स्वास्थ्य सुविधाओं की तरफ झांकना होगा

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देश के आधे से अधिक हिस्से जल के जलजले से पीड़ित हैं। ऐसे में स्वास्थ्य सुविधाओं की मियाद बढ़ जाती है। इसके साथ किसी भी राष्ट्र की समुचित उन्नति के लिए यह नितांत आवश्यक है कि उस राष्ट्र के नागरिकों को समुचित सुविधाएं मुहैया करवायी जाएं।

हमारे देश की विडंबना इसी से पता चलती है कि किसान खेत में बेहाल है, छात्र अच्छी शिक्षा से वंचित है, तो वहीं रोटी, कपड़ा और मकान के बाद की सबसे नैसर्गिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी सरकारें नहीं कर पा रही है। देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का काफी अभाव है।

विश्व स्वास्थ्य सूचकांक के कुल 188 देशों में भारत 143वें पायदान पर है। जो साबित करता है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में हम अफ्रीकी देशों से भी बद्तर हालात में हैं। ऐसे में नई स्वास्थ्य नीति मील का पत्थर साबित हो सकती है, लेकिन यह नीति बीमार तंत्र और बुनियादी ढांचे के अभाव की वजह से यह ख्याली पुलाव भी साबित हो सकती है।

इससे निपटने की तैयारी सरकार की होनी चाहिए। जब तक हमारे देश में मेट्रो शहरों से लेकर दूर-दराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सुनियोजित तरीके से नहीं हो पाती, तो हम कैसे अपने-आप को एक विकसित और समृद्ध राष्ट्र कहलाने की तरफ अग्रसर हो सकते है?

आज देश की आबादी दिन दोगुनी-रात चौगुनी बढ़ रही है, उस लिहाज से अगर स्वास्थ्य सुविधाओं का संजाल देश में नहीं बिछाया जा सका है, फिर यह देश के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले उन मजदूर-किसानों के साथ सरासर ना-इंसाफी है, जिसको 26 से 32 रुपए कमाने पर गरीब की श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है।

आज की कमरतोड़ महंगाई के दौर में 26 से 32 रुपए में कैसे परिवार का पालन-पोषण हो सकता है, यह सरकारों को खुद विचार करना होगा? स्वास्थ्य सेवाएं दिनों-दिन महंगी होती जा रही हैं। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार को डेंगू से होने वाली मौतों और मच्छर जनित रोगों पर गलत रिपोर्ट देने की वजह से हाई कोर्ट द्वारा फटकार लग चुकी है। फिर भी सरकारें सचेत नहीं हो रही।

देश में स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं और मानव संसाधनों का न होना एक बड़ी समस्या है। इस चुनौती की ओर खुद पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ध्यान दिलाया था। दिसंबर, 2016 में उन्होंने कहा था कि देशभर में 24 लाख नर्सों की कमी है।

उनके मुताबिक 2009 में इनकी संख्या 16.50 लाख थी जो 2015 में घटकर 15.60 लाख रह गई थी। राष्ट्रपति ने सवा अरब से अधिक आबादी के लिए केवल 1.53 लाख स्वास्थ्य उपकेंद्र और 85,000 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होने पर चिंता जाहिर की थी। सरकार मानती है कि देशभर में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है। कमी होने के बावजूद प्रतिवर्ष 55000 डॉक्टर ही तैयार हो पाते हैं।

छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तरप्रदेश और झारखंड जैसे पिछड़े और बीमारू राज्य वर्तमान दौर में डाक्टरों की विशाल संख्या में कमी से जूझ रहे हैं, फिर वहां की आवाम कैसे स्वस्थ और खुशहाल रह सकती है? जो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डाक्टरों की लगभग 80 से 90 फीसद कमी से पहले ही पीड़ित हैं, उन तक आवाम आखिर किस उद्देश्य के साथ पहुंचे। आज देश के कुछ इलाकों की विडंबना तो यहां तक है कि वहां पर मरीजों को ले जाने के लिए एम्बुलेंस मुहैया नहीं हो पाती।

यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो ओर क्या है कि पिछले दो दशक के भीतर स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रति सरकारी तंत्र ने देखना उचित नहीं समझा। भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च लगभग 1.3 फीसद है, जो ब्रिक्स देशों में सबसे कम है।

देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की एक तस्वीर यह भी है कि देश की 48 फीसद आबादी वाले 9 पिछड़े राज्यों में देश की सम्पूर्ण शिशुमृत्यु दर 70 फीसद है तो वहीं लगभग 62 प्रतिशत मातृ मृत्यु दर है। फिर सरकारें स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर देश में क्या कर रहीं है यह देश के साथ सरकार को भी सोचना होगा?

-महेश तिवारी

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