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उच्च शिक्षा की सुधरती सेहत

Improved health of higher education

यह शुभ संकेत है कि देश के उच्च शैक्षणिक संस्थान देश के छात्रों के अलावा विदेशी छात्रों को भी आकर्षित करने में सफल हो रहे हैं। हालिया मानव संसाधन मंत्रालय की उच्च शिक्षा सर्वे रिपोर्ट पर गौर करें तो इस वर्ष 164 देशों से 47,427 छात्र पढ़ाई के लिए भारत के उच्च शैक्षणिक संस्थानों में नामांकन लिया है। विदेशी छात्रों का नामांकन 63.7 प्रतिशत है जिसमें सबसे अधिक नेपाल के 26.88 प्रतिशत छात्रों ने दाखिला लिया है। इनके अलावा अफगानिस्तान, भूटान, नाइजीरिया और सूडान के छात्र भी भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों का हिस्सा बने हैं। रिपोर्ट पर गौर करें तो 18 से 23 की उम्र में उच्च शिक्षा में दाखिला लेने वालों में लड़कियां लड़कों से आगे निकल गयी हैं। इस आयु वर्ग में लड़कों का प्रतिशत 26.3 तो लड़कियों का प्रतिशत 26.4 है।

यानी उच्च शिक्षा में एक साल के दरम्यान छात्राओं के दाखिले में 7,52,097 की बढ़ोत्तरी हुई है। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो वर्ष 2017-18 में जहां 1,74,37,703 छात्राओं ने उच्च शिक्षा में दाखिला लिया था वहीं इस वर्ष 1,81,89,800 छात्राओं ने दाखिला लिया। इसके अलावा सकल नामांकन अनुपात 25.8 प्रतिशत से बढ़कर 26.3 प्रतिशत पर पहुंच गया है। याद होगा कि गत वर्ष मानव संसाधन विकास मंत्रालय के वार्षिक प्रकाशन ‘उच्च एवं तकनीकी शिक्षा आंकड़े’ के मुताबिक उच्च शिक्षा में छात्रों का सकल दाखिला अनुपात 18 से 23 वर्ष की आयु में महज 20 प्रतिशत के आसपास था। आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2009-10 में उच्च शिक्षा में छात्रों का सकल दाखिला अनुपात 18 से 23 वर्ष की आबादी में 15 प्रतिशत था और 2010-11 में बढ़कर 18.8 प्रतिशत हो गया।

इन आधे दशक में नामांकन के मामले में भारत की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। लेकिन अन्य देशों की तुलना में यह अभी भी कम है। उदाहरण के लिए चीन में यह आंकड़ा 26 प्रतिशत, थाईलैंड में 48 प्रतिशत और मलेशिया में 40 प्रतिशत है। अच्छी बात है कि भारत सरकार सकारात्मक नीतियों के जरिए इस दिशा में ठोस पहल कर रही है और उसके अपेक्षित परिणाम भी परिलक्षित हो रहे हैं। उसी प्रयास का नतीजा है कि वैश्विक स्तर पर उच्च शिक्षा में भारत के उच्च शैक्षणिक संस्थानों की रैंकिंग सुधरने लगी है। अभी गत माह पहले लंदन स्थित वैश्विक संगठन टाइम्स हायर एजुकेशन द्वारा जारी इमर्जिंग इकोनॉर्मिज यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2019 के मुताबिक भारत के 49 संस्थानों ने जगह बनायी। पिछले साल यह 42 थी।

याद होगा गत वर्ष पहले टाइम्स हायर एजुकेशन (टीएचई) की वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैकिंग में दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों की नई सूची में भी भारत के 31 शिक्षण संस्थानों ने जगह बनायी। लेकिन गौर करें तो अभी भी भारत की स्थिति बहुत कमजोर है। इसमें बेहतर सुधार के लिए उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार आवश्यक है। इसके लिए सर्वप्रथम सकल दाखिला अनुपात बढ़ाने के साथ रिक्त पड़े पदों को अति शीध्र भरा जाना चाहिए। साथ ही उच्च शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जाना चाहिए। आज की तारीख में शिक्षा पर होने वाला व्यय सकल घरेलू उत्पाद का महज 3.98 प्रतिशत है जो कि वैश्विक अनुपात में बहुत कम है। मौजूदा समय में देश में तकरीबन 600 के आसपास विश्वविद्यालय और 25000 कालेज हैं। लेकिन इनसे उच्च शिक्षा की सुलभता साकार नहीं हो पा रही है। नामांकन दर के अलावा शोध कार्यों की बात करें तो इस क्षेत्र में भारत की स्थिति बेहद कमजोर है।

आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के विकसित देशों में प्रति 10 लाख में 5000 छात्र शोध कार्य में संलग्न हैं। स्कैंडिनेवियाई देशों में यह संख्या 7000 के आसपास है। जबकि भारत में 250 के आसपास है। यह स्थिति उच्च शिक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। यह स्वाभाविक है कि जब उच्च शिक्षा में नामांकन का दर कम होगा तो शोध कार्य करने वाले कम होंगे। मौजुदा समय में उच्च शिक्षण संस्थानों के समक्ष जो सबसे बड़ी समस्या है, वह अध्यापकों की कमी और जरुरी संसाधनों का अभाव है।

आज देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में 45 प्रतिशत से 52 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त हैं। इनमें 42 प्रतिशत प्रोफेसरों के पद और 48 प्रतिशत रीडरों के पद रिक्त हैं। इसी तरह 49 प्रतिशत पद लेक्चरर के पद रिक्त हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 51 से 70 प्रतिशत शिक्षकों के सहारे पठन-पाठन का काम चलाया जा रहा है। जबकि प्रत्येक वर्ष विश्वविद्यालयों और कालेजों में छात्रों की संख्या बढ़ रही है। शिक्षकों के अलावा भारी पैमाने पर शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की भी कमी है। उचित होगा कि सरकार इन रिक्त पड़े पदों को अति शीघ्र भरे ताकि उच्च शिक्षा की सेहत में तेजी से सुधार हो।
अरविंद जयतिलक

 

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