जिंदगी की जंग में आर्थिक कुर्बानी छोटी

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Financial losses are minor in the battle of life
कोरोना वायरस की महामारी के दौर में शायद भारत ही ऐसा पहला देश होगा जिसने ‘जान है तो जहान है’ स्लोगन को अपनाकर लॉकडाऊन को एक जरूरी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है दूसरी तरफ अमेरिका, रूस, चीन, जैसी महाशक्तियों व यूरोपीय देशों का ध्यान अर्थव्यवस्था की तरफ ज्यादा रहा है। कोरोना वायरस की सबसे ज्यादा मार अमेरिका को पड़ी है जहां 50 हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं। 9 लाख के करीब लोग बीमारी से संक्रमित हैं। इस देश में करीब 2 हजार मौतें रोजाना हो रही हैं फिर भी अमेरिका ने जहां कोरोना मामले कम हैं वहां रैस्टोरैंट, सपा, सैलून व अन्य दुकानें खोलने की जल्दबाजी की। यही हाल इटली का है जहां 26 हजार मौतें हो चुकी हैं और इटली भी 4 मई से कारोबार खोलने के लिए तैयार है।
इधर भारत सरकार और राज्य सरकारों ने मानवीय जीवन को प्राथमिकता देकर लॉकडाऊन किया हुआ है। वास्तव में हमारे देश में लॉकडाऊन का असली प्रभाव कर्फ्यू जैसा ही रहा है। भले ही पुलिस ने कई स्थान पर जरूरत से ज्यादा सख्ती बरती, फिर भी इसका उद्देश्य लोगों की भलाई था। कई समाज सेवी संस्थाओं व लोगों ने अपने दैनिक कार्य बंद कर जरूरतमंदों को राशन पहुंचाया है। लोगों ने बिना किसी मांग के घरों में मास्क तैयार कर बाँटे। जिंदगी के लिए ऐसा जज्बा किसी अन्य देश में देखने को नहीं मिला। अब इस बात की चर्चा हो रही है कि चीन व अन्य देशों की आर्थिकता को टक्कर देने के लिए अमेरिका में लॉकडाऊन न तो समय पर लागू किया गया और न ही ढ़ील देने के साथ-साथ बीमारी की गति पर मंथन किया गया।
नि:संदेह आर्थिकता किसी देश की रीढ़ होती है लेकिन आर्थिकता भी तो मानव समाज के लिए है। बिना मानव कारें, कोठियां व उच्च स्तरीय रहन-सहन किस काम का? महामारी के दौर में भारत में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी रोकने के लिए उन्हें शेल्टर होम्स में आश्रय देकर खिलाया गया जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका में रोजगार बचाने के लिए प्रवासियों का वीजा रोकने में जुटे रहे। आर्थिकता की यह जंग कोई नई नहीं बल्कि पहले व दूसरे विश्व युद्ध का कारण भी आर्थिक साम्राज्यवाद ही था। मौजूदा दौर ने पुन: यह प्रमाणित कर दिया है कि महाशक्तियों का आपसी विरोध, अहं व टकराव 100 साल बाद भी ज्यों का त्यों है, जो देश महामारी में भी आर्थिक युद्ध से नहीं टल रहे। भविष्य में उनके बुरे इरादों से इन्कार नहीं किया जा सकता। कम-से-कम जिंदगी की जंग में अहंकार मिटना चाहिए।
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