सम्पादकीय

कड़ी मेहनत से उपजाया खाद्यान्न सड़ने से बचाना होगा

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देश का किसान आंदोलन कर रहा है, पिट रहा है। कारण, उनकी फसल कौड़ियों के मोल खरीदी जाती है, लेकिन विडम्बना है कि कौड़ियों के मोल खरीदी इस फसल का हाल भी बुरा होता है। अगले सप्ताह से बारिश का मौसम शुरु होने वाला है। इस मौसम में बाढ़ के खतरे के साथ-साथ गोदामों में पड़ा अनाज भी भारी मात्रा में खराब हो जाता है।

अब तक प्रतिवर्ष हजारों टन खाद्यान्न खराब हो रहा है, लेकिन जिस तरह गत वर्ष आई एक वैश्विक रिपोर्ट में भारत को विश्व का सबसे अधिक भुखमरों का देश बताया एवं सरकार ने खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी बिल पास कर लाखों टन खाद्यान्न देने की योजना बनाई, ऐसे में बरसात से बर्बाद होने वाले अनाज को बचाया जाना बेहद जरूरी है। क्योंकि देश में भारतीय खाद्य निगम व राज्य खाद्य निगमों के हजारों गोदाम ऐसे हैं, यहां पर केवल तिरपाल से ही गेहूं, चावल व अन्य अनाज जो खाने के काम आता है ढक कर रखा जाता है।

खाद्यान्न के ऐसे खुले गोदामों में नीचे का फर्श भी सुरक्षित नहीं होता। नतीजा हर बरसात में अनाज के बोरे भीग कर खराब होते रहते हैं। कई बार अनाज बरसात के बिना वातावरण की नमी से ही खराब हो जाता है। भीगा हुआ खाद्यान्न एक-डेढ सप्ताह में ही काला पड़ जाता है व बदबू मारने लग जाता है। इस प्रकार भंडारण प्रक्रिया के बाद अनाज भारी मात्रा में बेकार हो जाता है। प्रतिवर्ष ऐसे सड़े अनाज की मात्रा कुल अनाज के 30 से 40 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।

जोकि लाखों टन बैठती है। सड़ गये अनाज के लिए केवल मौसम की मार व गोदामों के अभाव को कारण बताकर सरकार व अधिकारी अपनी जिम्मेवारी को पूरा हुआ मान लेते हैं। जबकि देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे करोड़ों लोग प्रतिदिन भूखा रहने को विवश हो रहे हैं। जिनमें बहुतों की प्रति वर्ष भूख एवं कुपोषण से मौत हो जाती है। सरकारी नीतियां किस प्रकार तय होती हैं,

यह किसी भी वर्ग के समझ नहीं पड़ती, क्योंकि आज भी जीडीपी का 60 प्रतिशत तक कृषि आय से ही प्राप्त हो रहा है। कृषि का उत्पादकता स्तर 70 के दशक से अभी ऊपर नहीं जा पाया है। जबकि 70 के बाद से देश की आबादी में दोगुणें से थोड़ा कम तक की वृद्धि हो चुकी है। औद्योगिक विकास एवं आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए देश की बहुत सारी उपजाऊ भूमि क्रंकीट एवं शहरीकरण के नीचे दब चुकी है।

बची हुई कृषि भूमि पर उत्पादन बढ़ता रहे इसके लिए सब्सिडियां एवं अन्य कृषि सुविधाएं देने से सरकार हाथ खींच रही है। नीतियों के इन्हीं घालमेल का परिणाम है कि अब खुले बाजार में प्रतिवर्ष खाद्य पदार्थों के दाम दस से पंद्रह प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं। खाद्यान्नों के दामों को वर्तमान नीतियों से किसी भी प्रकार नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा।

क्योंकि उपजाऊ जमीन कम हो रही है। जो जमीन बची हुई है उन पर किसानों को कृषि नहीं करने के लिए हतोसाहित किया जा रहा है। फिर भी यदि बम्पर उत्पादन हो रहा है तब उसे गोदामों में सड़ा दिया जाता है। निश्चित ही देश के नेता अपनों के साथ धोखा कर रहे हैं। ऐसे में किसी व्यवस्था को कब तक विकासमान एवं स्थिर रखा जा सकेगा? यह प्रश्न एक दुस्वप्न की तरह है। जिसका यदि हल नहीं खोजा गया तो करोड़ों लोगों का जीवन अकाल ही मौत के मुंह में चला जाएगा।

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