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देना होगा भारत को रणनीतिक कौशल का परिचय

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बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल’ अर्थात् बिम्सटेक देशों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन नेपाल की राजधानी काठमांडू में हो रहा है। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जबकि भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर गंभीर तनाव बरकरार है और डोकलाम को लेकर चीन बार-बार भारत को युद्ध की धमकी दे रहा है। ऐसे में बिम्सटेक देशों के विदेश मंत्रियों का नेपाल में एकत्रित होना न केवल भारत के नजरिये से महत्वपूर्ण है, बल्कि चीन के लिए भी इसके निष्कर्ष मायने रखेंगे।

डोकलाम को लेकर दोनों देशों की रणनीति काफी हद तक इस सम्मेलन के परिणामोें पर निर्भर करेगी। ऐसा कहना इसलिए बेजा नहीं है कि बिम्सटेक के दो महत्वपूर्ण देश नेपाल और श्रीलंका पर चीन लगातार डोरे डाल रहा है। अगर चीन भारत के इन दो प्रमुख पड़ोसियों को अपने पक्ष में करने में सफल हो जाता है, तो दक्षिण एशिया की सामरिक स्थिति उसके अनुकूल हो जाएगी, जिसका उपयोग वह भारत को धमकाने या झुकाने में करेगा।

बिम्सटेक (बे आॅफ बंगाल इनीशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक को-आॅपरेशन) सात देशों का एक उपक्षेत्रीय मंच है, जिसका गठन इस उम्मीद के साथ किया गया था कि यह आर्थिक गतिविधियों के द्वारा दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने का काम करेगा। वर्ष 1994 में थाईलैण्ड ने बांग्लादेश-भारत-श्रीलंका (बिम्सटेक) सहयोग समूह गठित करने की दिशा में पहल की जिसका उद्देश्य बंगाल की खाड़ी से सटे दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण एशियाई देशों में उप-क्षेत्रीय आधार पर आर्थिक सहयोग की संभावनाओं का पता लगाना था। द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की दिशा में कार्य करने के उदेश्य से 6 जून 1997 को बैंकॉक (थाईलैण्ड) में बिम्सटेक की स्थापना की गई।

दिसंबर 1997 में म्यांमार और फरवरी 2004 को नेपाल तथा भूटान के शामिल होने के साथ ही इसकी सदस्य संख्या सात हो गयी है। इसका लक्ष्य व्यापार, निवेश, उद्योग, तकनीक, मानव संसाधनों का विकास, पर्यटन, कृषि, ऊर्जा, मूल आर्थिक ढांचा और परिवहन के क्षेत्र में विशिष्ट सहयोगी परियोजनाओं की पहचान करना है। यद्यपि सदस्य देशों में घनिष्ठ, सांस्कृतिक, सामाजिक, और आर्थिक संबंधों का इतिहास रहा है। फिर भी सार्क व नाम की तरह इसके सदस्य देशों में भी आपसी मतभेद व मनमुटाव पाया जाता है।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जबकि नेपाल मेंं अस्थिरता का माहौल है। स्वराज की यात्रा के करीब दो सप्ताह बाद ही नेपाल के नए प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा 23 अगस्त को दिल्ली आ रहे हैं। वे पांच दिन यहां रहेंगे। इस यात्रा के दौरान उनका प्रधानमंत्री देउबा से मिलने का भी कार्यक्रम है। देउबा की भारत यात्रा से पहले 14 अगस्त को चीन के उपप्रधानमंत्री वांग यांग भी नेपाल पहुंच रहे हैं। ऐसे में स्वराज को अपने ओजस्वी विचार और वाणी से नेपाली नेतृत्व को विश्वास दिलाना होगा कि भारत, नेपाल के महत्व को अच्छे से समझता है, वह कभी नेपाली हितों की अनदेखी नहीं कर सकता है। चीन की नेपाल में दिलचस्पी बढ़ना भारत के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। पिछले दिनों नेपाल ने चीन के नए सिल्क रूट योजना में शामिल होने संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर कर भारत की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। नेपाल के साथ हुए समझौते के बाद चीन काठमांडू से तिब्बत के ल्हासा तक रेलवे नेटवर्क सहित कई अन्य परियोजनाओं में भारी निवेश करना चाहता है।

श्रीमती स्वराज को इस दिशा में भी प्रयास करना होगा कि वे बिम्सटेक के बाकी सदस्य देशों को भी चीनी प्रभाव क्षेत्र से निकाल कर भारत के पाले में खड़ा कर सकें। बांग्लादेश में भी चीन ने रूचि लेना शुरू कर दिया है। हाल ही में चीन ने बांग्लादेश को चार प्रशिक्षण विमान दिये हैं। दो पनडुब्बियों को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है। इसके अतिरिक्त बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश के लिए एक तेल पाइपलाइन लगाने की योजना पर काम कर रहा है। कुल मिलाकर चीन चारों ओर से भारत को घेरने की दिशा में काम कर रहा है।

हाल ही में उसने श्रीलंका के साथ दक्षिण समुद्री बंदरगाह हम्बनटोटा को लेकर 1.1 अरब डॉलर का समझौता किया है। हम्बनटोटा बंदरगाह को हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती रूचि के तौर पर देखा जा रहा है। आशंका इस बात की भी है कि चीन की वन बेल्ट वन रोड योजना को आगे बढ़ाने में हम्बनटोटा बंदरगाह की अहम् भूमिका हो सकती। यह समझौता पिछले कई महीनों से अधरझूल में था। श्रीलंका की ओर से इस बात की चिंता जताई जा रही थी कि कहीं इस बंदरगाह का इस्तेमाल चीन अपने सामरिक उदेश्यों के लिए न करने लगे। लेकिन अब चीन की ओर से इस बात का आश्वासन दिये जाने के बाद कि वह बंदरगाह का प्रयोग केवल व्यावसायिक उदेश्यों के लिए ही करेगा तथा किसी भी बाहरी शक्ति को यहां नोसेना का बेस बनाने की इजाजत नहीं देगा। इस आश्वासन के बाद दोनों देशों के बीच यह समझौता हो सका।

भारत के लिए चिंता की बात यह है कि चीन दक्षिण में उसके और करीब आ गया है। कुल मिलाकर बिम्सटेक विदेश मंत्रियों की इस बैठक में भारत को बडेÞ रणनीतिक कौशल से अपने पड़ौसियों को अपने अनुकूल करना होगा। देखना यह है कि तेज तर्रार और ओजस्वी वक्ता के रूप में देश और दुनिया में पहचान रखने वाली भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज काठमांडू से क्या ला पाती हैं।

एनके सोमानी

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