चुनावी तपिश से गायब होता पर्यावरण का मुद्दा

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Environmental issues that disappear from electoral heat

ग्रीष्म ऋतु के आने के साथ-साथ इस बार भारतीय राजनीति भी पूर्णरूपेण गर्माहट से अभिभूत दिख रही। जिसके फलस्वरूप इस बार का 2019 आम चुनाव बदजुबानी और राजनीतिक शुचिता के गिरते स्तर के साथ ही साथ प्रचंड गर्मी का सामना भी करेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि देश के कई हिस्सों में पारा चालीस को पार मार्च महीने में ही कर चुका है। ऐसे में जिस लोकतांत्रिक देश में बीते सात दशकों से लगातार जाति, धर्म के नाम पर चुनाव जीता जाता रहा हो। वहां पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन चुनावी मुद्दा होना चाहिए। लेकिन उस देश की दुर्गति देखिए जिसके संविधान में मूल कर्तव्य के अंतर्गत वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण का जिक्र है। वहीं पर्यावरण जैसा देश का सबसे बड़ा मसला चुनावी घोषणा-पत्र में जगह तक नहीं पाता।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन द्वारा हाल में ही जारी एक रिपोर्ट द स्टेट आॅफ द ग्लोबल क्लाइमेट वैश्विक परिदृश्य के लिए एक चेतावनी है। यह रिपोर्ट कहती है कि रहनुमाई तंत्र द्वारा पर्यावरण को लेकर समुचित कदम न उठाएं जाने के कारण पेरिस संधि का लक्ष्य निर्धारित समय पर क्या, देर से भी पूरा होना मुश्किल नजर आ रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक कॉर्बन उत्सर्जन में कमी नहीं आ पा रहीं है, इसलिए पिछले चार वर्षों से धरती के तापमान में लगातार बढोत्तरी हुई है।

2018 में पूर्व- औद्योगिक समय की तुलना में तापमान एक डिग्री बढ़ गया, जबकि पेरिस सन्धि ही कहती कि सदी के अंत का सिर्फ दो डिग्री तापमान बढ़ना चाहिए। ऐसे में कहा तो यहीं जा सकता, अगर इसी रफ़्तार से तापमान बढ़ता रहा, तो शायद ही पेरिस संधि का यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सके। यहां बात कॉर्बन डाई आॅक्साइड के स्तर की करें। तो 1994 में 357 पीपीएम ( पार्ट्स पर मिलियन) थी जो 2017 तक आते-आते 405 पीपीएम के लगभग हो जाती है। ऐसे में ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण समुद्र तल ऊंचा हो रहा। ग्लेशियर पिघल रहें। जिससे प्रभावित विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत भी है।

पिछले वर्ष केरल में आई असाधारण बाढ़ भी जलवायु परिवर्तन का ही परिणाम थी। ऐसे में आशा और उम्मीद सियासतदानों से की जानी चाहिए कि वे पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सजग और निष्ठावान दिखाई देंगे। लेकिन ऐसा होता कुछ नजर नहीं आता। आज के दौर में जब देश चुनावी सरगर्मी में उलझा हुआ है। तो वहीं दिल्ली और आॅस्ट्रिया के दो नामी शोध संस्थाओं की रिपोर्ट यह कहती है, कि हमारे देश मे प्रदूषण की रोकथाम के मौजूदा कायदे-कानून के सही तरीके से क्रियान्वयन के पश्चात भी 2030 तक 67.4 करोड़ से अधिक लोग बेहद दूषित हवा में सांस लेने के लिए अभिशप्त होंगे।

आगे यही रिपोर्ट कहती कि प्रदूषण की समस्या कमोबेश समूचे देश में है, लेकिन सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में जहरीली हवा की जद में ज्यादातर आबादी है। इनमें पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के हिस्से शामिल हैं। इतना ही नहीं अन्य राज्यों में भी प्रदूषण का स्तर मानक से ऊपर है, लेकिन सुकून यह कि स्थिति यहाँ की बाकी राज्यों के मुकाबले बद्दतर और भयावह नहीं हुई है। वहीं जब आंकड़ों के महासागर में गोते लगाएं तो ग्रीनपीस के अध्ययन के मुताबिक, दुनिया के सबसे प्रदूषित 10 शहरों में से सात भारत में हैं। तो हमारी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जिसे दिल वालों की दिल्ली कहा जाता है।

वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 के दौरान जहरीली हवा की वजह से देश में पांच साल से कम उम्र के लगभग 1 लाख 10 हजार बच्चों की मौत हुई। यही रिपोर्ट कहती कि प्रदूषण की वजह से भारत में 20 लाख लोगों की असमय मौत हो जाती है जो वैश्विक परिदृश्य में इस वजह से होने वाली मौतों का एक-चौथाई है। वहीं डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में वातावरण में तेज गर्मी और सर्दी देखने को मिल रही है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण के प्रति अनदेखी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था और आने वाली पीढ़ी के साथ खिलवाड़ नहीं तो क्या है, कि एक तरफ पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। वहीं सियासी व्यवस्था पर्यावरण संरक्षण के लिए जमा धन का उपयोग सड़कें बनाने, बस स्टैंडों की मरम्मत और कॉलेजों में प्रयोगशालाएं स्थापित करने जैसे कामों में कर रहीं हैं। स्वच्छ हवा और बेहतर पर्यावरणीय संरचना मानव जीवन की पहली प्राथमिकता है।

सड़कें आदि बाद की आवश्यकताएं है। तो फिर सरकारें सिर्फ सड़क आदि बनवा कर आज के दौर में अपनी पीठ जरूर थपथपा सकती है। लेकिन यह भविष्य के लिए चिंताजनक स्थिति उत्पन्न करेगा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के मुताबिक 2017, 167 वर्षों में तीसरा सबसे गर्म वर्ष रहा। यह रिपोर्ट काफी कुछ सवाल खड़े करती है, कि आखिर हम समय पर नहीं चेते, तो यह धरती हमारे रहने लायक नहीं बचेंगी। जिसका कारण घटते पेड़-पौधे ही हैं। आज हमारे देश में हर व्यक्ति के हिस्से में सिर्फ 24 पेड़ ही बचे है। ऐसे में सिर्फ रेफ्रिजरेटर, गाड़ियों के चलन को कम करके ही तापमान को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। उसके लिए अन्य उपाय भी करने होंगे। पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों में हवा, पानी, मिट्टी, खनिज, ईंधन, पौधे और पशु-पक्षी शामिल हैं।

इन संसाधनों की देखभाल करना और इनका सीमित उपयोग करके ही प्रकृति का संरक्षण किया जा सकता है, और आने वाली पीढ़ी को सुंदर प्राकृतिक परिवेश दे सकते हैं, लेकिन वर्तमान दौर में विकास की अंधी दौड़ में इनके संरक्षण के प्रति न रहनुमाई व्यवस्था सजग दिख रही। न लोग ही इसके प्रति वफादार समझ में आ रहें। वर्ल्ड हैल्थ आगेर्नाइजेशन की रिपोर्ट कहती है, कि 73 लोग देश में प्रति घण्टे स्वच्छ पानी ने मिलने के कारण मौत को गले लगा रहे। इसके अलावा अगर संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संगठन की एक रिपोर्ट कहती है, कि हमारे देश में रोपे जाने वाले पौधे में से 35 फीसदी पौधे बढ़ नहीं पाते, तो यह चिंताजनक स्थिति तो अभी से निर्मित हो गई है, फिर भविष्य कैसा होगा। इसका सहज आंकलन किया जा सकता है। जंगल की कटाई का मुख्य कारण खेती के लिए वन की कटाई, डूब क्षेत्र के लोगों को बचाने के लिए, शहरों का विस्तार, हाईवे प्रोजेक्ट को बढ़ावा देने औऱ वैध-अवैध माइनिंग है।

ऐसे में जब 2019 का आम चुनाव कई मायनों में अहम रहने वाला है। जिसमें पहली बात यह शामिल है, कि इस बार 90 करोड़ मतदाता लोकतंत्र के पर्व में हिस्सेदारी लेंगे। दूसरा यह कि इस बार चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक लगभग साढ़े चार करोड़ मतदाता ऐसे हैं जो इक्कीसवीं सदी में जन्म लेकर पहली बात अपने मत का दान करेंगे। तो नौकरियों, आर्थिक और सामाजिक उत्थान के साथ पर्यावरण संरक्षण भी राजनीतिक दलों के चुनावी संकल्प पत्र का हिस्सा होना चाहिए। हाँ यहां हम कह सकते कि भाजपा सरकार ने अपने बीते कार्यकाल में सौर, पवन और हाइड्रो ऊर्जा पर बल दिया है।

लेकिन यह प्रयास ऊँट के मुँह में जीरे से ज्यादा कतई नहीं। आज भारत भले पांच अक्षय ऊर्जा वाला देश बन गया है और चौथा पवन ऊर्जा वाला देश। लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक जिस देश में अमूमन 60 फीसदी से ज्यादा बिजली की मांग कोयला आधारित ताप संयंत्रों के इस्तेमाल से पूरी की जाती है। तो उसे इस प्रक्रिया में बदलाव लाना होगा। साथ में अन्य तरीकों से पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने की कवायद करनी होगी। तभी बेहतर और स्वच्छ राष्ट्र की परिकल्पना चरित्रार्थ होगी। ऐसे में देश की अवाम को पर्यावरणीय मुद्दे को ध्यान में रखकर दलों से प्रश्न चुनाव प्रचार के दौरान पूछने चाहिए कि सत्ता में आकर पर्यावरण संरक्षण के लिए उनके पास क्या विजन है, क्योंकि जब बात विकास की होगी तो पर्यावरण को दरकिनार नहीं किया जा सकता। ऐसे में जब विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच सामंजस्य स्थापित होगा। तभी कुछ स्थिति हमारे देश के आबोहवा की बदल सकती है!

 

 

 

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