मोह

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पिताजी अब नहीं रहे। बस, अस्सी साल की बूढ़ी माँ है। उसे यह घर छोड़ना होगा। हफ्ते भर से बेटा आया हुआ है। माँ को ले जाने से पहले उसे सारा सामान ठिकाने लगाना है, लेकिन कैसे लगाए? जिस अलमारी को खेलों, वहीं पर सामान मुंबई की लोकल ट्रेन की तरह ठुंसा पड़ा है। बेटा कुछ सालों से कहता आ रहा है कि मोटा सामान निकाल दो। लेकिन माँ का फालतू का मोह कभी इस बात को नहीं माना। ले देकर कुछेक छोटी-मोटी चीजें माली और कामवाली को दी थीं, बस।
आते ही उसने सबसे पहले ट्रंकों वाला कमरा देखा था। कमरा मानों ट्रंकों का शोरूम ही था। लोहे की बाबे आदम के जमाने की तीन भारी -भरकम पेटियाँ, फिर बड़े ट्रंक से छोटी अटैची तक कोई पन्द्रह नग बड़े करीने से ईंटों पर सजे हुए। पेटियों में ही दस बारह रजाइयाँ-गद्दे और इतने ही कंबल, खेस, चादरें थी-यह माँ बता चुकी थी। बताओ, इन्हें किसलिए संभाल रखा है। कितनी बार कहा हैमोह छोड़ों, पर नहीं।
गहरी खीझ के साथ बेटे ने कप-बोर्ड के खाने देखने शुरू किए। वहां बदबूदार सीलन भरे खानों में बेतरतीब कपड़ों का आतंककारी साम्राज्य था। हर खाने में पॉलीथीन के ढेर सारे लिफाफे मानों जब से घर में आए, फेंके ही न गए हों। ‘फालतू के मोह में घर को कबाड़खाना बना दिया है।’ वह अपने आपमें बुदबुदाया।
वह चाय बनाने के लिए उसोई में गया। सामने की सात-आठ फ्राई-पेन और एक से पाँच लीटर तक हर साइज के कुकर पंक्तिबद्ध पड़े मुस्करा रहे थे। बताओ इतनों की क्या जरूरत थी? दो जीव और सारे जहाँ का सामान! चार-चार मूली कुतरे किसलिए, जब एक बार में एक का ही इस्तेमाल होना है। दर्जन भर तो चाकू इकट्ठे कर रखे हैं, जैसे किसी का कत्ल करना हो। कोने में दर्जन भर छोटी-बड़ी कड़छियाँ जिराफ की तरह गर्दन निकाले खड़ी थीं। गुस्से में भरा वह चाय बनाए बिना बाहर आ गया।
माँ-बेटे में पिछले एक हफ्ते से सामान खपाने की कवायद होती रही। बच्चों के लिए, मंदिर में देने के लिए, जमादार, कूड़े-कबाड़ी और जल प्रवारह के लिए हिस्से बनाए जाते रहे हैं।
आज माँ ने सबसे बड़ा ट्रंक खोलने के लिए बेटे को चाबियाँ थमाईं ट्रंक नीचे उतरने पर माँ ने सामान देखना शुरू किया। सबसे ऊपर कोई पचासेक स्कार्फ और टोपियाँ रखी थी। माँ ठण्ड बहुत मानती है, पर बेटे के सब्र का बाँध टूट गया। बोला- ‘क्या बेकार का ढेर इकट्ठा कर रखा है। इतनी टोपियों का क्या मतलब है? इनमें से पाँच-पाँच रख लो बस।’
‘ये हलके और ज्यादा ठंडे मौसम के लिए अलग-अलग हैं। ये सब साथ लेकर जाऊंगी।’ माँ निर्णायक स्वर में बोली।
टोपियों के नीचे आठ-दस स्वेटर देखकर बेटे का पारा और चढ़ गया। स्वेटरों की एक अलमारी तो पहले से ठूंस रखी है। उसने सोचा। पर माँ वहाँ कोई खास चीज तलाश रही थी। स्वेटरों के बीच में गत्ते का डिब्बा उसे मिल गया, जिसे उसने बेटे की तरफ बढ़ा दिया।
‘अब इसमें क्या है?’ बेटा मानो तड़प उठा।
माँ ने डिब्बा खोला और कहा-‘ये तू रख।’ हलके रंग के नवजात शिशु जैसे मुलायम जालीदार दो स्वेटर उसे देते हुए माँ ने कहा-‘मेरे पोते-पोती का ब्याह होगा, उनके बच्चों के लिए हैं।’ कहते हुए माँ के झुर्रीदार चेहर पर रंगत आ गई।
एक क्षण में बेटे का सारा क्रोध बह गया। वह संज्ञाशून्य-सा हो गया। फिर आँसूओं की धारा बह निकली।

लेखक : अशोक भाटिया, करनाल

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