गूगल ज्ञानियों ने हर क्षेत्र में किया बेड़ागर्क

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एक वक्त था, जब जनमानस हुकूमतों की नीतियों और सामाजिक मुद्दों पर शांतिपूर्वक विरोध जताते थे और उन मसलों पर असल आईना दिखाने के लिए सामाजिक तानेबानों से सजकर फिल्में भी बनाई जाती थी। फिल्में अब भी बनती हैं लेकिन ज्यादातर आग में घी डालने का काम करती हैं। क्योंकि उनकी स्टोरी असल सच्चाई से परे होती है। हिन्दी फिल्मों के नामचीन निमार्ता-निर्देशक सुभाष घई बदलते सिनेमा जगत से कुछ अलग ही राय रखते हैं। पिछले दिनों उन्होंने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत की, उसी दौरान डॉ0 रमेश ठाकुर ने सुभाष घई से तमाम मुद्दों पर बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य हिस्से।

 नागरिकता संशोधन एक्ट को लेकर हो रहे उपद्रव को आप कैसे देखते हो?

समाज में जो भी हो उसकी सबको परवाह होनी चाहिए। क्योंकि समाज हम-आप जैसे नागरिकों से मिलकर ही सुसज्जित होता है। रही बात विरोध करने की, तो सरकार के किसी फैसले के खिलाफ आमजन का विरोध उनका मौलिक अधिकार होता है। मुझे लगता है लोगों ने अब अपने विरोध का तरीका बदल दिया है। सरकारी संपत्तियों को सरेआम आग में झोंकना, राहगीरों पर बेवजह जुल्म ढहाना, पुलिस पर पत्थर फेंकने को मैं व्यक्तिगत रूप अच्छा नहीं मानता। हमने जेपी आंदोलन भी देखा, नंदीग्राम मूवमेंट को भी देखा। लेकिन अब जो हो रहा है वैसा तरीका कभी नहीं देखा और न ही सुना। खबरों में जम्मू-कश्मीर के भीतर पत्थरबाजी की घटनाओं को जरूर सुन रहे थे एकाध वर्षों से। लेकिन अब पत्थरबाजी का चलन दिल्ली जैसे महानगरों में भी शुरू हो गया।

 आंदोलनकारियों और हुकूमतों के बीच तालमेल की कमी तो नहीं हैं ऐसे मूवमेंट?

हो भी सकता है? हमने बड़े-बड़े आंदोलन देखे हैं। और यह भी देखा है विरोध करने वाले मुद्दों को सुलझाने के लिए पक्ष-विपक्ष दोनों वर्गों में आपसी सहमती को लेकर मीटिंगे होती थी। मुद्दे नहीं सुलझते थे तो कई-कई दौर की मीटिंगे हुआ करती थी। लेकिन आज का दौर ऐसा है? विरोध होता है तो होने दो! सरकारों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। पर, ऐसा नहीं होना चाहिए। मुझे ऐसा लगता सरकारी सिस्टम को आंदोलनकारियों की बातों को सुनना चाहिए। उनकी मांगों को दूर करने का हल निकालना चाहिए।

 सिनेता ऐसे मुद्दों पर किस तरह की भूमिका निभा सकता है?

देखिए, जमाना अब व्यवसाय का है। सामाजिक बातें करने और सुनने में अच्छा तो लगता है। पर अमल कोई नहीं करता। मौजूदा समय में फिल्मों का निर्माण करने से पहले इस बात की तसल्ली की जाती है कि जिस सब्जेक्ट पर फिल्म बनेगी, उससे मुनाफा कितना होगा। इस बात की परवाह किसी को नहीं रहती, कि उससे सामाजिक संदेश कैसा जाएगा। क्योंकि अब जो फिल्में बनती हैं उनमें बहुत ज्यादा पैसा लगता है। निर्माता पहले खर्च किया हुआ पैसा वसूलते हैं। नब्बे के दशक के बाद सिनेमाई पर्दा पूरी तरह से बदल गया है। अब फिल्मों की मियाद सिर्फ एक सप्ताह की होती है। दूसरे सप्ताह कोई अन्य फिल्म आ जाती है। इसलिए दर्शक भी ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते।

क्या फिल्म निमार्ताओं में अब पहले जैसी समझ नहीं रही?

फिल्म निर्देशन के लिए कोई वास्तविक तरीका नहीं होता है। एक खाटी के फिल्म निर्माता के भीतर लेखन, अभिनय, फोटोग्राफी, साउंड रिकॉर्डिंग, चित्रण, पेंटिंग, इलेक्ट्रिकल ज्ञान, स्टाइलिंग और दृश्य पनपता है। लेकिन अब ऐसे हुनर की जरूरत नहीं? आपके पास पैसा है तो सबकुछ संभव है। हमने देखा है रियल स्टेट के लोग भी खुद को फिल्म निर्माता कहते हैं। जबकि, फिल्मों की एबीसीडी भी नहीं आती। इससे आप खुद समझ सकते हैं कि निमार्ताओं में समझ कितनी है।

 फिल्मों का टेस्ट अब पहले जैसा नहीं रहा, बदलाव के पीछे के कारणों को कैसे देखते हैं आप?

मैं इसमें फिल्म निमार्ताओं को दोष इसलिए नहीं दंूगा, क्योंकि उनको मार्केट से जैसी डिमांड मिलेगी, वैसी ही फिल्में बनाएंगे। वक्त ग्लैमरस रसधारा में सराबोर होने का है। दर्शकों को अच्छे सब्जेक्ट से मतलब नहीं है, उन्हें हर सीन में ग्लैमर का तड़का चाहिए। अनुमान लगा सकते हैं फिल्मों में जब ऐसा होगा, तो सीरियसपन की गुंजाईश कम रहेगी। इसी कारण अब आर्ट फिल्मों का दौर पहले जैसा नहीं रहा। मेरा फिर भी मानना है, हमें अपने लीक से नहीं हटना चाहिए, डायरेक्टर चाहें तो दर्शकों का मूड बदल सकते हैं। दौर कितना भी क्यों न बदले, पर गंभीर मसलों पर बनीं फिल्में आज भी पसंद की जाती हैं।

बुनियादी मसलों पर बनने वाली फिल्मों का दौर अब खत्म सा हो गया है?

नब्बे के दशक से पहले तक फिल्मों की स्टोरी पर बहुत काम किया जाता था। रिसर्च करके मुद्दा खोजा जाता था। उसकी वास्तविकता को परखते थे। थोड़ी सी चूक पर सेंसर बोर्ड की कैंची चल जाती थी। कलाकार जमीन से जुड़े होते थे। जमीनी स्तर की जानकारियां उनके पास होती थी। आज की तरह गूगलज्ञानी नहीं होते थे। हर क्षेत्र में गूगल के ज्ञानियों ने बेड़ागर्क किया हुआ है। दृश्य को ज्यादा समझना नहीं पड़ता था। दृश्य उनके भीतर पनपते थे। आर्टिस्ट के अंदर इतना ज्ञान व्याप्त होता था जिससे उन्हें उपकरण को संदर्भित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।

रामलखन-शोले जैसी फिल्मों का आज भी कोई सानी नहीं। ऐसे विषयों को कोई निर्माता क्यों नहीं छूता?

मैंने पहले भी कहा। फिल्में दर्शकों की डिमांड पर बनती हैं। लंबी अवधि तक चलने वाली फिल्मों के कद्रदान अब नहीं रहे। नंिदया के पार, खलनायक व सौदागर जैसी फिल्मों के चाहने वाले तो जरूर होंगे पर बनाने वालों का अकाल है। ‘राजनीति’ जैसी फिल्में भी बनीं हैं। लेकिन ऐसे विषयों पर राजनेता ही सवाल खड़े करने लगते हैं कि उससे उनकी छवि खराब होती है।

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