बुजुर्गों की ‘मनोदशा’ को न होंने दें ‘लॉक’

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Do not let the 'mood' of the elderly be lock
बुजुर्गों की सुविधाओं का रखें खयाल: लॉकडाउन की वजह से बुजर्गों की स्थिति बिगड़ रही है। घर में कैद होने से मनोरोगी होने की अधिक सम्भावना बढ़ गई है। इस हालत में हमें बुजुर्गों की हर सुविधाओं का खयाल रखना होगा। क्योंकि हमारे पास मन को बहलाने के लिए कई उपाय हैं। जिसमें टीवी, मोबाइल, पुस्तकें , वीडियो गेम, लूडो, गीत- संगीत के साथ दूसरे विकल्प भी हैं। आम तौर पर बुजुर्गों को परिवारों में अकेला देखा जाता हैं। उनसे कोई बात करना पसंद नहीं करता। घर में सलाह तक नहीं मानी जाती है। जिसकी वजह से स्थिति बिगड़ती है।
दुनिया भर में कोरोना संक्रमण की वजह से आपातकाल की स्थिति है। कोविड- 19 वायरस से तबाही मचा कर दिया है। महामारी ने इस तरह के हालात पैदा कर दिए हैं कि लोग घरों में बंद हैं। पूरा देश लॉकडाउन में हैं। अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियां इस वायरस के सामने घुटने टेक दिया है। सभ्यताओं पर संकट खड़ा हो गया है। संस्कृतियों पर ग्रहण लग गया है। इंसानों में मानवीयता का संकट खड़ा हो गया है। समाज के एक वर्ग के सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है। दुनिया वैश्विक मंदी की तरफ बढ़ रही है। कोरोना का भय इतना है कि लोग भयवश आत्महत्या कर रहे हैं। घरेलू हिंसा बढ़ रही हैं। बुजुर्गों की मनोदशा बिगड़ रही है। वह अकेलापन महसूस कर रहे हैं। जीवन को लेकर उनके भीतर डर पैदा हो गया है। समाज में नई प्रकार की हिंसा पनप रही है। लोगों में जीवन की आशंकाओं को लेकर आत्महत्या की प्रवित्ति तेजी से पनप रही है। आनेवाला वक्त भयावहता की घंटी बजा रहा है। लेकिन हम आंतरिक साहस को मजबूत कर इस लड़ाई को जीत सकते हैं। दुनिया में ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसे इंसान सम्भव न बना पाए।
बुजुर्गों की सुविधाओं का रखें खयाल: लॉकडाउन की वजह से बुजर्गों की स्थिति बिगड़ रही है। घर में कैद होने से मनोरोगी होने की अधिक सम्भावना बढ़ गई है। इस हालत में हमें बुजुर्गों की हर सुविधाओं का खयाल रखना होगा। क्योंकि हमारे पास मन को बहलाने के लिए कई उपाय हैं। जिसमें टीवी, मोबाइल, पुस्तकें , वीडियो गेम, लूडो, गीत- संगीत के साथ दूसरे विकल्प भी हैं। आम तौर पर बुजुर्गों को परिवारों में अकेला देखा जाता हैं। उनसे कोई बात करना पसंद नहीं करता। घर में सलाह तक नहीं मानी जाती है। जिसकी वजह से स्थिति बिगड़ती है। लॉकडाउन यह स्थिति और बिगाड़ सकता है। आप इसका पूरा खयाल रखें। घर में कोई बुजुर्ग माँ- बाप और भाई है तो उसका विशेष ध्यान रखें। यह मेरा सामाजिक और पारिवारिक दायित्व के साथ नैतिक फर्ज भी है।
जीवनसाथी की रिक्तता से बढ़ता है खालीपन: काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एआरटी सेंटर में तैनात वरिष्ठ परामर्शदाता एवं मनोचिकित्सक डा. मनोज तिवारी ने लॉकडाउन में बुजुर्गों की मनोस्थिति का अच्छी तरह विश्लेषण किया है। इन सुझावों के जरिये हम बुजुर्गों को इस भय से निकाल सकते हैं। क्योंकि उनके अंदर कोरोना संक्रमण को लेकर काफी भय है। लॉकडाउन में बुजुर्गों को कभी अकेला न रहने दें। अकेलापन उनके भीतर निराशा और हताशा का भाव पैदा करता है। जिसकी वजह से जीवन में नैराश्यता का भाव पैदा होता है। उम्र दराज लोगों से हमेशा बातचीत करते रहिए। उनके भीतर संवाद शून्यता का भाव पैदा न होने पाए। उन्हें यह न महसूस हो कि वह परिवार में अलग- थलग हैं, उनकी चिंता किसी को नहीं है। बुजुर्गो में जीवनसाथी की रिक्तता के बाद उदासीनता आ जाती है। वह अपनी पीड़ा और इच्छा किसी से व्यक्त नहीं कर पाते उस स्थिति में उनका खास ध्यान दिया जाय। लॉकडाउन की वजह से ऐसी स्थित बन सकती है या बनी होगी।
फ्रेंडली व्यवहार से जीतें दिल: डॉ. तिवारी के अनुसार उपेक्षा की वजह से बुजुर्गों में आत्मविश्वास की कमी होने लगती है। जिसका असर उनकी जीवन शैली पर पड़ता है। उनके दिमाग में इस व्यवहार से यह भावना उभर आती है कि अब उनका जीवन किसी काम का नहीं। परिवार के लिए उन्होंने ने जो बलिदान दिया ढलती उम्र में वह मूल्यहीन साबित हो रहा है। अगर बुजुर्ग किसी गम्भीर बीमारी जैसे कैंसर, शुगर, हार्ट, दमा या अपंगता के शिकार हैं तो मुशिकलें और बढ़ जाती हैं। इसका सीधा असर उनके स्वस्थ्य पर पड़ता है। इसलिए उन्हें यह कभी भी महसूस न होने दिया जाय कि आपातकाल या सामान्य दिनों में वह अकेले हैं। अगर वह अपंग हैं तो उनकी भरपूर देखभाल की जानी चाहिए। हमें उनकी सुविधाओं का खयाल रखते हुए खुद बैसाखी बन जाना चाहिए। अगर वह सरकारी सेवा से रिटायर हुए हैं और पेंशन पाते हैं तो उनके पैसे का उपयोग उनकी मर्जी से किया जाय। जहाँ वह कहें उसे खर्च किया जाय। अगर उन्हें पेंशन के पैसों की जरूरत है तो उन्हें दिया जाय। इससे बुजुर्गों के भीतर एक संतुष्टि का भाव उत्पन्न होगा और उनकी मनोस्थित पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
बच्चों के साथ बुजुर्गों का बहलता है मन: परिवार में हम थोड़ी सी सतर्कता से बुजुर्गों की मनोदशा को जीत कर उनके जीवन को और खुशहाल बना सकते हैं। डॉ. तिवारी के अनुसार रोजमर्रा की जरूरतों को समय से एवं सही तरीके से पूर्ण किया जाए। हमें उनमें एकदम घुलमिल जाना चाहिए। घर के सदस्य बुजुर्गों से नियमित बात करते रहें। उनकी बातों को सुनने का प्रयास करें तथा यह प्रदर्शित करें की परिवार के सदस्य उनकी बातों को गंभीरता से लेते हैं। उनकी सलाह को प्रथमिकता भी दें। परिवार के बच्चों को बुजुर्गों के साथ खेलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चों के साथ बुजुर्गों का मन खूब लगता है। उस स्थिति में बच्चों को उनके साथ रखना चाहिए। अगर वे पढ़े- लिखें हैं तो बच्चों के लिए सबसे अच्छे ट्विटर के साथ मार्गदर्शक भी बन सकते हैं। बच्चों के साथ बुजुर्गों का समय आनंद पूर्वक गुजरता है। बुजुर्ग बच्चों को कहानियां एवं किस्से सुना करके ना केवल अपना समय व्यतीत करते हैं बल्कि इससे बच्चों को भी नैतिक एवं संस्कार की शिक्षा का ज्ञान भी देते हैं।
बीमारी की हालत में रखें विशेष खयाल :
परिवार में घर के जिस स्थान पर बुजुर्ग रहते हैं उसे हमेशा साफ सुथरा रखें। उनके कपड़ों की धुलाई नियमित करें। बिस्तर कभी गंदे ना रखें। अगर वह बीमार हैं तो विशेष सफाई रखें। कोशिश कर उन्हें बाई के सहारे न छोड़े। ओल्ड होम में उन्हें न ले जाएँ। समय निकाल कर यह जिम्मेवारी खुद निभाएं। अपनी जुबान से अपशब्द का प्रयोग बिल्कुल न करें। ढलती उम्र में मानसिक स्थिति कमजोर होती है, उस दौरान उनसे कई गलतियां स्वाभाविक हैं। उसे बिल्कुल नजरअंदाज करें। खानपान की सुविधा का भी ध्यान दीजिए। उनकी दवाइयों को समय से दिया जाय। इस दौरान उनसे साहस भरी बातें की जाएं। उनका मन बहलाया जाय। बीमारी से जीतने का हौसला बढ़ाया जाय। मन में आने वाले बुरे विचारों को हावी न होने दिया जाय। आम तौर पर बच्चों और बूढों में खाने- पीने की अधिक इच्छा होती है। घर में जो भी खाद्य वस्तु लाएं वह सबसे पहले बुजुर्गों को उपलब्ध कराएं। इस तरह की सुविधाओं का खयाल रख हम उनकी जीवन आशा को और अधिक बढ़ा सकते हैं। लॉकडाउन जैसे भय और पैदा होनेवाले अवसाद से उन्हें निकाल कर सुखद जीवन शैल उपलब्ध करा सकते हैं।
प्रभुनाथ शुक्ल
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