गूगल युग के चकाचौंध में भी प्रासंगिक हैं गांधी विचार

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Gandhis views are also relevant in the glare of Google era
विश्व के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के लिए कभी सच ही कहा था कि भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करना मुश्किल होगा कि हाड़-माँस से निर्मित ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था। महात्मा गांधी के कहे विचारों की श्रृंखलाओं को जब हम इतिहास की पुस्तकों में खंगालते हैं तो पता चलता है कि उनके विचारों का सही मोल। ये सच है कि जन्म से कोई इंसान महान नहीं होता, उनके विचार उसे महान बनाते हैं। अपने विचारों से कैसे कोई इंसान महान बन सकता है, उसके सबसे बड़े उदाहरण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हैं। उनके उन्मुख विचार सामाजिक संरचना के लिए हमेशा सर्वोपरी रहे। उनके मुंह से निकले बोल हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं।
ये बात अपने आप में सच है कि विचार और काम की पवित्रता और सरलता ही महान लोगों को आम लोगों से अलहदा रखती हैं। महान इंसान भी औरों की भांति काम करते हैं, पर दोनों में फर्क होता है। महान लोगों के काम करने का मकसद समाज में बदलाव लाना होता है। महात्मा गांधी ने अपने असाधारण व्यक्ति से लाखों-करोड़ों हिंदुस्तान वासियों के जीवन में जो अमुलचूक बदलाव करके गए हैं वह कर्ज हम चुका नहीं पाएंगे। अंग्रेजों की गुलामी से जब हिंदुस्तान आजाद हुआ और उसके बाद उन्होंने नए भारत की संरचना की उसी को हम आगे बढ़ा रहे हैं। उनके दिखाए रास्ते हमारे लिए आज भी प्रासंगिक हैं। देश ही नहीं, बल्कि विदेशी लोग भी उनके विचारों को पवित्र पुस्तकों जैसे मानते हैं। उनके दिखाए अहिंसा रास्ते सभी के लिए एक जैसे हैं।
पीढ़ियाँ बदलती रहेंगी और बदल भी रही हैं, लेकिन देश के लोग युगों-युगों तक गांधी की कुर्बानियां नहीं भूल पाएंगे। उन्होंने जाते वक्त देश के लोगों से बस यही कहा था कि एकता-अखंडता के लिए कभी बंटना नहीं? शायद उनकी इस अंतिम इच्छा को हम लोगों ने पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने जो कहा उसके विपरीत हम चल पड़े हैं। आज हम जात-समुदाय में टुकड़ों की तरह बंट चुके हैं। इस समस्या के लिए जिम्मेदार पूर्णता सियासी लोग हैं। लेकिन, मानने को राजी नहीं, जब इस मसले पर कोई बहस छिड़ती तो वे अपना पल्ला झाड़ लेते हैं और सारा दोष जनमानष पर मढ़ देते हैं। नेताओं के लिए वोट मुकद्दर जैसा हो गया है। उसे पाने के लिए हर मानवीय रियायतों को तोड़ने पर आमादा रहते हैं। ऐसे दृश्यों को देखकर कभी कभार ऐसा प्रतीत होता है कि हम अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए गांधी के विचार और उनके बताए रास्तों को छोड़ते जा रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय फोरम पर भारत का वजूद आज भी गांधी से तय होता है। लेकिन आधुनिक युग ने उनको कमतर आंकना शुरू कर दिया है। हो सकता है इसके पीछे सुनियोजित कोई गहरी साजिश भी हो। लेकिन अगर ऐसा होता है तो उसके खामियाजा के लिए हमें तैयार हो जाना चाहिए। बापू ने यह भी कहा था कि आप जो करते हैं वह नगण्य होगा, लेकिन आपके लिए वह करना बहुत अहम है, कि हम जो करते हैं और हम जो कर सकते हैं, इसके बीच का अंतर दुनिया की ज्यादातर समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त होगा। किसी देश की महानता और उसकी नैतिक उन्नति का अंदाजा हम वहां के जानवरों के साथ होने वाले व्यवहार से लगा सकते हैं, कोई कायर प्यार नहीं कर सकता है, यह तो बहादुर की निशानी है।
बापू ने कहा कि स्वास्थ्य ही असली संपत्ति है, उसके सामने सोना-चाँदी सब मिट्टी जैसे। अंदर की आत्मसंतुष्टि इंसान को बड़ा बनाती है। गौरतलब है, महात्मा गांधी के जिन विचारों को आधुनिक युग की पीढ़ी को अनुसरण करना चाहिए, लेकिन वे नकार रहे हैं। उनके लिए किसी महान पुरूष के विचार उतने मायने नहीं रखते, जितना गूगल ज्ञान उन्हें आंनदित करता है। गूगल ज्ञान उनके लिए माई-बाप हो गया है। बदलते युग में युवाओं ने खुद फोन, गूगल, कंप्यूटर आदि आधुनिक यंत्रों तक सीमित कर लिया है। उनके लिए उनकी दुनिया अब स्मार्ट फोन में ही सिमट गई है। इन जंजीरों से हमें समय रहते मुक्त होना होगा। इसलिए भी बापू के विचार हमारे लिए मददगार साबित हो सकते हैं। क्योंकि गांधी ने इस बात की कभी आशंका भी जताई थी, तकनीकें हम पर उतनी भी हावी न हो, जिससे हम अपनी सभ्यता को ही भूल जाएं।
दरअसल, गाँधी जो कहते थे, जो सोचते थे, वह आने वाले वक्त में घटित जरूर होता था। अंग्रेजों से लड़ने का उन्होंने जो रोड मैप तैयार किया था उसमें वह पूर्ण रूप से सफल हुए थे। आजादी के लिए हमें क्या-क्या खोना पड़ेगा, उन्होंने पहले ही बता दिया था। जिस नुक्सान की उन्होंने आशंका जताई थी, उतना नुक्सान हम लोगों ने झेला भी। उनके विजन में शुद्धता थी, पवित्रता थी, देश को बचाने के लिए कुछ भी कर गुजरने की दीवानगी थी। सोच एकदम निस्वार्थ से लबरेज थी, किसी पद-प्रतिष्ठा की कोई चाह नहीं थी। बस एक ही चाहत थी, मुल्क को आजाद करके हमें सौंपना। वैसा वह करके भी गए।
महात्मा गांधी ने आजादी का स्वाद ज्यादा नहीं चखा, हमने चखा। उन्होंने जो कुछ भी किया हमारे लिए किया। महात्मा गांधी कुछ प्रेरक बातों का संग्रह हमारे लिए छोड़कर गए हैं। अगर हम उनका अनुकरण कर लें, तो कई संभावित खतरों से बच सकते हैं। उन्होंने कहा था कि व्यक्ति अपने विचारों के सिवाए कुछ नहीं है, वह जो सोचता है, वह बन जाता है, कमजोर कभी क्षमाशील नहीं हो सकता है, क्षमाशीलता ताकतवर की निशानी होती है। ताकत शारीरिक शक्ति से नहीं आती है, यह अदम्य इच्छाशक्ति से आती है। धैर्य का छोटा हिस्सा भी एक टन उपदेश से बेहतर है, गौरव लक्ष्य पाने के लिए कोशिश करने में हैं, न कि लक्ष्य तक पहुंचने में।

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