सम्पादकीय

रेलवे में गंदगी का आलम

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 रेलवे का खाना नहीं रहा मनुष्य के खाने लायक

एक तरह जहां राज्य सरकारें ‘सांझी रसोई’ में10 रूपए में सस्ता खाना मुहैया करवा रही हैं वहीं दूसरी तरफ रेलवे विभाग खराब खाने के मामले में चर्चित हो गया है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रेलवे का खाना मनुष्य के खाने के लायक नहीं रहा। खाने में चूहों, काकरोच, व अन्य कीड़े-मकौड़ों का आना आम सी बात है। इसी तरह एक्सपायरी उत्पाद भी बेचे जा रहे हैं। मक्खियां, चीटिंया व धूल से बचाने के लिए खाने वाली वस्तुएं ढककर भी नहीं रखी जा रही। रेल सेवा भारत की जीवन रेखा है। रेल के माध्यम से करोड़ों लोग रोजाना यात्रा करते हैं।

रोजाना सैकड़ों किलोमीटर यात्रा करने वाले लोगों के लिए रेल के भीतर व स्टेशनों पर उपलब्ध खाने पीने की वस्तुएं ही पेट भरने के लिए जरूरी होती है। हालांकि रेल विभाग द्वारा खाद्य वस्तुओं के रेट भी तय किए जाते हैं व लिखवाए भी जाते है लेकिन लालची ठेकेदार मनमर्जी के कई गुणा रेट वसूलते हैं। स्टेशनों पर गंदगी तो पहले ही बहुत ज्यादा है जो रेलवे मैनेजमेंट के लिए चुनौती बनी हुई है। गंदगी व सस्ता सफर होने के बावजूद लोग रेल में सफर करते है।

ठेकेदारों के खिलाफ हो सख्त कार्रवाई

साफ सुथरा रेलवे स्टेशन केवल प्लेटफार्म के फर्श पर झाडू पोचे से नहीं बनता बल्कि आसपास फैली गंदगी खत्म करने व साफ सुथरा खाना मुहैया करवाना भी जरूरी है। खाने पीने की वस्तुओं की चैकिंग होना जरूरी है। नियमों की पालना न करने वाले ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है। यह कहना गलत नहीं होगा कि रेलवे में सफाई के लिए क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे। रेल मंत्री सुरेश प्रभु आम यात्रियों की शिकायतें तुरंत हल करने में प्रसिद्ध है। उन्हें सफाई मामले की तरफ भी ध्यान देना होगा। देश के सभी नागरिक बराबर हैं।

रेल यात्रियों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। मैट्रो ट्रेन हमारे देश में ही बनी है व वहीं के स्टेशनों के प्रबंध व साफ-सफाई को पहली बार देखने वाले लोग सपना देखने की तरह महसूस करते है। ऐसे प्रबंध ही आम शहरों के रेलवे स्टेशनों पर होने चाहिए। यहां का खान-पान ऐसा ना हो कि यात्री अपने साथ बीमारियां लेकर घर जाएं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की है। रेलवे विभाग भी इस मुहिम में अपना सहयोग दे।

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