सम्पादकीय

मनगढंÞत आरोपों से उत्पीड़न आम हो गया है

Harassment has become common with accusations

अभी एक महिला ने भारत के मुख्य न्यायधीश रंजन गगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा दिया है, इससे आहत होकर मुख्य न्यायधीश ने कहा कि उन्हें 20 वर्ष तक की गई न्याय सेवाओं का ईनाम मिला है इतना ही नहीं उन्होंने किसी बड़ी ताकत पर आरोप लगाया कि वह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को चुनौती दे रही है, और उसी ताकत के इशारे पर वह महिला जो खुद चार दिनों तक जेल में रही है, जिसका अपना चरित्र आपराधिक है एवं पुलिस भी उससे परेशान है, अब सीजेआई को लांछित कर रही है। आरोपों के बावजूद सीजेआई न्याय की कुर्सी पर बैठे । महिला द्वारा लगाए गए आरोपों से सीजेआई कसमसा कर रह गए हैं। बार कौंसिल आॅफ इंडिया ने इसमें सीजेआई का समर्थन किया है।

भारत के कुशल न्यायाधीश को दिख भी रहा है कि कौन यह सब कर रहा है, चूंकि स्वयं उन्होंने कहा है कि यह राजनीतिक ताकतों के ईशारे पर हो रहा है जो न्यायपालिका को कमजोर करना चाह रही है, लेकिन यही न्यायपालिका देश में अनेकों मामलों में दुष्कर्म के उन आरोपों में सख्त से सख्त सजाएं सुना चुकी है, यहां गुमनाम चिट््िठयों को आधार बनाकर ही सजा सुनाई गई है। ये आरोप भी यौन उत्पीड़न के ही हैं। डेरा सच्चा सौदा के पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां जी को न्यायिक इतिहास के सबसे कठोर निर्णय सुनाकर जेल में बंद कर लिया गया है, जबकि वह स्वयं गुरू जी उनके द्वारा पेश प्रमाण, उनके साथ दिन-रात सामाजिक सेवाओं में लगे लाखों-करोड़ों लोग यह कह रहे हैं कि उनके खिलाफ साजिश हुई है।

झूठे आरोप लगाकर षड़यंत्रकारियों का मकसद माफिया, राजनीतिक लोगों के स्वार्थ साधना आज आम बात हो गई है। दरअसल देश में अब जिस किसी का भी रास्ता रोकना हो उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगा दिया जाता है चूंकि इस कानून में पीड़िताओं को सुरक्षा व न्याय देने के नाम पर पुरूषों से घोर अन्याय किया जाना बहुत आसान है। दहेज मामले, अनुसूचित जाति उत्पीड़न निवारण के मामलों में स्वयं अदालतें भी यह मान चुकी हैं कि अधिकतर मामलों में किसी षड़यंत्र को पूरा करने या अभियुक्त को उत्पीड़ित करने के मकसद से झूठे आरोप लगाए जाते हैं।

इस सबसे बुरा व्यवहार अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर व्यवसाय बन चुका मीडिया कर रहा है जो किसी के विरू द्ध शिकायत हो जाने के पल से ही समाचारों का प्रसारण इस तरह से करने लगता है कि आरोपी से बड़ा अपराधी ही कोई नहीं है एवं आरोप लगाने वाले की पीड़ा से जैसे पूरा देश छटपटा रहा है। देश में न्यायिक सुधारों की आज बेहद जरूरत है , उससे भी बढ़कर जरूरत है ऐसे सख्त कानूनों एवं त्वरित न्यायलयों की जो राजनीतिकों व मीडिया को उनकी साजिशों के लिए तत्काल दंड दे सके। अन्यथा देश के नैतिक स्तम्भ संत-पुरूष, संवैधानिक स्तम्भ स्वार्थी लोगों के द्वारा किए जा रहे षड़यंत्रों से उत्पीड़न का शिकार होते रहेंगे।

 

 

 

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