदी पर पहुँच चुकी है,जो पिछले 6 वर्षों से भी अधिक समय का सबसे निचला स्तर है। इस तिमाही की यह विकास दर पिछले 26 तिमाहियों में सबसे न्यूनतम स्तर पर है। वर्ष 2016-17 के प्रथम तिमाही में जीडीपी विकास दर 9.2% थी,जो 2016-17 के संपूर्ण वार्षिकी में गिरकर 8.2% हो गई। जीडीपी विकास दर 2017-18 में घटकर 7.2% रह गई और वर्ष 2018-19 में जीडीपी विकास दर 6.8% रह गई। इसके साथ ही इस वर्ष जनवरी से मार्च तिमाही में जीडीपी विकास दर केवल 5.8% रह गई थी।

2019-20 की दूसरी तिमाही में अर्थात अप्रैल से जून में जीडीपी वृद्धि दर 5% रह गई। इस तरह केवल इसी कैलैंडर वर्ष में जीडीपी 5.8 फीसदी से गिरकर अब 4.5 फीसदी पर पहुँच चुकी है। वहीं 2016-17 के प्रथम तिमाही (9.2%) से 2019-20 के द्वितीय तिमाही तक (4.5%) में जीडीपी वृद्धि दर में 4.7% की गिरावट आ चुकी है। जीडीपी की विकास दर घटने से लोगों की आमदनी, खपत और निवेश पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है।

इससे नौकरियों पर भी अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। वर्ष 2019-20 के दूसरी तिमाही में नॉमिनल वृद्धि दर 6.1 फीसदी पर रही,जो पिछले एक दशक में सबसे कम है। सरकारी राजस्व एवं मध्य वर्ग के वेतन में वृद्धि काफी हद तक नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर पर ही निर्भर करता है। नॉमिनल वृद्धि दर 6.1 प्रतिशत से कम रहने पर अब उस स्तर से भी नीचे आ गई है, जिस पर सरकार उधारी लेती है। अपने घाटे की भरपाई के लिए सरकार फिलहाल 6.5 फीसदी के नॉमिनल जीडीपी दर पर उधारी ले रही है।

अर्थव्यवस्था के धीमी रफ्तार का कारण घरेलू न कि वैश्विक: सरकार बार-बार कह रही है कि विकास की धीमी रफ्तार का कारण वैश्विक मंदी है। सरकार इसके लिए चीन-अमेरिका ट्रेड वार को भी जिम्मेदार मानती है। हालांकि,यह दलील काफी सतही है। मसलन,ट्रेड वार में उलझे चीन की इसी तिमाही(जुलाई-सितंबर) में वृद्धि दर 6 प्रतिशत है। यह कहना मुश्किल है कि चीन की तुलना में भारत पर ट्रेड वार का असर ज्यादा पड़ जा रहा है। इसी तरह पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी जीडीपी विकास दर 7 प्रतिशत बना हुआ है। वियतनाम ने भी पिछले 10 वर्षों का उच्चतर विकास दर इसी अवधि में प्राप्त किया है। इससे हमलोग समझ सकते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था के धीमी रफ्तार के कारण वाह्य न होकर आंतरिक ही हैं।

खपत में गिरावट: खपत दर घटने से लोगों आमदनी पर बुरा असर पड़ रहा है। देश में बाजार की सबसे बड़ी रिसर्चर कंपनी “नील्सन” की रिपोर्ट कहती है कि तेजी से खपत वाले सामान यानी फास्ट मूविंग कंजपशन गुड्स अर्थात एफएमसीजी की बिक्री की विकास दर भी लगातार गिरती जा रही है। अब लोग 5 रुपए के बिस्किट खरीदने से पहले भी सोच रहे हैं। गिरती अर्थव्यवस्था के लिए खपत दर में कमी को वैश्विक ब्रोकेज कंपनी “गोल्डमैन सैश” ने भी रेखांकित किया है। गोल्डमैन सैश का कहना है कि देश के समक्ष खपत में गिरावट का कारण एनबीएफसी संकट को नहीं ठहराया जा सकता है,क्योंकि आईएलएंडएफएस के भुगतान संकट से पहले खपत में गिरावट को देखा जा सकता है। एनबीएफसी में संकट सितंबर 2018 में शुरू हुआ,लेकिन खपत में गिरावट जनवरी 2018 से ही जाती है।

लगातार दूसरे माह कोर सेक्टर में गिरावट: आठ कोर सेक्टर में अक्टूबर माह में 5.8 फीसदी गिरावट देखने को मिली। सितंबर माह में भी कोर सेक्टर में 5.2% फीसदी गिरावट आई थी। जीडीपी के इसी तिमाही में वृद्धि दर 4.5% तक लुड़काने में कोर सेक्टर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कोर सेक्टर इंडेक्स के अनुसार औद्योगिक उत्पादन घटने से बिजली की मांग में 12.4% तक की कमी आई है। पिछले माह यह खपत सितंबर के -3 फीसदी के मुकाबले इस बार -12.4 फीसदी हो गई है। सरकार के आँकड़ों के अनुसार सबसे तगड़ा झटका कोयला क्षेत्र को लगा है,जिसमें उत्पादन में 17.6 फीसदी की कमी दर्ज की गई है।

निर्यात में भी गिरावट: देश के निर्यात में लगातार तीसरे माह गिरावट आई है। सितंबर के निर्यात में 6.57 फीसदी की गिरावट आई है,तो वहीं अक्टूबर में 1.11 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय घरेलू मांग की कमी की समस्या से जूझ रही है,ऐसे में उद्योगपति अपना सामान निर्यात करते हैं और विदेशों में बाजार तलाशतें हैं। लेकिन भारतीय निर्यात की रफ्तार सुस्त पड़ चुकी है। निर्यात जीडीपी के 4 प्रमुख घटकों में से एक है। इंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यात में गिरावट काफी परेशान करने वाला है।

एनडीए सरकार के प्रथम कार्यकाल में 2014 से 2019 के दौरान कुल औसत निर्यात वृद्धि दर 4 फीसदी रहा। हम लोग 2014-15 से पहले बात करें,तो निर्यात बेहतर था। वर्ष 2013-14 में निर्यात की वार्षिक वृद्धि दर 17% थी,जो 2014-15 और 2015-16 में घटकर क्रमश: -0.5% और -9% हो गई। अभी भी निर्यात दर लगातार ऋणात्मक बना हुआ है।

सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की थी। इसके साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक ने कई बार रेपो रेट में कटौती कर ब्याज दरों को घटाया। लेकिन इन प्रयासों का कोई विशेष परिणाम नहीं दिख रहा है। अर्थव्यवस्था का वर्तमान संकट मूलत: मांग पक्ष से संबद्ध है। कॉरपोरेट टैक्स में कमी का लाभ मांग पक्ष से संबद्ध न होकर आपूर्ति पक्ष से संबद्ध है। आपूर्ति पक्ष में पहले ही समस्या नहीं है। उपभोक्ता के क्रय क्षमता में कमी के कारण मांग में कमी आ रही है। इस कारण कंपनियों को उत्पादन में कटौती करनी पड़ रही है।

कंपनियों को अगर लंबे समय तक यह कटौती करनी होगी,तो उन्हें अपने कर्मचारियों की छंटनी भी करनी होगी। सवाल यह है कि इस समस्या का समाधान क्या है? इसके लिए सबसे आवश्यक है कि सरकार सबसे निम्न वर्ग के क्रय क्षमता में वृद्धि करे। उदाहरण के लिए सरकार इस समय किसानों को “प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि” के अंतर्गत सीधे रुपए दे रही है।

इस तरह के योजनाओं और लाभार्थियों की संख्या में वृद्धि करने की आवश्यकता है। इसी तरह सरकार को आधारभूत संरचना पर भी खर्च में वृद्धि करनी होगी। अगर हम लोग निवेश में विकास दर को देखें,तो वह गिरकर 1 प्रतिशत पर आ गई है। इसका मतलब है कि निवेश लगभग नहीं के बराबर हो रहा है। जब अर्थव्यवस्था में माँग बनी रहती है,तभी निवेश भी सुगमता से उपलब्ध हो पाता है।

अभी निवेश वृद्धि दर 19 तिमाही के निचले स्तर पर है। जब अर्थव्यवस्था में निवेश नहीं बढ़ेगा,तब तक नौकरियाँ कहाँ से पैदा होगी। जब तक नौकरियाँ पैदा नहीं होगी,तब तक लोगों के आय में वृद्धि नहीं होगी। जब तक लोगों के आय में वृद्धि नहीं होगी,तब तक लोग खर्च नहीं करेंगे। जब लोग खर्च नहीं करेंगे,तो निजी खपत कैसे बढ़ेगी। यह सब कुछ एक -दूसरे से जुड़ा हुआ है। सरकार को इस मामले को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए।
-राहुल लाल

 

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