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प्यार और सम्मान के हकदार हैं बुजुर्ग

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बुजुर्गों के प्रति बढ़ते दुर्व्यवहार व अन्याय के प्रति लोगों को जागरुक करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस का आयोजन किया जाता है। 14 दिसंबर 1990 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह निर्णय लिया था कि प्रतिवर्ष 1 अक्टूबर को बुजुर्गों के सम्मान तथा उनकी सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस का आयोजन किया जाए। सर्वप्रथम 1 अक्टूबर 1991 को इस दिवस का आयोजन किया गया, तत्पश्चात पिछले 28 सालों से यह दिवस विश्व के अनेक देशों में आयोजित किया जाता है। इस दिवस के आयोजन का एकमात्र लक्ष्य यह है कि लोगों को बड़े-बुजुर्गों के आदर और देखभाल के लिए प्रेरित किया जाए।।

देश में औद्योगीकरण और नगरीकरण के विस्तार के साथ परिवार के मूल स्वरुप में भी व्यापक परिवर्तन हुए हैं। वहीं, बदलते सामाजिक परिवेश में संयुक्त परिवारों का विखंडन बड़ी तेजी से एकल परिवार के रुप में हुआ है। अब गिने-चुने परिवारों में ही संयुक्त परिवार की अवधारणा देखने को मिलती है। शहरों में एकल परिवार का ही बोलबाला है, जबकि सामाजीकरण की इस प्रक्रिया से अब गांव भी अछूते नहीं रहे। हालांकि, विघटित संयुक्त पारिवारिक व्यवस्था के एकल स्वरुप ने आधुनिक और परंपरागत;दोनों पीढ़ियों को समान रुप से प्रभावित किया है। एक तरफ जहां, आज की कथित आधुनिक पीढ़ी परंपरागत पालन-पोषण, बुजुर्ग सदस्यों के प्यार-दुलार तथा सामाजिक मूल्यों-संस्कारों से दूर होती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ एकल परिवारिक व्यवस्था ने बुजुर्गों को एकाकी जीवन जीने को विवश किया है।

तिरस्कृत जीवन बिता रहे बुजुर्ग : देश में बुजुर्गों का एक बड़ा तबका या तो अपने घरों में तिरस्कृत व उपेक्षित जीवन जी रहा है या वृद्धाश्रमों में अपनी शेष जिंदगी बेबसी के साये में बिताने को मजबूर है। इस बीच, समाज में बुजुर्गों पर होने वाले मानसिक और शारीरिक अत्याचार के बढ़ते मामलों की तेजी ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। परिजनों से लगातार मिलती उपेक्षा, निरादर भाव तथा सौतेले व्यवहार ने वृद्धों को काफी कमजोर किया है। बुजुर्ग जिस सम्मान के हकदार हैं, वह उन्हें नसीब नहीं हो पा रहा है।

यही उनकी पीड़ा की मूल वजह है। दरअसल, देश में जन्म दर में कमी आने तथा जीवन-प्रत्याशा में वृद्धि की वजह से देश में वृद्धों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन दूसरी तरफ गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा व समुचित देखभाल के अभाव तथा परिजनों के दुत्कार की वजह से देश में बुजुर्गों की स्थिति बेहद दयनीय हो गई है। भारत इस वक्त दुनिया का सबसे युवा देश है। देश में युवाओं की तादाद 65 फीसद है। लेकिन, बीते दिनों अमेरिका के ‘जनसंख्या संदर्भ ब्यूरो’ द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2050 तक आज का युवा भारत तब ‘बूढ़ा’ हो जाएगा। उस समय देश में पैंसठ साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या 3 गुणी तक बढ़ जाएगी। सवाल यह है कि क्या तब हम अपनी ‘वृद्ध जनसंख्या’ की समुचित देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था कर पाएंगे?

सहनी पड़ती हैं यातनाएं: चैरीटेबल संस्था ‘हैल्पएज इंडिया’ द्वारा कुछ समय पहले देश के 23 शहरों में कराए गए सर्वेक्षण के बाद जो नतीजे सामने आए हैं, वे भी चौंकाने वाले हैं। शोध के मुताबिक, भारतीय घरों में कई तरीकों से बुजुर्गों को प्रताड़ित किया जा रहा है। इनमें परिजनों द्वारा अपमान, गाली-गलौच, उपेक्षा, आर्थिक शोषण तथा शारीरिक उत्पीड़न जैसे अमानवीय तरीके प्रमुखता से शामिल हैं। यह सब देखकर लगता है कि बुजुर्गों की सुरक्षा के लिहाज से भारतीय समाज दिन-ब-दिन असंवेदनशील होता जा रहा है। रिपोर्ट में यह बात भी उभरकर सामने आई है कि सताए गए 82 फीसदी बुजुर्ग अपने साथ हुए बुरे बर्ताव की शिकायत दर्ज ही नहीं कराते हैं। वे इन मामलों को पारिवारिक मानकर छोड़ देते हैं या भविष्य की असुरक्षा को सोचकर भूल जाना पसंद करते हैं। हालांकि, जिस गति से देश में बुजुर्गों के मान-सम्मान में कमी आई है, वह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के अवमूल्यन को परिलक्षित करती है!

बड़ों के महत्व से अंजान वर्तमान पीढ़ी: भारतीय संस्कृति में बड़ों का सम्मान और आदर करना आदर्श संस्कार रहा है, लेकिन उपभोक्तावाद, भौतिकवाद और पाश्चात्य संस्कृति को आत्मसात करने में हम इतने मशगूल हैं कि हमें ‘अपनों’ की फिक्र ही नहीं है। आज हम उन्हीं को सम्मान दे रहे हैं, जिससे हमें कुछ लाभ की उम्मीद होती है। जबकि घर के सदस्यों का सम्मान लाभ-हानि के सिद्धांत से परे है। बुजुर्ग भले ही आर्थिक रुप से अनुत्पादक होते हैं, किंतु परिवार को उचित दिशा दिखाने में उनकी महत्ती भूमिका होती है। कुछ दशक पूर्व तक घर के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा बच्चों को सुनाई जाने वाली पंचतंत्र, हितोपदेश की कहानियां तथा जातक कथाएं बच्चों को मनोरंजन कराने के साथ ही, उन्हें समझदार और संस्कारी बनाने में मदद करते थे।

बचपन में बच्चों को मिले सामाजिक आदर्श, मूल्य व नैतिकता से ही सभ्य समाज के निर्माण पर बल मिलता था। लेकिन, आज परिस्थितियां बदल गयी हैं। विडंबना है कि जब बच्चे को दादा-दादी की गोद की जरुरत होती है, तब वे शहर के किसी ‘किड्स प्ले स्कूल’ में रो रहे होते हैं। बच्चे कुछ और बड़े होते हैं तो, उन्हें दादी-नानी से कहानियां सुनने के अवसर देने के बजाय उसके हाथों में अभिभावकों द्वारा वीडियो गेम, मोबाइल फोन आदि थमा दिए जाते हैं। नयी पीढ़ी का परंपरा, संस्कार व सामाजिक मूल्यों से दूर होने का एक बड़ा कारण बुजुर्गों की अवहेलना है।

कानून की जरूरत क्यों : भारत में वृद्धों की सेवा और उनकी रक्षा के लिए कई कानून और नियम बनाए गए हैं। केंद्र सरकार ने भारत में वरिष्ठ नागरिकों के आरोग्यता और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1999 में वृद्ध सदस्यों के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार की है। इस नीति का उद्देश्य व्यक्तियों को स्वयं के लिए तथा उनके पति या पत्नी के बुढ़ापे के लिए व्यवस्था करने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसमें परिवारों को अपने परिवार के वृद्ध सदस्यों की देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित करने का भी प्रयास किया जाता है। इसके साथ ही, 2007 में ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण विधेयक’ संसद में पारित किया गया है।

इसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्थापना, चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है। हमारा समाज किस दिशा की ओर जा रहा है, विचार करने की जरुरत है, क्योंकि इससे दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि नैतिक जिम्मेदारी समझने की बजाय बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा के लिए हमें कानून बनाने पड़ रहे हैं!घर के बुजुर्गों की सुरक्षा की जिम्मेदारी महज सरकारी दायित्व मानकर अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ना अनुचित है।

समझनी होगी जिम्मेदारी : बुजुर्गावस्था, मानव जीवन की संवेदनशील अवस्था है। बुजुर्ग, प्यार और सम्मान के मोहताज होते हैं। बुजुर्गों की भावनाओं का सम्मान करना परिजनों का दायित्व है। आखिर हमें भी कभी उम्र की उस दहलीज पर कदम रखना है, लिहाजा इस दर्द को हमें समझना होगा। बुजुर्गों को समय पर भोजन, दवा, शौच सुविधाएं तथा कुछ पल घर के सदस्य उनके साथ समय गुजारने को मिलें, तो प्यार व सम्मान के भूखे बुजुर्गों की पीड़ा को निश्चित रुप से कम किया जा सकता है। बढ़ती उम्र के साथ, जब तमाम तरह के रोगों से शरीर जीर्ण होने लगता है तथा शारीरिक और मानसिक थकान जीवनशैली पर हावी हो जाती है, तब वारिसों का उनके प्रति असहयोग व अनादर की भावना कितना उचित है? यह सोचने की जरुरत है।

सुधीर कुमार

 

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