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परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर भी निराश न हों

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किसी भी परीक्षा में असफल होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आपके अंदर टैलेंट की कमी है। आज की युवा पीढ़ी को जब पता चलता है कि परीक्षा में उसके कम अंक आए हैं या फिर वह फेल हो गया है, तो बच्चा खाना पीना बन्द कर देता है। अपने माता-पिता और पूरे परिवार से ठीक से बात भी नहीं करता। उनके दिमाग में तनाव इतना बढ़ जाता है कि वह अपने मन में आत्महत्या जैसा घोर अपराध करने की ठान लेता है, जबकि यह बिल्कुल गलत है। ऐसा कभी नहीं करना चाहिए।

अगर आप किसी वजह से फेल हो जाते हैं, तो अपने मन में यह सोचें कि पढ़ाई को आपसे जितनी मेहनत की उम्मीद थी, आप उतनी मेहनत नहीं कर पाए। वैसे तो होना यह चाहिए था कि आप अच्छी डिवीजन से पास होते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब आप मान लीजिए कि आप 40 या 50% अंक लाकर पास हो भी जाते, तो क्या आप ग्रेजुएशन या डिप्लोमा के एंट्रेंस पेपर को पास कर पाते? मेरा मानना है कि नहीं।

लेकिन यह असंभव भी नहीं है। एन्ट्रेंस पेपर पास कर सकते हो, लेकिन अगर आपने बारहवी में अच्छे से पढ़ाई नहीं की है, तो ग्रेजुएशन पेपर पास करने के लिए अब पहले से दोगुनी पढ़ाई करनी होगी, लेकिन यह तो साबित हो ही गया है कि जब आप बारहवी में ही पढ़ाई नहीं कर पाए, तो एंट्रेंस पेपर के लिए दोगुनी पढ़ाई भी नहीं कर पाएंगे।

वैसे तो आपको पहले साल में ही अच्छे अंक पाकर परीक्षा उत्तीर्ण करनी चाहिए थी, लेकिन अगर आप अनुत्तीर्ण हो ही गये हो, तो उसकी टेंशन न लेकर इस सोच से आगे बढ़ें कि इस साल मैंने पास होने लायक पढ़ाई नहीं की थी, इसलिए मैं फेल हो गया, लेकिन अगले साल को होने वाली परीक्षा में मुझे 75 या 80 प्रतिशत अंकों से पास होना है और नॉर्मली विद्यार्थी दूसरे साल में 75 या 80 प्रतिशत अंक ला सकता है।

आजकल के बच्चों पर स्मार्टफोन और सोशल वर्क का खुमार इस कद्र चढ़ा हुआ है कि वे पढ़ाई और खाने-पीने व परिवार में रिश्ते निर्वाह करने से ज्यादा मोबाइल फोन में व्यस्त रहने लगे हैं। कुछ बच्चे तो इंटरनेट पर इतने व्यस्त हो जाते हैं कि पढ़ाई को बिल्कुल भूल ही जाते हैं और आगे चलकर यही बच्चे परीक्षा पास करने में असफल साबित होते हैं।

फिर दोष मढ़ते हैं मां-बाप या अध्यापकों के सिर पर। मां बाप को कहते हैं कि आपने ट्यूशन नहीं लेने दिया। घर में पढ़ाई करने की बजाय अन्य कामों में लगाए रखा, इसलिए मैं फेल हो गया… इत्यादि। और कई बार तो फेल होने के बाद कहते हैं कि टीचर ने ठीक से पढ़ाया ही नहीं। मां-बाप और टीचर पर ऐसा दोष लगाना बिल्कुल गलत है। अगर आपको टीचर ने पढ़ाया नहीं, तो कक्षा में बाकी बच्चे कैसे पास होकर मेरिट में नंबर ले आए? इसलिए विद्यार्थियों के फेल होने का श्रेय मां-बाप या अध्यापक को न देने की बजाय, अपनी गलती को स्वीकार करनी चाहिए।

एक बात यह भी है कि वर्तमान के भौतिकतावादी युग में हर किसी को पैसा कमाने की होड़ सी लगी रहती है। इसी होड़ में अध्यापक व अभिभावक भी कम नहीं हैं। बहुत बार अध्यापक केवल पैसे को ही अपना ध्येय बना लेता है। इस कारण वह उसे बच्चों की शिक्षा की तरफ कोई खास ध्यान नहीं देते। हालांकि बच्चे अच्छी-खासी फीस ट्यूशन व स्कूल में देते हैं, फिर भी अध्यापक अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री मात्र करके बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं।

दूसरी तरफ अभिभावकों का दोष भी कम नहीं है। अपने-आपको दूसरों से बेहतर दिखाने के चक्कर में वह बच्चों के ऊपर बिना उसकी मर्जी जाने ही अपनी मर्जी थोप देते हैं। जैसे कि बच्चा पढ़ाना तो कुछ और चाहता है, लेकिन मां-बाप दूसरों की देखा-देखी उन्हें किसी अन्य कोर्स में एडमिशन दिला देते हैं। ऐसे में बच्चा प्रेशर में आ जाता है और अच्छे से पढ़ाई नहीं कर पाता।

अत: अध्यापक, अभिभावक व विद्यार्थियों को अपने-अपने स्तर पर जागरूकता होने की आवश्यकता है। सबको सोचना होना कि आखिर यह बच्चे ही देश का भविष्य हैं। इन्हें सही मार्ग व उचित शिक्षा मिले, तो अवश्य ही बच्चे समाज कल्याण में अहम् भूमिका निभाएंगे।

-गौरव चौहान, हस्तिनापुर

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