कृषि विभाग की अधूरी तैयारियां

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धान की सीधी बिजाई विफल होने के कारण एक बार फिर से साबित हो गया है कि कृषि क्षेत्र अभी बहुत पिछड़ा हुए क्षेत्रों में है। खासकर राज्य सरकारों की कृषि नीतियों में भारी सुधारों की आवश्यकता है। इस लॉकडाऊन के कारण मजदूरों की कमी के चलते धान की सीधी बिजाई का रूझान बढ़ने की बहुत अधिक संभवानाएं थी। कृषि विभाग मानकर चल रहा था कि इस बार किसान खुद सीधी बिजाई के लिए आगे आएंगे। लेकिन हुआ यह कि किसान तो धान की सीधी बिजाई के लिए उत्साहित हुए लेकिन कृषि विभाग अपनी जिम्मेवारी सही तरह निभा नहीं पाया। विभाग ने सीधी बिजाई का प्रचार तो किया लेकिन इस काम में आने वाली समस्याओं की तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।

कहीं चूहों ने बीज को खा लिया तो कहीं बरसात होने के कारण बीज खराब हो गया। इन सबसे परेशान हुए किसानों ने अपनी फसल नष्ट कर परंपरागत तरीके अनुसार धान की बिजाई का रास्ता अपना लिया। अब कृषि विभाग कह रहा है कि अगली बार किसानों को पूरी तरह जागरूक कर सीधी बिजाई करवाई जाएगी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वह किसान जिनके 5-7 हजार रूपये प्रति एकड़ बर्बाद हो गए हैं वह किसान अगली बार कृषि विभाग की सलाह पर गौर करेंगे? इसका जवाब शायद नहीं में होगा। वास्तविकता यह है कि सीधी बिजाई का रूझान तब तक पैदा नहीं होता जब तक किसानों को सीधी बिजाई के लिए प्रति एकड़ आर्थिक मदद नहीं दी जाती। भूमिगत जल के कम हो रहे स्तर के मद्देनजर किसानों को आर्थिक सहायता देना सरकार के लिए फायदेमंद ही होगा।

दरअसल सीधी बिजाई केवल लॉकडाऊन दौरान ही नहीं आम परिस्थितियों में भी आवश्यक है, जिसके लिए कृषि को केवल खानापूर्ति करने की बजाय एक मिशन की तरह लेना चाहिए। पंजाब सहित उत्तरी भारत के कई राज्यों में भूमिगत जल का स्तर लगातार नीचे होता जा रहा है। गर्मियों में पंजाब में पीने वाले पानी की कमी आम ही दिखाई देती है। यह राज्य मरूस्थल ना बन जाए, इसलिए अभी से ही कृषि में बहुत से बदलावों की आवश्यकता है।

 

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