सम्पादकीय

नकली दूध-घी और लापरवाह सरकार

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मिलावट महापाप व मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध

गत दिवस पंजाब व हरियाणा के दो समाचारों ने सबको चिंतित किया। एक खबर तो हरियाणा के जिला सिरसा से थी, जहां एक गांव में बंद पड़ी फैक्ट्री में गुप-चुप तरीके से नकली घी बनाया जा रहा था। फैक्ट्री से नकली घी बनाने वाला रसायन भी बरामद हुआ। इसी तरह पंजाब के जिला अमृतसर में भी नकली घी के एक लाख से अधिक डिब्बे बरामद हुए। सर्दी में लोग बड़े चाव से देसी घी की पंजीरी व पिन्नीयों का खूब मजा लेते हैं और कहते हैं कि देशी घी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है लेकिन वह नहीं जानते कि वे जहर खा रहे हैं। मिलावट महापाप व मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध है, लेकिन यह विडंबना है कि लोगों को कैंसर जैसे रोगों की तरफ धकेलने वाले मिलावटखोरों के खिलाफ सरकारों व विपक्ष में कोई गंभीरता ही नहीं।

कोई भी सरकारी विभाग लोगों को नकली वस्तुओं के प्रयोग से बचने के लिए कोई सार्वजनिक विज्ञापन जारी नहीं करता। सरकार कैंसर अस्पताल बनाने, कैंसर रोगियों को इलाज में छूट देने की घोषणाएं तो करती हैं किंतु मिलावटखोरों की जड़ पर काम नहीं करती। पंजाब हरियाणा शुद्ध खान-पान जैसे दूध, घी के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन आज दोनों राज्य मिलावट के कारण कैंसर रोगियों से ग्रस्त हैं।

1980 के दशक में 2 हजार दुधारू पशु होते थे अब वहां बहुत मुश्किल से 500 पशु भी नहीं।

कैंसर के लक्ष्णों की पहचान करने के लिए जागरूक तो किया जा रहा है लेकिन इसके कारणों को खत्म करने की कहीं चर्चा तक नहीं हो रही। यह आज कोई नई बात नहीं है, यह तो सालों से ही चलता आ रहा है। दोषी कानूनी शिकंजे से बच निकलते हैं। मिलावटखोरी को खत्म करने के लिए सरकार के पास न कोई नीति है, न प्रोग्राम व न ही कोई प्रस्ताव है। मिलावटखोरी होती क्यों है?, इस बात को समझने के लिए सरकारों की इच्छा ही नहीं है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्स अथॉरिटी आॅफ इंडिया के अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि देश में बिकने वाला 65 प्रतिशत से अधिक दूध मिलावटी है। जिन गांवों में 1980 के दशक में 2 हजार दुधारू पशु होते थे अब वहां बहुत मुश्किल से 500 पशु भी नहीं।

जब तक पशु पालन का धंधा सफल नहीं होगा तब तक मिलावटखोरी को रोकना असंभव

आबादी इन गांवों की दो गुणा से ज्यादा बढ़ गई है। इन हालातों में लोगों को शुद्ध दूध मिल जाए, यह संभव नहीं। सरकारों व विपक्षी पार्टियों के लिए यह कोई मुद्दा नहीं। लोग चुपचाप जहर पी रहे हैं। भारतीय समाज इतना जागरूक नहीं हुआ कि मिलावटखोरी रोकने के लिए लोग धरने दें। लोगों की यही सोच मिलावटखोरी को राजनैतिक मुद्दा नहीं बनने देती। साथ ही राजनेताओं को कहां फुर्सत है कि वह रैलियों में भीड़ इकट्ठी करें, बैठकें करने जैसे कार्यों को छोड़कर लोगों के स्वास्थ्य की चिंता करें। हैरानीजनक बात यह भी है कि बाजार में जरूरत अनुसार दूध नहीं मिल पाता, फिर भी विवाह शादियों में कैटरज जितना चाहो दूध का प्रबंध कर लेते हैं।

पंजाब-हरियाणा जैसे राज्य में दुधारू पशुओं की संख्या में गिरावट आई है व बचे दूध की खरीद निजी कंपनियां कर रही हंै। घरों में 5-7 पशु रखने वाले लोग घाटा झेलने के बाद इस धंधे को छोड़ चुके हैं या छोड़ रहे हैं। शुद्ध दूध की लागत बढ़ रही है, जब तक पशु पालन का धंधा सफल नहीं होगा तब तक मिलावटखोरी को रोकना असंभव है।

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