दिल्ली को शस्त्र नहीं, सौहार्द चाहिए

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Delhi needs harmony, not arms
ऐसे नाजुक एवं अति-संवेदनशील क्षणों में हमें चुनौतियों का सामना करना होगा। संयम, विवेक, सौहार्द एवं संतुलन से आगे बढ़ना होगा। निर्णय और क्रियान्विति के बीच उतावलापन नहीं, नापसन्दगी के क्षणों में बौखलाहट नहीं, सिर्फ धैर्य को सुरक्षित रखना होगा।
दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से जो हालात बने हैं, वे न केवल त्रासद एवं शर्मनाक हैं, बल्कि भारत की संस्कृति एवं एकता को धुंधलाने वाले हैं। इंग्लैण्ड एवं स्कॉटलैंड की दो सप्ताह की यात्रा से दिल्ली लौटने पर जो हिंसा, आगजनी, विध्वंस के उन्मादी हालात देखने को मिले, उससे मन बहुत दु:खी हुआ, वैसे इन भीषण अत्याचारों, तोड़फोड एवं हिंसा के हालातों से सभी बहुत दुखी हैं। इन विडम्बनापूर्ण हालातों ने अब एक ऐसा रंग ले लिया है कि इसका समाधान करना कठिन हो गया है।
सीएए अर्थात संशोधित नागरिक कानून के नाम पर दिल्ली के कुछ इलाकों में साम्प्रदायिक हिंसा का तांडव हुआ है, उससे भारत का सर समूची दुनिया में शर्म से नीचा हो गया है। क्योंकि एक तरफ भारत यात्रा पर आये अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत की धार्मिक विविधता के बीच बनी इस राष्ट्र की मजबूती का बखान करते हैं और दूसरी तरफ हम भारतीय धार्मिक विविधता को बीच में लाकर ही आपस में लड़ रहे हैं, विषवमन कर रहे हैं, एक-दूसरे को मरने-मारने पर तूले हैं। यह सिर्फ पागलपन है, उन्माद है, जो हर सूरत में बन्द होना जाना चाहिए। ऐसा नहीं कि इन जटिल से जटिलतर होती विषम स्थितियों का हल संभव नहीं, बिल्कुल मुमकिन है, लेकिन इसके लिए जरूरत है कि हमें सोच को संकीर्णता एवं साम्प्रदायिकता से बाहर लाना होगा। अहिंसक तरीकों को अपनाना होगा।
विचारणीय है कि जिस जिन्दगी के लिये संघर्ष, हिंसा एवं उन्माद फैला रहे हैं, वही खत्म हो गई तो फिर संघर्ष एवं संकीर्णता किसलिये? इन दिनों ऐसी-ऐसी अफवाहें फैलाई जा रही हैं, जिनसे दोनों पक्षों, बल्कि हमारी राजनीतिक पार्टियों के भीतर एक-दूसरे के प्रति घृणा पैदा हो रही हैै और यह देश के लिए कतई ठीक नहीं है। बीता पखवाड़ा दिल्ली के इतिहास में काले पखवाड़े के रूप में स्मरणीय रहेगा, क्योंकि इस कालखण्ड के साथ जुड़ी हैं हिंसक वारदातें, निर्दोष लोगों की आहें, राष्ट्रीय सम्पदा का विध्वसंक दौर, साम्प्रदायिक उन्माद, आगजनी, डर एवं भय की विभीषिकाएं, भारत की विविधता में एकता की संस्कृति और उसके आदर्शों के अवमूल्यन की त्रासद घटनाएं। दिल्ली अमन-चैन, साम्प्रदायिक सौहार्द एवं सह-जीवन की सांझा संस्कृति का शहर रहा है।
ऐसे में, मौजूदा स्थिति के पीछे पुलिस, राजनीतिक दलों और सरकार की क्या भूमिका रही, इस पर तो सवाल उठते रहेंगे, लेकिन यदि कहीं हिंसा होती है, लोगों की जान जाती है और शहर में आम जिंदगी प्रभावित होती है, तो यकीनन कानून-व्यवस्था एवं प्रशासन पर प्रश्न खड़े होते हैं। जाहिर-सी बात है कि अगर आप दो गुटों को एक-दूसरे के आमने-सामने आने की इजाजत देंगे, उन्हें भड़काऊ नारे लगाने, भाषण देने की छूट देंगे और पथराव करने देंगे, तो हिंसा, द्वेष एवं नफरत बढ़ेगी ही। हम कैसे भुला पाएंगे कि साम्प्रदायिकता के नाम पर उगले जहर में कितना कुछ हमने खो दिया।
सीएए का मुद्दा पूरी तरह कानूनी है और इसका फैसला देश का सर्वोच्च न्यायालय ही करेगा। सवाल हिन्दू या मुसलमान का नहीं बल्कि ‘नागरिक’ का है। अत: इसके विरोध या समर्थन में सम्प्रदायगत भावना का आना अनुचित कहा जायेगा। लेकिन अपने स्वार्थों के लिये कतिपय राजनीतिक दलों ने अनुचित को उचित बनाकर कर भोले-भाले लोगों के गले उतार दिया, अत: इसे लेकर धर्म के आधार पर गोलबन्दी पूरी तरह अमान्य ही कही जायेगी। इसकी वजह से भारत के नागरिक साम्प्रदायिक खेमों में नहीं बंटने चाहिए, क्योंकि तथाकथित कट्टर साम्प्रदायिक ताकतों की हिंसक वारदातें सही समाधान न होकर, समस्या को और अधिक फैलाव देगी।
समझने की आवश्यकता है कि दिल्ली के भाल पर जो साम्प्रदायिक हिंसा एवं उन्माद के जो अराजक एवं आक्रामक दौर देखने को मिल रहे हैं उसके पीछे कई प्रकार के शरारती दिमाग और खतरनाक विचार हैं। पूरे देश ने वह वीडियो देखा जिसमें उच्चतम न्यायालय द्वारा वातार्कार नियुक्त किए जाने के साथ तीस्ता सीतलवाड़ अपने साथियों के साथ वहां महिलाओं को प्रशिक्षण दे रही थीं कि आपको किस सवाल का क्या जवाब देना है और अपनी ओर से क्या सवाल करना है या शर्तें रखनी हैं। उस वीडियो ने शाहीन बाग के पीछे छिपे चेहरे को उजागर कर दिया था। यह सीधे-सीधे वार्ताकारों को विफल करने की साजिश थी। ऐसी अनेक साजिशें अनेक स्तरों पर हो रही है, हर गली-मौहल्ले में मचल उठा तूफान है, जिससे दिल्ली की जीवनशैली अस्तव्यस्त हो गयी है।
धर्मनिरपेक्ष भारत की अखंडता एवं एकता दांव पर चढ़ गई है। इस तरह दिल्ली को बांटने की पीड़ा कितनी खतरनाक और असह्य हो सकती है, यह भारतवासियों के लिये अनजानी भी नहीं हैं। ऐसे समय में दिल्ली की सुरक्षा एवं सांझी संस्कृति की जीवंतता के लिये सही समय पर सही निर्णय लेने वाले दूरदर्शी, समझदार एवं सच्चे एवं सख्त भारतवासी की जरूरत है जो न शस्त्र की भाषा में सोचता हो, न सत्ता की भाषा में बोलता हो और न स्वार्थ की तुला में सबको तोलता हो। साम्प्रदायिक एकता एवं सौहार्द की पूजा नहीं, उसके लिये कसौटी चाहिए।
एकता एवं अखण्डता का आदर्श शब्दों में ही नहीं उतरे, जीवन का अनिवार्य हिस्सा बने। उन्हें सिर्फ कपड़ों की तरह न ओढ़ा जाए अन्यथा फट जाने पर यह आदर्श भी चिथड़े कहलायेंगे, ऐसा देखने एवं करने के लिये अनेक लोगों के मनसूंबों को भी निष्फल करना होगा। क्योंकि कोई भी देश केवल बड़ी-बड़ी सेनाएं व आधुनिक सामरिक साजो-सामान रखने से ही मजबूत नहीं होता बल्कि नागरिकों के भाईचारे व एकता से मजबूत होता है। अत: हर नागरिक का पहला कर्त्तव्य है कि वह इस दिल्ली में फैले पागलपन को अपनी हैसियत के मुताबिक खत्म करने का प्रण ले, दिल्ली को कलंकित न होने दें।
इस चर्चा को फैलाव दिया जा रहा है कि हमारा बलिदान औरों के काम आएगा। आज कौन किसके लिये जीता-मरता है? सभी अपने स्वार्थों की फसल को धूप-छांव देने की तलाश में हैं। ऐसे नाजुक एवं अति-संवेदनशील क्षणों में हमें चुनौतियों का सामना करना होगा। संयम, विवेक, सौहार्द एवं संतुलन से आगे बढ़ना होगा। निर्णय और क्रियान्विति के बीच उतावलापन नहीं, नापसन्दगी के क्षणों में बौखलाहट नहीं, सिर्फ धैर्य को सुरक्षित रखना होगा, क्योंकि गहरे जख्मों को भरने के लिये तेज दवा को भी कुछ समय चाहिए। एकाधिक पत्थरबाजों और असामाजिक तत्वों की गिरफ्तारी से ज्यादा जरूरी है, हम असली षड्यंत्रकारी की मांद तक पहुंचे।
जो लोग इन दोनों गुटों के पीछे सक्रिय हैं और जिन्होंने इन्हें उकसाया या दूसरी तरह की सहायताएं पहुंचाई हैं, उनको तुरंत सलाखों के पीछे भेजने की जरूरत है। ऐसा नहीं होने से हिन्दू और मुसलमान आपस में एक-दूसरे को शंका की नजरों से देखने लगेंगे, दोनों के बीच सौहार्द कायम करने में अनेकों ने बलिदान दिया है, यह बलिदान व्यर्थ हो जायेगा। इस जटिल एवं विनाशक स्थिति को समाप्त किये बिना भारत उस ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता जिसका वह हकदार है और हमारी कई पीढ़ियों ने उसे अपने ज्ञान की शक्ति के बूते पर विश्व में विशिष्ट स्थान दिलाया है।
ललित गर्ग

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