रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची ग्रीन हाउस गैसों से विश्व को खतरा

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वायुमंडल में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई  कार्बन डाइआॅक्साइड, मीथेन और नाइट्रस  गैसों की मात्रा

विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपनी ताजा रिपोर्ट से पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है ( green house gases danger the world) । संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्गत जलवायु से संबंधित 191 देशों की सदस्यों वाली आधिकारिक संस्था विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने ग्रीन हाउस गैसों को लेकर ‘ग्रीन हाउस गैस बुलेटिन’ नाम से एक ताजा वार्षिक रिपोर्ट जारी की है जो वर्ष 2018 की प्रतिबद्धताओं पर आधारित है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इस समय धरती के वायुमंडल में कार्बन डाइआॅक्साइड, मीथेन और नाइट्रस आॅक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।

वायुमंडल में कार्बन डाइआॅक्साइड की मात्रा 2015 और 2016 की तुलना में 2017 में अधिक हुई है।

  • रिपोर्ट पर नजर डालने पर आंकड़े सामने आते है कि वायुमंडल में कार्बन डाइआॅक्साइड की मात्रा 2015 और 2016 की तुलना में 2017 में अधिक हुई है।
  • जहां 2015 में कार्बन डाईआॅक्साइड का वायुमंडल में स्तर 400.1 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) था
  • वहीं साल 2016 में यह 403.3 पीपीएम था जबकि वर्ष 2017 में यह स्तर बढ़कर 405.5 पीपीएम के वैश्विक स्तर तक पहुंच गया है
  • जो ओद्यौगिक क्रांति से पूर्व की वनस्पति ढाई गुणा अधिक है।
  • इसी तरह मीथेन गैस की वर्ष 2017 में वायुमंडल में मात्रा 1859 पिपीबी (पार्ट्स पर बिलियन)के नए उच्च स्तर तक पहुंच गयी है।
  • जोकि ओद्यौगिक क्रांति से पूर्व की तुलना में 257 फीसदी अधिक है व
  • हीं वर्ष 2017 में नाइट्रस आॅक्साइड की वायुमंडल में मात्रा 329.9 पीपीबी (पार्ट्स पर बिलियन) दर्ज की गई
  • जो पूर्ण ओद्यौगिक स्तर से 122 फीसदी ज्यादा है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में 20 टन से अधिक  प्रति वर्ष ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन किया जाता है

जहां तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जक देशों का सवाल है तो संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है जिसने ही क्योटो प्रोटोकॉल मानने से इन्कार कर दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 20 टन से अधिक प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन किया जाता है इसके बाद रूस, जापान, यूरोपियन देशों और चीन का नंबर आता है। भारत में वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन मात्र 1.2 टन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है। फिर भी हमें भविष्य में पृथ्वी के वजूद के लिए सावधान रहने की जरुरत है। इस रिपोर्ट में यह चिंता जाहिर की गई है कि कार्बन डाइआॅक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों में कटौती किए बिना जलवायु परिवर्तन का खतरा बहुत तेजी के साथ बढ़ता जाएगा और धरती पर इसका अपरिवर्तनीय असर पड़ेगा जिससे पृथ्वी के जीवजगत पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा।

अन्यथा मानव का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

यह संगठन पृथ्वी के वायुमंडल की परिस्थिति और व्यवहार, महासागरों के साथ इसके सम्बन्ध, मौसम और इसके परिणास्वरूप जल संसाधनों के वितरण के बारे में जानकारी देने के लिए स्थापित किया गया लेकिन आज इसकी बातों के प्रति सदस्य देशों में प्रतिबद्धता की कमी है। अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए जरूरी है कि पूरे विश्व द्वारा नवीकरणीय और न्यून प्रदूषण वाली ऊर्जा स्रोतों का अधिक प्रयोग किया जाना चाहीए। टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर आदि ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जक उपभोक्ता वस्तुओं का कम से कम उपयोग किया जाना चाहिए। र्इंधन वाहनों के उपयोग पर नियंत्रण लगाकर इलेक्ट्रिक वाहनों पर निर्भरता को बढ़ाना होगा। वनीकरण को बढ़ावा देने के साथ ही ऊर्जा का विवेकपूर्ण एवं सतत प्रयोग किया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।अन्यथा मानव का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

नरपत दान चारण

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