सियासत चमकाओ अभियान बना किसान आंदोलन

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Farmers movement became a political shine campaign
किसान आन्दोलन के नाम पर विपक्ष खासकर कांग्रेस अपनी सियासत चमकाने में लगी है। पंजाब में चूंकि कांग्रेस की सरकार है, ऐसे में राहुल गांधी सोफा लगाकर ट्रैक्टर रैली निकालने से लेकर भाषणबाजी कर रहे हैं। लेकिन किसान आन्दोलन की तपिश पंजाब के अलावा थोड़ी बहुत हरियाणा में दिखी। इसके अलावा देशभर में जैसा कांग्रेस दावा कर रही है, किसान आन्दोलित नहीं हैं। किसान सरकार और विपक्ष दोनों की मंशा बखूबी समझ रहे हैं। उन्हें ये भी समझ आ रहा है कि नये कृषि कानून उनका कितना भला करेंगे और उनका नुक्सान कहां पर हो रहा है। एक किसान से ज्यादा नफा-नुक्सान कोई सियासी दल या नेता नहीं सोच सकता, ये कटु सत्य है। चूंकि विपक्ष का स्थापित धर्म सरकार का विरोध करना है, ऐसे में कांग्रेस कृषि कानून का विरोध कर रही है। इस विरोध की आड़ में वो अपनी सियासत चमका रही है।
राहुल गांधी ने पंजाब और हरियाणा में कृषि कानून के विरोध में सोफे लगाकर ट्रैक्टर यात्रा का आनंद उठाया। उसे चलाने वाले भी किसान या उनके संगठनों के बजाय कांग्रेस के नेता रहे। कांग्रेस शासित राजस्थान में भी नये कानूनों के विरोध में न किसान संगठित हो सके और न ही कांग्रेस या अन्य पार्टियाँ ही कुछ कर सकीं। छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में कांग्रेस या तो अपने बल पर सत्ता में है या फिर हिस्सेदार है। ये दोनों राज्य भी कृषि प्रधान हैं लेकिन इनमें भी नए कानूनों के विरुद्ध किसान लामबंद हुए हों ऐसा सुनने में नहीं आया। राहुल गांधी ने केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी पर अपने रटे-रटाए और घिसे पिटे आरोप लगाये। राहुल गांधी की आरोपों में कितनी सच्चाई है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
लेकिन एक तथ्य जो इस मामले में पूरी तरह साफ हो चुका है कि कृषि सुधार कानूनों का विरोध उत्तर भारत के दो राज्यों में पंजाब और हरियाणा में सिमटकर रह गया है। जहां तक बात न्यूनतम समर्थन मूल्य की है तो इसे वैधानिक रूप देने के बाद भी उसका पूरी तरह पालन हो सकेगा ये कह पाना कठिन है क्योंकि किसान, आढ़तिया और ग्रामीण अंचलों से सम्बन्ध रखने वाले व्यापारियों के बीच के रिश्ते अलग तरीके के होते हैं। इसीलिये राजनेता जब किसी कानून या व्यवस्था का विरोध अथवा समर्थन करते हैं तब उसमें जमीनी सच्चाई की बजाय अपने तात्कालिक राजनीतिक हितों के अलावा और कुछ नहीं होता। नये कृषि सुधार कानून पूरी तरह किसानों के हित में हैं या विरोध में ये पक्के तौर पर कोई नहीं कह पायेगा।
नए कानून किसानों को देश में कहीं भी अपनी उपज बेचने की स्वतंत्रता देते हैं। आप भी सोचिए, क्या आप देश में कहीं भी वेतन कमाने या सामान या सेवाएं बेचने के लिए स्वतंत्रता चाहेंगे या केवल राज्य सरकारों द्वारा निर्दिष्ट स्थानों पर केवल बिचैलियों को कमीशन देने के बाद ही अपना माल बेचना चाहेंगे। किसानों को भी भारत में कहीं भी खरीदने और बेचने के लिए एक आम व्यक्ति की तरह यह आजादी होनी चाहिए। खेती एक आकर्षक व्यवसाय नहीं है। सर्वेक्षण बताते हैं कि 42 फीसदी किसान इससे बाहर निकलना चाहते हैं। 1970-71 और 2015-16 के बीच, खेतों की संख्या दोगुनी होकर 7.1 करोड़ से 14.5 करोड़ हो गई, जबकि औसत खेत का आकार 2.28 हेक्टेयर से 1.08 तक आधा हो गया। कोई भी ऐसे छोटे खेतों से एक अच्छी आय नहीं कमा सकता है। मुख्य समाधान कृषि से बाहर के लोगों को विनिर्माण और सेवाओं में ले जाने में निहित है।
विपक्षी दल दावा करते हैं कि बेचने की स्वतंत्रता का मतलब फसलों की एमएसपी सरकारी झूठ है। सरकार एमएसपी में कुछ (हालांकि सभी नहीं) की खरीद जारी रखेगी। राशन की दुकानों के लिए सरकार को और अनाज कैसे मिलेगा? हम फर्जी खबरों की दुनिया में रह रहे हैं। चूंकि एक हेक्टेयर में अनाज के उत्पादन से अच्छी आमदनी नहीं होगी, इसलिए छोटे किसान पशुपालन, सब्जियों और फलों की ओर रुख कर रहे हैं। इनसे कम भूमि से अधिक आय प्राप्त होती है। लेकिन सब्जियां और फल खराब होते हैं और धीमी गति से चलने वाली सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीदे और वितरित नहीं किए जा सकते।
किसानों के समूहों के लिए कृषि-प्रोसेसर के साथ अनुबंध करने का सबसे अच्छा तरीका है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों के लिए पैमाने की अर्थव्यवस्थाएं बनाएगी और न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित करेगी। सरकार कह रही है कि हम मंडियों में सुधार के लिए यह कानून लेकर आ रहे हैं। लेकिन, सच तो यह है कि कानून में कहीं भी मंडियों की समस्याओं के सुधार का जिक्र तक नहीं है। यह तर्क और तथ्य बिल्कुल सही है कि मंडी में पांच आढ़ती मिलकर किसान की फसल तय करते थे। किसानों को परेशानी होती थी। सरकार को किसानों की जायज मांगों पर जरूर ध्यान देना चाहिए। आखिरकार मोदी सरकार किसान और गरीब हितेषी सरकार मानी जाती है।
सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा कर चुकी है। यह देश के 14 करोड़ कृषि परिवारों का सवाल है। शांता कुमार समिति कहती है कि महज 6 फीसदी किसान ही एमएसपी का लाभ उठा पाते हैं। बाकी 94 फीसदी बाजार और बिचैलियों पर ही निर्भर रहते हैं। अन्य क्षेत्रों की तुलना में कृषि क्षेत्र आय असमानता को सबसे अधिक देख रहा है। इसलिए किसानों को एमएसपी का कानूनी अधिकार दिए जाने की जरूरत है। कोई उनकी फसल उससे नीचे दाम पर न खरीदे। अगर कोई खरीदता है तो उस पर कानूनी कार्रवाई हो।
राहुल गांधी आज भले ही किसान आंदोलन के नाम पर अपनी सियासत चमकाने में लगे हैं। वो मोदी सरकार को बदनाम करने का कोई मौका चूकना नहीं चाहते हैं। ऐसे में वो बीच-बीच में अपनी सुविधा के अनुसार राजनीति चमकाने के लिये कुछ न कुछ करते रहते हैं। फिलहाल वो किसानों की आड़ में ट्रैक्टर यात्राओं का आनंद ले रहे हैं। वहीं इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि कृषि सुधार कानूनों के समर्थन में भाजपा के नेता और कार्यकर्ता भी महज दिखावा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को आह्वान किया था कि वो किसानों के बीच जाकर बैठे। उनसे बातचीत करके उनकी शंकाओं का समाधान करें। असल में भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री की बात पर कितना अमल किया है ये भाजपा के बड़े नेता स्वयं अच्छी तरह से जानते होंगे। किसानों की समस्या यही है कि वे राजनीति के मोहरे बनकर रह गये हैं और उनकी असली समस्याओं के प्रति न सत्ता पक्ष में अपेक्षित संवेदनशीलता है और न ही विपक्ष में। रही बात समाचार माध्यमों की तो उनके लिए तो केवल टीआरपी और सुर्खियां ही महत्वपूर्ण हैं।
केंद्र सरकार के समर्थक वर्ग को नये कानूनों में सब कुछ अच्छा नजर आ रहा है वहीं विरोधियों को वह किसानों को बर्बाद करने वाला लग रहा है। पंजाब और हरियाणा में किसान आन्दोलन के पीछे मंडी माफिया और आढ़तियों की ताकत खुलकर सामने आ चुकी है। ये सोचने वाली बात है कि नए कानून जब पूरे देश में लागू होने हैं तब केवल दो या कुछ राज्यों में ही उसके विरोध में किसान समुदाय आंदोलित क्यों है? राजनीतिक दलों और सरकार को किसानों की असल आवाज सुननी और समझनी चाहिए। वहीं किसानों की स्थिति सुधारने के सार्थक प्रयास सभी राजनीतिक दलों को करने चाहिएं। अगर धरतीपुत्रों को सियासत को मोहरा बनाने से किसी का भला नहीं होगा। और देश एक घोर संकट का शिकार हो जाएगा।

 

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