सम्पादकीय

डिजीटल इंडिया में भूत-प्रेत कहकर मारे जा रहे निर्दोष

Digital India is innocent of being killed by ghosts

एक तरफ देश चंद्रमा पर जाने के लिए सैटेलाइट छोड़ने के लिए तैयार है, वहीं दूसरी तरफ देश अंधविश्वास में बुरी तरह से जकड़ा हुआ है। विशेष तौर पर गरीब व पिछड़े क्षेत्रों के अधिकतर लोग अंधविश्वास की चपेट में हैं। झारखंड में बुजुर्गों सहित चार लोगों को भूत-प्रेत की संज्ञा देकर उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। यह काम किसी एक व्यक्ति ने किया हो तो बात अलग है, हत्या करने वाली पूरी भीड़ थी। इससे यह प्रतीत होता है कि पूरा गांव ही अंधविश्वासी था। यह हाल किसी एक गांव का नहीं बल्कि झारखंड सहित कई राज्यों के पिछड़े क्षेत्रों का है।

ऐसी घटनाएं ही पिछले कई सालों में चोटी काटने के नाम पर भी चर्चा में रही थी। यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि प्रत्येक वर्ष 50-100 जानें अंधविश्वास की भेंट चढ़ जाती हैं, जहां अच्छे-भले व्यक्ति को भूत बताकर मार दिया जाता है। धर्म व विज्ञान दोनों अंधविश्वास के खिलाफ हैं। ज्ञान-विज्ञान के प्रसार से ही अंधविश्वासों को रोका जा सकता है। ऐसी घटनाओं का सरकारी व राजनीतिक स्तर पर कोई संज्ञान नहीं लिया जाता। दरअसल पिछड़े लोग महज वोट की एक फसल हैं जिसे चुनावों के समय में काटा जाता है। हम बड़े लोकतंत्र और सफल लोकतंत्र के दावे करते हैं, इन दावों का आधार यह है कि इस बार लोक सभा चुनावों में वहां भी पोलिंग स्टेशन बनाया गया जहां केवल एक ही वोटर था। लोकतंत्र की सफलता केवल वोटिंग करवाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि लोगों की भलाई के साथ होनी है। वोटर को अपने रहन-सहन का ज्ञान होना भी जरूरी है।

अशिक्षित व अंधविश्वास में फंसे लोग सफल लोकतंत्र की निशानी नहीं हो सकते। शहरी क्षेत्रों ने शमशानघाटों को संवारकर सैर करने का स्थान बना दिया है, लेकिन पिछड़े क्षेत्रों में शमशान घाट का भय आज भी बना हुआ है कि मरा हुआ व्यक्ति कभी भी उठकर रास्ते में मिल सकता है। डिजीटल इंडिया के नेताओं को पिछड़े वर्ग की सुध लेनी चाहिए। इनके सुधार के लिए कोई ठोस नीति बनाई जानी चाहिए। विश्व के विकसित देशों को इंजीनियर व डाक्टर देने वाले देश के अपने लोग अंधविश्वास या भ्रम के चलते नहीं मरने चाहिए।

 

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