साम्प्रदायिक राजनीति की बजाय भारतीय पहचान पर हो जोर

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जब से नागरिकता संशोधन विधेयक कानून बना है, देश भर में अशांति एवं दंगों का माहौल बना हुआ है। विपक्ष के साथ-साथ बाहरी देश भी भारतीय नागरिकता कानून को भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि के विपरीत बता रहे हैं। लेकिन पता नहीं भाजपा क्यों देश में हिन्दुवाद को कट्टर बनाने की दिशा में बढ़ रही है? आदि-अनादिकाल से इस देश में कभी भी धर्म के आधार पर समाज को बांटकर नहीं देखा गया।

शैव-वैष्णव, द्वैतवाद-अद्वैतवाद, ईश्वरवाद-अनीश्वरवाद से लेकर बौद्ध, जैन, सिक्ख धर्मों का यहीं पर उदय हुआ, पारसी, ईसाई, मुस्लिम यहां आए उन्होंने इस देश को अपना घर बनाया चूंकि यह देश ही ऐसा था जो इस संसार को पूरा एक परिवार कहता है ‘वसुदैव कटुम्बकम’ इसी देश का सिद्धांत है जिस पर पूरी हिन्दू संस्कृति को गर्व है। लेकिन अब जो हो रहा है उससे किसी विदेशी को कोई नुक्सान नहीं होगा अपना ही देश रक्तरंजित होगा।

भाजपा व सरकार दोनों को जो अभी भी जिद्द पर अड़े हैं, सच्चाई उन्हें भी दिख रही है कि उनकी सोच से परे यहां नुक्सान हो रहा है। सरकार ने बल के द्वारा नागरिकता संशोधन बिल का विरोध करने वालों को दबाने की पूरी कोशिश कर ली लेकिन विरोध देश भर में फैलता जा रहा है। अब भाजपा घर-घर जाकर लोगों को समझाएगी कि कानून आखिर है क्या, लेकिन इस बिल को जब कानून बनाया जा रहा था तब भाजपा घर-घर क्यों नहीं गई? चूंकि अब साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले नेताओं ने पूरे देश के मुस्लिम वर्ग के दिलोदिमाग में भर दिया है कि नागरिकता संशोधन कानून उनके विरुद्ध है? तभी ज्यादातर धरने प्रदर्शनों में मुस्लिम धर्मावलम्भी मुखर विरोध कर रहे हैं। भाजपा मुस्लिम विरोध की राजनीति कर क्यों देश को बार-बार दंगों की प्रयोगशाला बना रही है?

1947 में देश विभाजन के वक्त देशवासियों ने हिंदू बनाम मुस्लिम की राजनीति करके देख लिया था तभी संविधान निमार्ताओं ने इस इतिहासिक गलती से सीख ली और देश को धर्मनिरपेक्षता की राह पर लेकर गए। अगर देश में कहीं कट्टरवाद बढ़ रहा है, भले ही वह किसी भी समुदाय में है तब इसे रोका जाना चाहिए न कि अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक की जोर आजमाइश का खेल खेला जाए। धार्मिक आजादी को देश में पुन: परिभाषित किया जाए जोकि सभी धर्मों पर लागू हो न कि किसी एक धर्म को निशाना बनाया जाए। इस बात में कोई शक नहीं है कि अब देश को धर्मान्धता से आजादी की जरूरत महसूस हो रही है, कोई भी धर्म भले वह अल्पसंख्यक है या बहुसंख्यक सार्वजनिक जीवन पर हावी नहीं होना चाहिए।

नागरिकता संशोधन कानून आज भले ही बहुसंख्यकों को खुश कर रहा हो लेकिन यह देश व समाज हित में नहीं है। देश के अंदर व बाहर भारतीयों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। देश में सामुदायिक सोहार्द को बढ़ाया जाए। क्षेत्रवाद, भाषावाद, संस्कृतिकबाद, सांप्रदायिकवाद की राजनीति को बंद किया जाए। ‘सब भारतीय हैं’ की पहचान बनाई जाए इसी में देश व देशवासियों की खुशहाली व शांति है।

 

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