सम्पादकीय

मानवीय योजनाओं की बजाए विकसित देशों का हथियार बनाने पर जोर

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मेरिका व रूस सहित विश्व के कुछ अन्य देश हथियारों की फैक्ट्री बन चुके हैं

भले युद्ध व आतंकवाद से लड़ने के लिए हथियार जरूरी हैं लेकिन विकसित देशों के लिए जब हथियार आय का स्त्रोत बन जाएं तो विकासशील व गरीब देशों के लिए नई मुश्किलें पैदा हो जाती हैं। अमेरिका व रूस सहित विश्व के कुछ अन्य देश हथियारों की फैक्ट्री बन चुके हैं जिनकी जीडीपी में हथियारों का बड़ा योगदान है। ताजा मामले में भारत ने रूस के साथ करीब 40,000 करोड़ के मिसाईल का सौदा किया है। इससे पहले ऐसे कई समझौते अमेरिका, फ्रांस व इज्रराइल के साथ किए हैं।हथियार भारत की जरूरत है। पाकिस्तान व चीन जैसे पड़ोसियों के मंसूबों को देखते हुए भारत हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता लेकिन भारत सहित अन्य देशों के आपसी टकराव ही विकसित देशों की आय बन गए हैं।

विकसित देशों ने खुद बना रखे हैं गुट

बेहद दुख की बात है कि जिस संस्था (संयुक्त राष्ट्र) का निर्माण ही दो विश्व युद्धों की बर्बादी को न दोहराने के लिए किया गया था उसी संस्था के सदस्य देश (अमेरिका, चीन, रूस व फ्रांस) हथियारों की फैक्टरियों को लगातार चला ही नहीं रहे बल्कि जो विकासशील देश हथियार खरीदने में देरी करते हैं उन पर शिकंसा भी कस देते हैं। इन आर्थिक नीतियों को देखते हुए आतंकवाद की कार्रवाईयां खेल प्रतीत होने लगी हैं। विकसित देशों ने खुद गुट बना रखे हैं और अपने-अपने साथी विकासशील देशों के साथ मित्रता के नाम पर अरबों के हथियार बेचे जा रहे हैं। विकासशील देशों का जितना पैसा हथियारों की खरीद में बह रहा है, उतने पैसे से उनके झुग्गियों में बसने वाले करोड़ों लोगों को शानदार घर बनाकर दिए जा सकते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, अनपढ़ता जैसी समस्याएं तो नजर भी नहीं आएंगी।

नए-नए हथियारों का अविष्कार करने की बजाय कैंसर व अन्य भयानक बीमारियों को रोकने पर हो फोकस

विश्व को केवल सुरक्षा की जरूरत नहीं बल्कि स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों, लैबोरेट्री, अस्पतालों, आधुनिक ट्रेनों व हवाई सेवाओं की आवश्यकता है। हथियारों की खरीद में प्रयोग किए जाने वाला पैसा भलाई कार्यों में इस्तेमाल किया जाए तो विश्व का नक्शा ही बदल जाएगा। परमाणु हथियारों का खात्मा करने के लिए विकसित देश पहल कर रहे हैं लेकिन लड़ाकू जहाज, मिसाइलों पर हो रहा खर्च आर्थिक बर्बादी ला रहे हैं। इस बर्बादी से आंखें नहीं फेरी जानी चाहिए। खुशहाल विश्व का सपना पूरा करना है तब केवल नए-नए हथियारों का अविष्कार करने की बजाय कैंसर व अन्य भयानक बीमारियों को रोकने के लिए खर्च करने की आवश्यकता है। युद्ध की बर्बादी कब होती है यह तो भविष्य की बात है लेकिन कैंसर जैसी बीमारियां हजारों जिंदगीयां लील रही हंै। विकसित देशों को नागरिक मुद्दों ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

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