शासन और स्वाद

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King's poor brother
एक धर्मनिष्ठ और कल्याणकारी राजा थे। प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय। एक दिन इच्छा हुई, अपना दोष जानें। नौकरों से लेकर नागरिकों तक सब से पूछा पर सबने यही कहा कि आपमें कोई दोष नहीं। वह एक संत के पास पहुंचे। संत से पूछा कि वे अपना दोष कैसे जानें? संत ने बताया कि शासन का प्रभाव तो हर चीज पर होता है। राजा अत्याचारी हो तो राज्य के मीठे फल भी कड़वे हो जाते हैं। राजा ने उनकी बात सुन ली, पर उनसे सहमत नहीं हुए। वे चले आ रहे थे। तभी उन्होंने एक व्यक्ति को फल तोड़ कर खाते देखा। राजा ने उसका स्वाद पूछा तो उसने बताया कि फल बड़े मीठे हैं।
वहां से लौटकर राजा ने अपनी नीतियां बदल दीं। संत के कथन की परीक्षा के लिए प्रजा पर अत्याचार शुरू कर दिए। धर्म की जगह अधर्म को बढ़ावा दिया। प्रजा अत्याचारों से कराह उठी। फिर राजा घूमने निकले। एक व्यक्ति को बुलाया और फल चखने को कहा। उसने फल खाकर अजीब मुंह बनाया। राजा ने भी फल चखा, उन्हें भी कड़वा लगा। दूसरा फल चखा, वह भी वैसा ही निकला। वे परेशान हो उठे। उन्होंने अपने सलाहकार से संत का वह कथन और फल वाली बात बताई। सलाहकार ने समझाया, ‘संत ने मन का गूढ़ रहस्य समझाया है। शांतिपूर्ण और सुखद वातावरण में हमारा मन शांत रहता है, तब हमें स्वादहीन चीजें भी स्वादिष्ट मालूम पड़ने लगती हैं। लेकिन जब चारों ओर त्राहि,त्राहि मची हो, तब मन अशांत रहता है और स्वादिष्ट चीजों का स्वाद भी पता नहीं चलता।’ राजा ने बात समझ ली और फिर से प्रजा के कल्याण में जुट गए।

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