आधुनिक जीवन शैली का स्याह पहलू !

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स्वस्थ जीवनशैली को अच्छी सेहत का राज माना जाता है। मगर आधुनिकीकरण ने दिन और रात के भेद को खत्म कर दिया है। कार्यशैली में बदलाव की वजह से भागदौड बढ़ी है,जिसमें स्वास्थ्य पीछे छूट गया है। फास्ट फूड का अधिक सेवन, अनियंत्रित खान-पान,व्यायाम से दूरी, शराब एवं गुटखे का सेवन हमारी आधुनिक जीवनशैली की ही देन है। इसका खामियाजा हमें कम उम्र में ही बढ़ती बीमारियों के रूप में चुकाना पड़ रहा है।

इंडियन कौंसिल आॅफ मेडिकल रिसर्च, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आॅफ इंडिया, और इंस्टीट्यूट आॅफ हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवोल्यूशन की एक संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक देश में वर्ष 1990 से 2016 के बीच हृदय रोग में 50 फीसद तथा मधुमेह में150 फीसद की वृद्धि हुई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मधुमेह से पीड़ित भारतीयों की संख्या 1990 में 2.6 करोड़ थी, जो 2016 में 6.5 करोड़ हो गयी । इससे पहले आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में भी चेताया गया है कि भारत की बड़ी आबादी पर शारीरिक गतिविधियों में सक्रियता की कमी के कारण ऐसे लोगों का हृदयघात, मोटापा, उच्च रक्तचाप, कैंसर और मधुमेह जैसी बीमारियों के साथ ही मानसिक रोगों के चपेट में आने का भी का खतरा मंडरा रहा है।

हमारा देश एक तरफ जहां बड़ी आबादी को पोषण युक्त भोजन देने की चुनौतियों से जूझ रहा है,वहीं दूसरी तरफ मोटापे के बढ़ते मामलों से भी उसे मुकाबला करना पड़ रहा है। आज का युवा अधिकतर फास्टफूड, डिब्बाबंद या फिर होटल के खानों पर आश्रित हो गया है। आजकल हर चौराहे पर चाइनीज, तले फूड स्टालों के आगे युवाओं की भीड़ लगी रहती है। इस तरह का खाना न केवल पोषणविहीन होता है बल्कि गंदगी के कारण कई तरह की बीमारियों का घर भी होता है। इससे न केवल वजन बढ़ता है बल्कि मोटापा आता है और मोटापे से अनेक बीमारियां जुड़ी हुई हैं मसलन दिल का दौरा, कोलेस्ट्राल का बढ़ना, उच्च रक्तचाप, कैंसर और मधुमेह प्रमुख हैं। इसमें सबसे खतरनाक मधुमेह या डायबिटीज है, क्योंकि इसका परहेज के अलावा कोई बहुत अधिक प्रभावी इलाज नहीं है।

फास्ट फूड कल्चर की वजह से आज छोटी उम्र में ही बच्चे मोटापे के शिकार हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार अठारह वर्ष से कम आयु के लगभग 22 फीसद बच्चे मोटापे की गिरफ्त में हैं। वहीं हर पांच में से एक महिला भी मोटापे की शिकार है। द लैंसेट के एक अध्ययन के अनुसार 2025 तक दुनिया का हर पांचवां वयस्क मोटापे से पीड़ित होगा। यानी दुनिया भर में मोटे लोगों की तादाद मौजूदा करीब सत्तर करोड़ से बढ़ कर एक अरब से भी अधिक हो जाएगी। यह आने वाले वक्त के लिए एक खतरनाक संकेत है।
गौरतलब है कि गैर संक्रामक कही जाने वाली बीमारियां हमारी जीवनशैली से जुड़ी हैं।

यानी हम जो खाते हैं, जिस हवा में सांस लेते हैं और जिस माहौल में रहते हैं, उनसे इन बीमारियां का सीधा संबंध है। आहार विशेषज्ञों का कहना है कि सेहत के लिए वह एकदम ठीक होता है, जो हमारे आसपास पाया जाता है। आसपास उगने वाले फल, सब्जियां और अनाज की प्रकृति वही होती है, जो हमारे शरीर की होती है। वह या तो वही जन्मा होता है या वहां पल-बढ़ रहा होता है। हम प्रकृति और व्यक्ति के बीच हार्मोनी की बात करते हैं तो उसका एक पहलू यह भी है।

जब हम फास्ट फूड अपनाते हैं तो अन्न के मामले में स्थानीयता से कट जाते हैं। इसी तरह एयर कंडीशनर आता है तो बाहर की प्राकृतिक हवा का रास्ता बंद हो जाता है।
हमारा युवा भारत अस्वस्थ है, इस परिदृश्य को बदलना होगा। इसके लिए जरूरी होगा कि युवा उचित पोषण और व्यायाम को नियमित क्रियाओं में शामिल करें। उन्हें समझना होगा कि स्वस्थ जीवनशैली (धूम्रपान और एल्कोहल से परहेज) मधुमेह, मोटापे और तनाव से तो बचाती ही है, साथ ही शारीरिक गठन और क्षमता के साथ कार्यक्षमता में भी सुधार करती है।

कैलाश बिश्नोई

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