सम्पादकीय

दिल्ली में अन्नदाता पर तानाशाही

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अन्नदाता एक ऐसा शब्द जो पूरे देश को अन्न का दान करता है जिसकी खून पसीने की मेहनत से बड़े से बड़ा अधिकारी पेट भरता है 2 अक्तूबर को वही अन्नदाता दिल्ली की सीमा पर अपना हक पाने के लिए पानी की बौछार, लाठियां, आंसू गैस गोले और गोलियां खा रहा था। जो काया पूरे देश का पेट भरने के लिए चिलचिलाती धूप में पसीने से तरबतर होती है वही क्यों दिल्ली में खून से लथपथ थी?

वो खून किसी किसान का नही भारत माँ की धरती का खून था क्योंकि इसी खून पसीने की मेहनत से किसान धरती में से सोना निकालता है, बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि :- सबका पेट भरने को धूप में पसीने से तरबतर रहती है जो काया।कल दिल्ली की सड़कों पर उसी पर था आंसू गैस और लाठी का साया।लाल बहादुर शास्त्री जी द्वारा दिया गया नारा ‘जय जवान जय किसान’ जिसे आज उसी के जन्मदिन पर सरकार ने निरर्थक साबित कर दिया।शर्मसार है आज पूरा भारत जिसकी मेहनत से सरकार ने पेट भरा उसी के खून की प्यासी सरकार ने इतनी तानाशाही उस पर दिखाई कौन है इसका कसूरवार, वो किसान जो अपनी फसल का भुगतान चाहता है?

वो किसान जो सरकार द्वारा किया गया कर्ज माफी का वायदा उसे याद दिलाना चाहता है? या वो किसान जो अपने परिवार का पेट भरने के लिए अपनी पूरी फसल खरीदने को कहता है? सरकार के इस रवैये को देखकर किसान होना एक गुनाह सा प्रतीत होता है आखिर क्या साबित करना चाहती है ये सरकार चारों तरफ ये रवैया अपनाकर, क्यों ये वोट बटोरने के लिए झूठे वायदे करते हैं जब इन्हें निभा नहीं सकते तो, क्यों भूल जाती है सरकार कि जिस कुर्सी के बल पर ये तानाशाही कर रहे हैं वो इनकी नहीं है वो इस जनता ने ही इन्हें दी है और अगर आज वक़्त सरकार का है तो आगे आने वाला वक़्त इस जनता का है जिसका जवाब वो सरकार को जरूर देगी और अब वक्त है पूरे भारत देश के किसानों का इकठ्ठे होने का और जिस दिन वो एक हो गए उस दिन कोई ताकत उनके हक को रोक नहीं पाएगी।

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