विडंबना। पांव के छाले लिए बढ़ रहे मंजिल की ओर

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Migrant workers to travel on foot

 भविष्य की चिंता में पैदल ही पलायन करने को मजबूर हुए प्रवासी श्रमिक

  • बस एक ही अरमां, किसी तरह घर पहुंच जाएं

संजय मेहरा/सच कहूँ गुरुग्राम। बहुत छाले हैं उसके पांवों में, वह जरूर उसूलों पर चला होगा…। किसी शायर ने यह बहुत गहरी बात लिखी है। यह बात आज उन मजदूरों और उनके परिवारों पर सटीक बैठती है, जो अपने परिवार के भविष्य की चिंता लेकर और अपनों के बुलावे पर हिम्मत करके पैदल ही अपने घरों को निकले हुए हैं।  गुरुग्राम समेत देशभर में इनके ही मजबूत हाथों से गहरी जमीन से लेकर गगनचुम्बी इमारतें खड़ी हुई हैं। बंजर जमीन पर फसलें भी लहलहाई हैं। जिन हम फर्राटे भरते हैं, वे मजबूत सड़कें भी इनके हाथों से बनी हैं। बिना बाधा के निकलने को फ्लाईओवर भी इनके श्रम का परिणाम है।

  • जहां दुनियाभर के लोगों का उपचार होता है।
  • वे अस्पताल भी इन्हीं लोगों के परिश्रम से बने हैं।
  • मतलब हर क्षेत्र में इनकी भागीदारी किसी न किसी रूप में रही है।
  • आज इनकी बदकिस्मती ही कही जाएगी कि ना तो वो अस्पताल ही इनके काम आ रहे हैं।
  • जो इनके स्वास्थ्य का ख्याल रख सकें।
  • ना वो गगनचुंबी इमारतों में इन्हें शरण मिल रही है।

सड़कें जरूर काम आर्इं

हां, एक बात जरूर है। सड़कें इनके काम आ रही हैं। जिन सड़कों पर चलते हुए ये अपने घरों की ओर बढ़ रहे हैं। उन सड़कों पर चलते हुए इनके पांव में छाले भी पड़ रहे हैं। बहुतों की गाड़ियों के रौंदे जाने से जान भी जा रही है। जिन सड़कों पर हम गाड़ियों में फर्राटा भर रहे हैं, वे सड़कें अपने निर्माणकर्ताओं के खून से लाल भी हो रही हैं। उनके शरीर की खाल से और भी प्लेन हो रही हैं। बड़ी गाड़ियों से रौंदे जाने पर तो इनका मांस भी खुर्चना पड़ता है। सरकार ने इनके लिए रेलगाड़ियां भी चलाई हैं, बसें भी चलाई हैं। व्यवस्था के नाम पर रजिस्ट्रेशन करने को कहा जा रहा है। ऐसे में इन लोगों के लिए कोई कुछ नहीं सोच रहा कि इन्हें रेल व बसें मुहैया क्यों नहीं हैं।

पांवों में चप्पलें नहीं

पैदल ही अपने परिवारों को लेकर अपने घरों को जा रहे इन श्रमिकों, मजदूरों के पांवों में चप्पलें भले ही ना हो, छाले जरूर हैं। किसी तरह से छालों में पट्टी, पॉलिथीन आदि बांधकर ये सफर को सुहाना बनाने का प्रयास करते हैं। यह ठीक है कि इनके पांव के छाले सफर में बाधा नहीं बन सकते। क्योंकि ये हौंसले के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इन्हें पता है कि अगर छाले देख लिए, महसूस कर लिया तो अपनी मंजिल तक पहुंचना कठिन हो जाएगा।

बच्चों को नहीं आने देते कोई दिक्कत

इनके बच्चे कभी पैदल चलते हुए थक जाते हैं तो उन्हें कंधे पर बिठा लेते हैं और सफर जारी रहता है। कोई ब्रिफकेस पर तो कोई अन्य जुगाड़ करके बच्चों को ले जा रहा है। 21वीं सदी में चंद्रयान लांच कर चुके हमारे देश में इन प्रवासियों की यह तस्वीर हमारी व्यवस्था, हमारे विकास को धत्ता बताती है।

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