लेख

कानून के प्रति कितना संजीदा ‘सूचना का अधिकार’

How much sensitive 'right to information'

आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा के परिवार को आखिरकार इंसाफ मिल गया है। सीबीआई की एक विशेष अदालत ने अमित जेठवा की हत्या में शामिल बीजेपी के एक पूर्व सांसद और दीगर छह लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने सांसद और इस अपराध में शामिल उसके भतीजे पर 15-15 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। अदालत के इस फैसले से निश्चित तौर पर अमित जेठवा के परिवार को तो राहत मिलेगी ही, जिन्होंने इंसाफ पाने के लिए नौ साल तक लगातार संघर्ष किया और अनेक दु:ख झेले। इसके अलावा उन आरटीआई कार्यकतार्ओं को भी हौसला व हिम्मत मिलेगी, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में, बिना किसी डर के अपने काम से भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे हैं। तमाम दवाबों के बाद भी अमित जेठवा का परिवार झुका नहीं। आरोपियों द्वारा दबाव डालने के चलते, इस मामले में सौ से ज्यादा गवाह मुकर गए, लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी। और इस मामले में अपराधियों को सजा दिलवाकर ही दम लिया।

आरटीआई कार्यकर्ता और वकील अमित जेठवा ने साल 2010 में अपने आरटीआई आवेदनों के जरिये गुजरात के गिर वन क्षेत्र में अवैध खनन गतिविधियों को उजागर किया था। इन खनन गतिविधियों में कई रसूखदार शामिल थे। जेठवा ने अवैध खनन में इन लोगों की संलिप्तता को उजागर करने के लिए, उस वक्त संबंधित महकमों के सामने कई दस्तावेज पेश किए। लेकिन उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। इस दरमियान जेठवा ने अवैध खनन गतिविधियों के खिलाफ गुजरात हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर कर दी। अमित जेठवा के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए, उनके पिता ने हाई कोर्ट का रुख किया। अदालत में जब इस मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो उसने पुलिस की जांच पर असंतोष जताते हुए, साल 2013 में यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया। सीबीआई की जांच में सारी सच्चाई सामने आ गई। अमित जेठवा की हत्या खनन माफिया ने ही की थी। मुजरिमों के खिलाफ सीबीआई की विशेष अदालत में चार्जशीट दायर हुई। हत्या और आपराधिक साजिश के इल्जाम में अदालत ने मुजरिमों को सख्त सजा देने का फैसला किया।

अमित जेठवा अकेले ऐसे शख्स नहीं हैं, जिन्हें ईमानदारी की कीमत, अपनी मौत से चुकानी पड़ी हो। बीते डेढ़ दशक में भ्रष्टाचारियों ने देश में ऐसे कई आरटीआई कार्यकतार्ओं को खामोश कर दिया है, जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। महाराष्ट्र में जमीन घोटालों को उजागर करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता सतीश शेट्टी और दिल्ली के आरटीआई कार्यकर्ता रविंदर बलवानी आदि ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार से जूझते हुए अपनी जान गंवाई। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव के आंकड़ों के मुताबिक, सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम लागू होने के बाद से लेकर अब तक देश भर में 79 आरटीआई कार्यकतार्ओं की हत्या की जा चुकी है। भ्रष्टाचारी इतने निरंकुश हो गए हैं कि उन्हें अब कानून का भी कोई डर नहीं। भ्रष्टाचार में जो लिप्त हैं, वे साजिश करते हैं कि किसी भी सूरत में आरटीआई कार्यकतार्ओं को सूचना ना मिले। ऐसे किसी भी मामले में सबसे पहले वे उन्हें मैनेज करने की कोशिश करते हैं। जब वे मैनेज नहीं हो पाते, तो दबाव बनाने की कोशिश होती है। उन्हें फर्जी मामलों में फंसाया जाता हैं। उससे भी बात नहीं बनती, तो आरटीआई कार्यकतार्ओं पर हमले किए जाते हैं। उनकी आवाज हमेशा के लिए खामोश कर दी जाती है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले ऐसे कार्यकतार्ओं को संरक्षण देने के वास्ते कहने को देश में व्हिसल ब्लोअर संरक्षण कानून है, लेकिन यह कानून भी आरटीआई कार्यकतार्ओं को सुरक्षा देने में पूरी तरह से नाकामयाब रहा है। जो लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलती। आरटीआई कार्यकतार्ओं पर आए दिन हो रहे हमले और हत्याएं न सिर्फ सरकार के सुशासन के दावों की पोल खोलती हैं बल्कि इससे यह भी मालूम चलता है कि निचले स्तर पर हो या फिर ऊपरी स्तर पर भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं।

सूचना का अधिकार कानून के प्रति यदि सरकारें वाकई संजीदा होती तो, वह कानून के प्रावधानों को कमजोर नहीं करती। सरकार की उदासीनता और लापरवाही का ही नतीजा है कि देश के तमाम सरकारी महकमे, अब सूचना के अधिकार कानून की कोई परवाह नहीं करते। सूचनाएं देने में वे जानबूझ कर देरी करते हंै। सूचना मिलती भी है, तो वह आधी अधूरी। जिसका कोई मतलब नहीं रह जाता। सूचना का अधिकार कानून की सार्थकता तभी है, जब नागरिकों को उनकी मांगी गई जानकारी, तय समय सीमा में और संपूर्ण मिले। जो आरटीआई कार्यकर्ता भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें व्हिसल ब्लोअर संरक्षण कानून के तहत पूरी सुरक्षा और संरक्षण दिया जाए।
-जाहिद खान

 

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