कार्बन उत्सर्जन पर भारत ने लगाया अंकुश

0
Curb

अमेरिका में कोयले से कुल खपत की 37 फीसदी बिजली पैदा की जाती है। इस बिजली उत्पादन में अमेरिका विश्व में दूसरे स्थान पर है। कोयले से बिजली उत्पादन करने से सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं। इस दिशा में भारत ने बड़ी पहल करते हुए 50 करोड़ एलईडी बल्बों से प्रकाश व्यवस्था लागू कर दी है। इस प्रक्रिया से कॉर्बन डाइआॅक्साइड में 11 करोड़ टन की कमी लाने में सफलता मिली है। इसकी अगली कड़ी में सघन औद्योगिक ईकाइयों की ऊर्जा खपत को तीन वर्शीय योजना के तहत घटाया जा रहा है। किंतु अमेरिका ने कोयले की चुनौती से निपटने के अब तक कोई उपाय नहीं किए ?

भारत पहली बार इस वर्श के ‘जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक’ में शीर्ष दस देशों में शामिल हुआ है। वहीं अमेरिका सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में पहली बार शामिल हुआ है। स्पेन की राजधानी मैड्रिड में ‘कॉप 25’ जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में यह रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट के अनुसार 57 उच्च कॉर्बन उत्सर्जन वाले देशों में से 31 में उत्सर्जन का स्तर कम होने के रुझान दर्ज किए गए हैं। इन्हीं देशों से 90 प्रतिशत कॉर्बन का उत्सर्जन होता रहा है। इस सूचकांक ने तय किया है कि कोयले की खपत में कमी सहित कार्बन उत्सर्जन में वैश्विक बदलाव दिखाई देने लगे हैं।

इस सूचकांक में चीन में भी मामूली सुधार हुआ है। नतीजतन वह तीसवें स्थान पर है। जी-20 देशों में ब्रिटेन सातवें और भारत को नवीं उच्च श्रेणी हासिल हुई है। जबकि आस्ट्रेलिया 61 और सऊदी अरब 56वें क्रम पर हैं। अमेरिका खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में इसलिए आ गया है, क्योंकि उसने जलवायु परिवर्तन की खिल्ली उड़ाते हुए इस समझौते से बाहर आने का निर्णय ले लिया था। इसलिए कॉर्बन उत्सर्जन पर उसने कोई प्रयास ही नहीं किए। यदि भारत जीवाश्म ईंधन पर दी जा रही सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से कम करता चला जाए, तो कोयले पर उसकी निर्भरता कम हो जाएगी। कोयला ही सबसे ज्यादा कॉर्बन उत्सर्जन करता है।

भारत में अब तक ऊर्जा आवश्यकताओं और पर्यावरण सरंक्षण के बीच संतुलन साधने के बावजूद कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा था। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2018 में 2,299 मिलियन टन कार्बन डाइआॅक्साइड पैदा हुआ, जो 2017 की तुलना में 4.8 फीसदी अधिक था। भारत में इस बढ़ोत्तरी का कारण उद्योगों और विद्युत उत्पादन में कोयले का बढ़ता प्रयोग रहा है। अर्थव्यवस्था को गति देने और आबादी के लिए ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले के उपयोग पर एकाएक अंकुश लगाना मुश्किल है ? लिहाजा वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की भागीदारी 7 प्रतिशत थी, जो अब घटना शुरू हो गई है। इसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत का करीब 40 फीसदी है।

यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि एलईडी बल्ब और सौर ऊर्जा की खपत बढ़ाए जाने का सिलसिला नरेंद्र मोदी सरकार ने एक मुहिम के तहत चलाया। ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में गैस सिलेंडर मुफ्त दिए गए। इससे लकड़ी के ईंधन पर ग्रामीण भारत की निर्भरता बहुत कम हो गई। यदि कॉर्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण बना रहता है तो भारत प्रदूषण से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई देगा ? यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पिछले दिनों ग्रीनपीस की जो रिपोर्ट आई थी, उसमें बताया था कि विश्व के 30 सर्वाधिक प्रदूषित नगरों में से 22 भारत में हैं। औद्योगिक संयंत्रों और वाहनों से निकलने वाला धुंआ इस प्रदूषण की मुख्य वजह है। दुनिया की आधी आबादी वाले एशिया में कोयले की तीन चौथाई खपत होती है। इसी क्षेत्र में तीन चौथाई कोयले के संयंत्र हैं। हालांकि भारत जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से बचने के लिए इलेक्ट्रनिक कार, सौर और वायु ऊर्जा तथा न्यूनतम कार्बन पैदा करने वाली प्रौद्योगिकी पर जोर दे रहा है।

इटली में जी-7 की शिखर बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था। ट्रंप ने तब भारत और चीन पर आरोप लगाया कि इन दोनों देशों ने विकसित देशों से अरबों डॉलर की मदद लेने की शर्त पर समझौते पर दस्तखत किए हैं। लिहाजा यह समझौता अमेरिका के आर्थिक हितों को प्रभावित करने वाला है। यही नहीं ट्रंप ने आगे कहा था कि भारत ने 2020 तक अपना कोयला उत्पादन दो गुना करने की अनुमति भी ले ली है। वहीं चीन ने कोयले से चलने वाले सैकड़ों बिजलीघर चालू करने की शर्त पर दस्तखत किए हैं।

साफ है, यह समझौता अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाने वाला है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तत्काल ट्रंप द्वारा खड़े किए इस सवाल का उत्तर देते हुए कहा था कि ‘भारत प्राचीनकाल से ही पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाता चला आ रहा है। हमारे 5000 साल पुराने शास्त्र पर्यावरण सरंक्षण के प्रति सजग रहे हैं। अथर्ववेद तो प्रकृति को ही समर्पित है। हम प्रकृति के दोहन को अपराध मानते हैं।’ अब इस ताजा रिपोर्ट से साबित हुआ है कि भारत ने कॉर्बन उत्सर्जन पर अंकुश के प्रतिबद्धता का प्रमाण दे दिया है। यहां यह भी स्पष्ट करना मुनासिब होगा कि पेरिस समझौते के बाद 2015 में भारत को हरित जलवायु निधि से कुल 19000 करोड़ रुपए की मदद मिली है। जिसमें अमेरिका का हिस्सा महज 600 करोड़ रुपए है। ऐसे में ट्रंप का यह दावा नितांत खोखला था कि भारत को इस निधि से अमेरिका के जरिए बड़ी मदद मिल रही है।

दरअसल जलवायु परिवर्तन के असर पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि सन् 2100 तक धरती के तापमान में वृद्धि को नहीं रोका गया तो हालात नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे। क्योंकि इसका सबसे ज्यादा असर खेती पर पड़ रहा है। धरती की नमी घट रही है और शुष्कता बढ़ रही है। भविष्य में अन्न उत्पादन में भारी कमी की आशंका जताई जा रही है। इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एशिया के किसानों को कृषि को अनुकूल बनाने के लिए प्रति वर्ष करीब पांच अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च उठाना होगा।

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के अनुसार, अगर यही स्थिति बनी रही तो एशिया में 1 करोड़ 10 लाख, अफ्रीका में एक करोड़ और शेष दुनिया में 40 लाख बच्चों को भूखा रहना होगा। इसी सिलसिले में भारत के कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन ने कहा है कि यदि धरती के तापमान में 1 डिग्री सेल्शियस की वृद्धि हो जाती है तो गेहूं का उत्पादन 70 लाख टन घट सकता है। लिहाजा वैज्ञानिकों की मंशा है कि औद्योगिक क्रांति के समय से धरती के तापमान में जो बढ़ोत्तरी हुई है, उसे 2 डिग्री सेल्शियस तक घटाया जाए। बहरहाल, भारत ने इस दिशा में अपनी प्रतिबद्धता का प्रमाण देकर उन देशों में आईना दिखा दिया है, जो कॉर्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाने का कोई प्रमाण नहीं दे पाए हैं।
-प्रमोद भार्गव

 

Hindi News से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।