सम्पादकीय

सीबीआई में सरकारी दखल का पर्दाफाश

Government interference in CBI

आखिर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई में सरकारी दखलअन्दाजी का पर्दाफाश कर ही दिया। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कैसे सत्तापक्ष एक संवैधानिक संस्था को अपने लिए इस्तेमाल करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीबीआई डॉयरेक्टर अलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने के लिए आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया गया। डॉयरैक्टर की नियुक्ति विपक्ष की सलाह से की जाती है। इसलिए डॉयरेक्टर के जबरन छुट्टी पर भेजने का निर्णय निलंबन या निरस्त करने जैसा होता है। सरकार ने नेता विपक्ष की सलाह लिए बिना वर्मा को छुट्टी पर भेज दिया। डॉयरेक्टर व उनके निचले अधिकारियों के दरमियान तूं-तूं-मैं-मैं चल रही थी। ऐसे समय में मामले पर पूरी गहनता से नजर रखने की आवश्यकता थी, परंतु सरकार ने डॉयरेक्टर को छुट्टी पर भेज सीबीआई जो पहले से ही बुरी तरह बदनाम हो चुकी है उसकी और दुर्गति कर दी। यूपीए सरकार के समय जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ कहा था तब भाजपा व उसकी समर्थक पार्टियों ने यूपीए सरकार की काफी आलोचना की थी, परंतु सच्चाई यही है कि कोई भी पार्टी सत्ता में आकर सीबीआई को अपने वश में कर लेती है।

भाजपा पर भी आरोप साबित हो गए हैं कि सरकार सीबीआई को पिंजरे के तोते की तरह इस्तेमाल कर रही है। विपक्षी नेताओं को सबक सिखाने मात्र के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिस तरह एक विधायक कभी-कभी पुलिस थाने को अपनी मर्जी से चला लेता है, वही हाल अब सीबीआई का हो गया है। दरअसल आवश्यकता है सीबीआई के ढांचे को खत्म कर नए सिरे से कोई अन्य एजेंसी बनाने की, जिस का कंट्रोल सरकार के हाथ में न होकर संविधान के हाथ में हो। विपक्ष को इसकी नियुक्ति व निरस्त करने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। संवैधानिक पदों का राजनीतिकरण इस बात से ही साबित हो जाता है कि जो भी पार्टी सत्ता में आती है, वह सबसे पहले राज्यों के राज्यपाल को बदल कर अपने लोग फिट करती है, फिर सीवीसी, सीबीआई के डॉयरेक्टरों को देखती है।

यदि वह सरकार के हिसाब से नहीं चलते तब उनको घर का रास्ता दिखा दिया जाता है। मोदी सरकार ने भी इस मामले में निर्लज्जता की हदें पार कर दीं। इस सरकार पर वित्तीय प्रबंधों से खिलवाड़ करने हेतु केंद्रीय रिजर्व बैंक के गवर्नर पर भी दवाब बनाने के आरोप लगे हैं। हर संवैधानिक संस्था को पार्टी एजेंडे की पूर्ति के लिए पंगु बना दिया गया। आशा करनी चाहिए कि भविष्य में सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से सबक लेकर सरकार शासन-प्रशासन को गैर राजनीतिक नजरिये से देखेगी।

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