चुनावों का वित्त पोषण: पारदर्शिता आवश्यक

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Details of funds received as election bonds

उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में सभी राजनीतिक दलों को निर्देश दिया है कि वे चुनावी बॉण्ड के रूप में मिले चंदे का ब्यौरा दें और चंदा देने वालों की पहचान को एक सील बंद लिफाफे में मई के अंत तक चुनाव आयोग को सौंपे। यह अनाम चंदा देने वाली व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की दिशा में एक उचित कदम है। न्यायालय ने कहा कि यदि चुनावी बॉण्ड खरीदने वाले क्रेता की पहचान का पता नहीं चलता है तो चुनावों में काले धन के प्रयोग को रोकने के सरकार के प्रयास निरर्थक होंगे। इस संबंध में एसोसिएशन आॅफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स ने चुनावी बाण्ड की वैधता को चुनौती देने के लिए एक याचिका दायर की थी। हैरानी की बात यह है कि जिस सरकार ने काले धन पर रोक लगाने के अपने इरादों को जाहिर किया था वह चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक करना नहीं चाहती है।

हम सभी लोग जाने हैं कि हमारी व्यवस्था में काला धन चलन में है और औद्योगिक घरानों और राजनीतिक पार्टियों के बीच सांठगांठ के कारण काला धन निरंतर बढता जा रहा है और यह दु:खद बात है कि ऐसे मामलों में भी सरकार को याद दिलाने के लिए न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। इस निर्णय के पूर्व इस बात का पता चला कि 13 दिसबर 2018 तक बसपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों ने देश की राजधानी के सरकारी बैंकों में आठ खातों में 669 करोड़ रूपए जमा किए। उसके बाद सपा ने 471 करोड़ रूपए जमा किए। प्रश्न उठता है कि यह पैसा कहां से आया। क्या उन्हें आम आदमी ने पैसा दिया या उद्योग घरानों ने?

इस लोक सभा चुनाव में भी काले धन का प्रयोग हो रहा है। व्यावसायिक घराने बड़ी पार्टियों के चुनाव प्रचार का खर्च वहन कर रहे हैं तो कुछ पैसा पार्टी के सदस्यों से भी वसूल किया जा रहा है। इसलिए सत्ता में चाहे जो भी पार्टी आए चुनावों के बाद महंगाई बढेगी ही क्योंकि उस सरकार को उन व्यावसायिक घरानों का ध्यान भी रखना होगा जिन्होने चुनाव में पैसा लगाया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस बार भारत में चुनावों में 60-70 हजार करोड़ रूपए खर्च होंगे जो अमरीकी चुनावों की खर्च की गयी राशि से अधिक होगा। ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों में यह खर्चा बढ रहा है जहां पर वोट के बदले नकदी, साइकिल, साड़ी, घड़ी आदि सामन दिए जाते हैं और गरीब ग्रामीण लोग इसी के आधार पर मतदान करते हैं।

राज्य द्वारा चुनावों का वित्त पोषण एक विकल्प है किंतु इस संबंध में अभी तक कोई प्रगति नहंी हुई है तथा इसका मूल कारण यह है कि बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने इस मामले में रूचि नहीं दिखायी है और अमीर तथा शक्तिशाली नेता चुनावों पर सीमा से कहीं अधिक खर्च कर देते हैं और वोट प्राप्त करने के लिए अनैतिक तरीके अपनाते हैं जिससे सारी प्रणाली और अधिक भ्रष्ट बनती जा रही है। राजनीतिक नेता हमारे लोकतांत्रिक परंपरा की दुहाई देते हैं किंतु चुनाव उपहास बनते जा रहे हैं। यह पाया गया है कि जो लोग बड़ी राजनीतिक पार्टियों के चिह्न पर चुनाव लड़ते हैं वे धनी और व्यावसायिक वर्ग से आते हैं और इस बात की पुष्टि इस तथ्य से हो जाती है कि लोक सभा के 80 प्रतिशत सदस्यों ने अपनी आय एक करोड़ से अधिक घोषित की है और 50 प्रतिशत से अधिक सदस्यों की आय 6-7 करोड़ रूपए से अधिक है। जो सदस्य अपनी आय 5 करोड़ से अधिक घोषित करता है उसके पास विभिन्न तरह की संपत्तियां हैं जिनका बाजार मूल्य घोषित मूल्य से कहीं अधिक होता है और इसीलिए चुनावों में बेईमान लोग खड़े हो रहे हैं इसका कारण उनका धन बल या बाहुबल है। बहुत कम स्वच्छ और शिक्षित लोग चुनावों में खड़े होते हैं और उनमें से बहुत कम चुने जाते हैं।

आंकड़ों के अनुसार निर्वाचित सदस्यों में से 50 प्रतिशत के विरुद्ध आपराधिक मामले लंबित होते हैं। हाल ही में यह प्रवृति देखने को मिली है कि राजनीतिक दल फिल्म अभिनेता और अभिनेत्रियों को लोक सभा और विधान सभा के टिकट देने लगे है। और इसका कारण यह है कि उनके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन होते हैं। इस मामले में केवल वामपंथी दलों में कुछ पारदर्शिता है। उनके अधिकतर नेता निम्न मध्यम वर्ग के हैं। उनकी जीवन शैली साधारण होती है ंिकतु पिछले दो तीन दशकों से चुनावों में धन बल का प्रभाव बढने के कारण ऐसे उम्मीदवारों की सफलता का प्रतिशत गिरने लगा है।

फिर इस स्थिति में बदलापव कैसे किया जा सकता है। कुछ राजनीतिक दल यह मांग कर रहे हैं कि लोक सभा में 25-30 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए दी जाएं किंतु ग्रामीण गरीब लोगों, छोटे और सीमान्त किसानों, आदिवासियों और दलितों को आरक्षण देने की कोई मांग नहंी है। गरीब और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण क्यों न किया जाए? यदि इन वर्गों के लिए आरक्षण नहंी किया जाता है तो फिर उनकी मांगें कैसे पूरी होंगी? इन वर्गों के लिए अपेक्षित विकास कैसे होगा? शहरों और अमीर तथा उच्च मध्यम वर्गों के हितों की परियोजनाओं पर बल देने के कारण इस वर्ग की उपेक्षा हुई है और उनकी मांग को देखा सुना नहीं जाता है।

देश में समुचित नीतियों के निर्माण के लिए लोक सभा की संरचना महत्वपूर्ण है। लोक सभा के सदस्यों का दृष्टिकोण, उनकी शिक्षा और समर्पण देश को सही दिशा में आगे बढा सकता है। आज चुनाव प्रचार के दौरान हम धर्म, सेना, वैज्ञानिकों की उपलब्धि के बारे में नेताओं के भाषण सुन रहे हैं जो उचित नहंी है और यह वास्तव में बड़ा दु:खद है कि चुनाव आयोग को एक मुख्यमंत्री, एक पूर्व मुख्यमंत्री तथा दो अन्य वरिष्ठ नेताओं को भड़काऊ या अपमानजनक टिप्पणियां करने के कारण कुछ दिनों के लिए चुनाव प्रचार से रोकना पड़ा। अत: जिस प्रकार से देश में चुनाव प्रचार चलाया जा रहा है वह देश के लिए शुभ संकेत देने वाला नहंी है। देश की समस्त समस्याओं और चुनौतियों तथा उनसे निपटने की रणनीतियों के बारे में बात नहंी की जा रही है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या जो नेता इन चुनावों में चुने जाएंगे क्या वे देश पर विवेकपूर्वक तथा पारदर्शी ढंग से शासन करने में सक्षम होंगे।

 

 

 

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