सम्पादकीय

रिश्वतखोरी में जकड़ता भारत

India suffers in bribery

राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श घोटाला, घोटाला ही घोटाला, भ्रष्टाचार चिंता का विषय बनता जा रहा है। लेकिन अब उस चिंता में संजीदगी नजर नहीं आती। जो भ्रष्टाचार से प्रभावित होते हैं, उनके लिए भी भ्रष्टाचार कोई गंभीर चिंता का विषय नहीं, क्योंकि अवसर मिलने पर वे खुद भी भ्रष्ट बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ जो जनाक्रोश होना चाहिए। यदि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार का रोग लग जाए तो वह न तो स्वस्थ रह सकती है और न ही सुचारु तरीके से कार्य कर सकती है। भारत में रिश्वत गलत तरीके से फायदे देने के बदले ही नहीं ली जाती है। यहां प्राय: वाजिब काम करने के बदले में लोग घूस लेते हैं। देश में रिश्वत देकर काम कराने वालों की संख्या में 11 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। सर्वे में बताया जाता है कि लगभग भारत में आधे लोगों ने रिश्वत देने की बात कबूल की थी, लेकिन हर साल अपना काम कराने के बदले रिश्वत देने वालों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। सर्वे में जमीन की रजिस्ट्री जैसे कामों के लिए सबसे ज्यादा लोगों ने सरकारी कर्मचारियों को घूस देने की बात कही जाती है। पुलिस महकमा रिश्वतखोरी के मामले में दूसरे नंबर पर है। सर्वे में शामिल लोगों द्वारा बताया जाता है कि पुलिस से जुड़े कामकाज के लिए उनको घूस देनी पड़ी, जबकि लोगों ने नगर निकायों से जुड़े कार्यों में रिश्वत देने की बात कही।हमारे देश में करप्शन ही वह मुद्दा है, जिसको हर चुनाव में जरूर उठाया जाता है। शायद ही कोई पार्टी हो जो अपने घोषणापत्र में भ्रष्टाचार दूर करने का वादा न करती हो। फिर भी इस समस्या से निजात मिलना तो दूर, इसकी रफ्तार कम होने का भी कोई संकेत आज तक नहीं मिला। करप्शन से लड़ने के लिए जो नियम-कानून बनते हैं, उनका ढंग से पालन नहीं हो पाता। कारण यह कि पालन कराने की जवाबदेही उन्हीं की होती है, जिनके खिलाफ ये कानून बने होते हैं। भ्रष्टाचार उन्मूलन (संशोधन) विधेयक 2018 सरकार ने इसी साल पास कराया। इसके तहत किसी बड़ी कंपनी या कॉपोर्रेट हाउस की ओर से सरकारी नीति को तोड़ने-मरोड़ने के लिए आॅफिसरों को रिश्वत दी गई तो न केवल वे अधिकारी नपेंगे, बल्कि घूस देने वाली कंपनी या कॉपोर्रेट हाउस के जवाबदेह लोग भी अंदर जाएंगे। कानून तो अच्छा है, पर यह सार्थक तभी होगा जब इसके सख्ती ले लागू होने की मिसालें पेश की जाएं।सबसे बड़ी समस्या छोटे लेवल पर घूसखोरी की है, जिससे देश का गरीब से गरीब तबका भी जूझ रहा है। ऊपर से नीचे तक सार्वजनिक संसाधनों को गटकने वाला अधिकारी-कर्मचारी, नेता और दलालों का एक मजबूत गठजोड़ बन गया है, जिसे तोड़ने की शुरूआत तभी होगी, जब कोई सरकार अपने ही एक हिस्से को अलग-थलग करने की हिम्मत दिखाए। इस मुद्दे पर कई देश स्वतंत्र नागरिकों ने स्थानीय भ्रष्टाचार के मुद्दे को भी गंभीरता से उठाया था। उस दबाव में एक-दो राज्य सरकारों ने खुद पहलकदमी करके कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने के लिए कुछ नियम बनाए थे। लेकिन दबाव कम होते ही सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर चलने लगा। केंद्र सरकार वाकई भ्रष्टाचार दूर करना चाहती है तो उसे असाधारण इच्छाशक्ति दिखानी होगी। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के रिपोर्ट में बताया गया है कि घूस मांगने के मामले में पुलिस सबसे ऊपर है। वहीं पुलिस के बाद पांच सब से ज्यादा भ्रष्ट सरकारी अधिकारी, कारोबारी, लोकल काउंसलर और सांसद रहे, जबकि टैक्स अधिकारी छठे नंबर पर हैं। भारत में हाल के दिनों में भ्रष्टाचार को लेकर आम आदमी की सोच में थोड़ी बहुत बदलाव देखी गई है। इसी मुद्दे पर भारत के समाजसेवी भी अनशन कर चुके है । और इसी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए भारतीय संसद में लोकपाल बिल पेश किया जा चुका है। जनता समझती है कि भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और वे इसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए तैयार हो रही है। साल 2011 में आम लोगों ने खड़े होकर इसका विरोध किया है और अपनी बात सामने रख दी है। रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के कारण ही कई बार सरकार की अच्छी और जनोपयोगी योजनाओं का लाभ भी आम जनता को नहीं मिल पाता है । उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार के खिलाफ और सख्त कदम उठाएगी। आम जनता को भी रिश्वत देकर काम कराने की मनोवृत्ति से उबरना होगा, तभी इस रोग का कारगर इलाज संभव है, अगर कोई हमसे रिश्व्त मांगे तो उनके खिलाफ कानूनी करवाई करनी चाहिए।

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