खुशी भरने वाला हो हर कर्म
अब सवाल यह है कि विनाश की ओर बढ़ रहे समय में कोई पल उत्सव कैसे हो सकता है?
अत: प्रत्येक जन को सृजन व संरक्षण के लिए संकल्प लेना होगा।
प्रदूषण सरकारों के लिए कोई मुद्दा नहीं रहा!
हमारे पास स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग जैसी बहादुर युवती नहीं जो अपने देश के शासकों को भारतीय फिÞजां दूषित होने का ताना मार सके। लोग जहर जैसा पानी पीकर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। नदियां दूषित नाले बनती जा रही हैं। नदियों की संभाल केवल रैलियां व सार्वजनिक संभाओं तक सीमित है।
अस्थियों का प्रवाह रूका, परन्तु कल्याण के रास्ते अभी भी खुले
दुनिया भर में अनेकों रीतियां हैं जिनसे लोग अपने मृतक परिवारिक सदस्यों को अंतिम विदायगी देते हैं। जल की तरह भूमि भी पवित्र है। भूमि भी जीवन दायनी है। अगर मृत शरीर पुन: जीवन दायनी की गोद में चला जाता है तब बुरा ही क्या है?


























