भारतीय लोकतंत्र के मंदिरों को अपमानित नहीं करें मायावती

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उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री कु. मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा देकर एक बार पुन: अपने-आपको दलित मसीहा के तौर पर स्थापित करने की जद्दोजहद छेड़ दी है। जब से देश में राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा तत्पश्चात कांगे्रस ने दलित उम्मीदवारों पर दांव खेला है, दलित कार्ड खेलने वाले अन्य कई नेता व दल बेचैन हो गए हैं। देश की आजादी के बाद संविधान निर्माण के वक्त संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भारत के शोषित, दबे-कुचले लोगों के लिए कुछ विशेष अवसर जोड़ने के लिए संविधान में आरक्षण की नीति को तैयार किया। चूंकि डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्वयं एक दबे-कुचले परिवार में जन्मे थे, उन्हें अहसास था कि तब के भारतीय समाज में शोषित व दबा-कुचला होना कितना बड़ा अभिशाप था।

महात्मा गांधी ने भी तब ऐसे करोड़ों भारतीयों को हरिजन कहकर पुकारा था। भारतीय समाज में पुरानी शासन व अर्थव्यवस्था जाति आधारित थी, जहां किसी भी व्यक्ति के लिए जन्म पूर्व ही निर्धारित था कि किसे क्या काम करना है एवं उसके अधिकार कर्त्तव्य क्या रहेंगे। निश्चित रूप से भारत के संविधान में ऐसे शोषित व दबे-कुचले वर्ग के लिए कुछ विशेष स्थान, अवसर उपलब्ध करवाया जाना निहायत ही जरूरी था। परंतु डॉ. भीमराव अंबेडकर की इस स्वस्थ सोच, एवं व्यवस्था परिवर्तन की नीति को सत्ता लोलुप नेताओं ने अपने वोट बैंक का अचूक अस्त्र बना लिया, जिसे कि अब ये नेता भारतीय राजनीति में हर मंच पर, हर चुनाव में अपने लिए एक ढाल की तरह अजमाने लगे हैं।

कु. मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दिया कि वह दलितों एवं पीड़ितों के लिए आवाज उठाना चाहती हैं, क्योंकि देश की संसद उसे महज तीन मिनट का ही समय दे रही है, यह दलितों के साथ ज्यादती है वगैरह-वगैरह। यहां इस्तीफा देकर मायावती साफ-साफ राजनीतिक नौटंकी कर रही हैं। पूरे देश से पहले उत्तरप्रदेश की ही बात कर ली जाए, जहां कु.मायावती को राज्य के दलितों सहित अन्य वर्गों ने एक नहीं, तीन बार मुख्यमंत्री बनाया, वहां दलितों के लिए ये नेता इतना भी नहीं कर पाई कि लोग दो जून की रोटी को सम्मानजनक ढंग से कमा कर खा पाएं। 15 वर्ष के करीब इस दलित नेता पूरा शासन चलाने का समय दिया गया, फिर भी वह महज तीन मिनट की दुहाई दे रही हैं।

इतना ही नहीं, भारतीयों ने अपने सर्वोच्चय पद के लिए दलित नेताओं को उम्मीदवार बनाया, जिनमें एक अब भारत के राष्ट्रपति होंगे, ऐसे में मायावती का यह आरोप कि उन्हें दलितों की बात रखने के लिए राज्यसभा में वक्त नहीं दिया जा रहा, महज राजनीतिक पैंतरा ही कहा जा सकता है। कु. मायावती की असलियत यह है कि दलित राजनीति के नाम पर इस नेता ने करोड़ों रुपए का चंदा इकट्ठा किया है। गरीबों के चंदे से एवं गरीबों द्वारा अपना नेता चुन लिए जाने पर भी मायावती ने उनके लिए कुछ नहीं किया और स्वयं राजसी जीवन जी रही हैं। कु. मायावती को यदि अपना खोया हुआ राजनीतिक जनाधार पाना है, तब वह इसके लिए ईमानदार होकर सड़कों एवं सदन में दलित वर्ग के लिए संघर्ष करें, न कि भारतीय लोकतंत्र के पवित्र मंदिरों लोकसभा व राज्यसभा को अपमानित करें, जिनमें कि सवा सौ करोड़ भारतीयों की आस्था है, जोकि भारत के गौरव का प्रतीक हैं।

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