सम्पादकीय

बेरोजगारी का हल निकालने के लिए गंभीर हों सरकारें

Governments to be serious to solve unemployment

सरकारी दावों में देश तरक्की कर रहा है, रोजगार बढ़ रहा है। लेकिन वास्तविकता इन दावों से कोसों दूर है। असली तस्वीर जो आंकड़ों से सामने आती है लेकिन यह आंकड़े सरकार जारी करने से कन्नी कतरा रही है। देश की असली तस्वीर तो उच्च डिग्रीयां हासिल कर धरने पर बैठे बेरोजगार व पक्के होने के लिए संघर्ष कर रहे कच्चे कर्मचारियों से मिलती है जो अपना घर छोड़कर धरना-प्रदर्शन के रास्ते अपनाने पर मजबूर हैं। प्रतिदिन संघर्षरत बेरोजगारों पर लाठीचार्ज किया जाता है। अपनी मांगों पर डटी नर्साें की जब किसी द्वारा आवाज नहीं सुनी जाती तब वह मजबूर होकर पानी की टंकियों पर जा चढ़ती हैं। सरकारी नौकरियों की हमेशा ही कमी रही है लेकिन नियुक्ति-पत्र बांटने के दौरान आयोजित होने वाले समारोहों की संख्या बढ़ाकर रोजगार बांटने का दिखावा ज्यादा किया जा रहा है। जब रोजगार अधिक थे तब नियुक्ति-पत्र डाक सेवा द्वारा घर पहुंचाए जाते थे।

आज करोड़ों रूपये समारोहों पर खर्च कर दिए जाते हैं। रोजगार देने का एक अन्य फार्मूला ‘मेगा रोजगार मेला’ के रूप में सामने आया है, जिनमें सरकारों की कोई भूमिका नहीं। स्थानीय प्रशासन महज रोजगार मेलों का ही प्रबंध करता है व नियुक्तियों के लिए इंटरव्यू निजी कंपनियां लेती हैं। यह भी बिल्कुल उसी तरह है जैसे सड़कें तो निजी कंपनी से बनवाई जाती हैं व कंपनिया टोल टैक्स द्वारा पैसा लोगों से वसूल करती हैं, लेकिन सड़कों द्वारा विकास की वाह-वाही सरकारों के हिस्से में आ जाती है। विकास व रोजगार एक सिक्के के दो पहलू होने चाहिए। देश में गंगा उल्टी भी बह रही है। कार्पोरेट घराने रोजगार मुहैया करवाने के नाम पर फैक्ट्रियां स्थापित करने के लिए सरकार से हजारों-करोड़ रुपये टैक्स हासिल कर लेते हैं

। रोजगार के लिए फैक्ट्रियां स्थापित करना महज एक शोशा बनकर रह जाता है। मिलीभगत के चलते पैसा लूटकर धनाढ्य व्यक्ति विदेशों में भाग जाते हैं। बैकों का एनपीए लगातार बढ़ता ही जा रहा है। ठगी के इस दौर में देशवासियों के साथ रोजगार के नाम पर मजाक ही हो रहा है। हैरानी इस बात की भी है कि सरकारी नौकरियां तो कम होती जा रही हैं लेकिन वायदे करोड़ों युवाओं को भर्ती करने के किए जा रहे हैं। मनरेगा योजना सहित सरकार की कोई ऐसी योजना नहीं जिसमें भ्रष्टाचार की दीमक न लगी हो। सरकार विकास की सारी जिम्मेवारी निजी कंपनियों पर डालने की बजाय सरकारी मशीनरी की रफ्तार बढ़ाए। सरकारी स्कूलों, अस्पतालों सहित सभी विभागों में रिक्त पड़े पदों की पक्की भर्ती के साथ उन्हें पूर्णकालिक भरा जाए। गैस्ट टीचर कॉन्टैÑैक्ट भर्ती जैसे काम चलाऊ फार्मूलों को रोजगार नहीं कहा जा सकता।

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