प्यारे सतगुरू जी ने सीआईडी अधिकारियों के भ्रम को किया दूर

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shah mastana ji sach kahoon

सन् 1958, दिल्ली 

परम पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज जीवोद्धार के लिए दिल्ली में पुराने सत्संगी श्री रक्खा राम जी के निवास स्थान पर कुछ दिनों से ठहरे हुए थे। कुछ सेवादार भी साथ थे। रात को रोज मजलिस लगती। नए-पुराने सत्संगियों को जैसे ही पता चला कि सच्चे सौदे वाले महाराज जी यहां पधारे हुए हैं तो संगत रोज बढ़ने लगी। दिल्ली के सीआईडी विभाग वालों को पता चला कि यहां एक मस्त फकीर आया हुआ है। वह किसी से चंदा नहीं लेता है, न ही मात्था टिकवाता है और सच्चाई पर चलने का उपदेश देता है। वह फकीर सोना, चांदी, नोट आदि सामान बांटता है। मकान भी नए बनवाता व गिरवाता है। ऐसा करने के लिए उसके पास पैसा कहां से आता है? वह कहता है कि यह सतगुरू का गैबी अटूट खजाना है। यह गैबी गुप्त खजाना क्या है? कहां है? उस राज का खुलासा होना चाहिए। अंतर्यामी सतगुरू जी ने शाम के समय एक सेवादार से कहा, ‘‘जाकर देखो टोकरी में कितने मालटे पड़े हैं?’’ उसने बताया कि पांच-छ: रखे हुए हैं। आप जी ने सेवादार को कहा, ‘‘दस मालटे टोकरे में पूरे कर लो।’’ उसने वैसा ही किया। रात को मजलिस में सीआईडी के 10 अफसर व कर्मचारी सादी पोशाक में आकर साध-संगत में अलग-अलग जगहों पर बैठ गए और वहां बैठे भक्तों से आप जी के बारे में पूछताछ करने लगे। मजलिस शुरू हो गई।

भजन गाए जा रहे थे-‘ध्यान सतगुरू से जो तू लगाए, जीवन तेरा सुधर जाए…।’ तथा ये कहानी है अंदर वाले जिंदाराम की…। बताया गया कि जिस समय इन्सान नाम-शब्द प्राप्त कर लेता है और सच्चे सौदे के नियमों को अच्छी तरह समझकर अपना लेता है तो उसे फिर दु:खों और कठिनाईयों भरे रास्ते पर नहीं चलना पड़ता। जीव सुख के मार्ग की ओर अग्रसर हो जाता है। ऐसा देख सुनकर सीआईडी कर्मचारियों के दिलों पर गहरा प्रभाव पड़ा। शहनशाह शाह मस्ताना जी थोड़ी देर बाद स्टेज पर पधारे और आई हुई साध-संगत का नारा स्वीकार किया। सांई जी भक्तों को समझाने लगे कि उस आदमी का संग करो जो मालिक के प्रेम की आग में जलता हो तथा जिसके अंदर मालिक के मिलने की सच्ची तड़प हो। काफी समय से चल रही रूहानी मजलिस के दौरान घट-घट के जाननहार शहनशाह जी ने फरमाया, ‘‘आप सीआईडी के कुछ लोग आए हुए हैं। वे बाहर के सीआईडी के लोग हैं, असीं हुए अंदर के सीआईडी।’’ वे लोग चकित रह गए कि इनको कैसे मालूम हुआ क्योंकि उनकी बात गोपनीय थी।

बाहर की और अंदर की सीआईडी क्या होती है? आप जी ने आगे फरमाया, ‘‘काल की सीआईडी बाहर की और परमेश्वर की सीआईडी अंदर की। वरी! अपना दोनों का महकमा एक ही है। इसलिए घबराओ न, असी अपना कार्य करते हैं तुसी अपना कार्य करो। तुम को माल्टा खिलाते हैं।’’ सेवादार से माल्टों वाली टोकरी मंगवाई और आप जी ने अपने पवित्र कर-कमलों से सीआईडी वालों को अकेले-अकेले इशारे से बुलाकर एक एक माल्टा दिया तथा साथ में भरपूर प्यार भरी दृष्टि भी डालते रहे। दस माल्टे पूरे करने वाले सेवादार को भी समझ में आ गया कि दाता जी ने पहले ही इतने माल्टे क्यों रखवाए थे? सीआईडी के कर्मचारियों का भ्रम दूर हो गया। उनको समझ में आ गया कि यहां तो केवल रूहानियत का ही व्यापार होता है। राम नाम का ही प्रचार-प्रसार होता है। अंदर वाला जिंदाराम ही गैबी खजाना है। पूजनीय शहनशाह शाह मस्ताना जी महाराज उच्च कोटि के फकीर हैं। सतगुरू का धन-धन करते हुए वे लोग वापिस चले गए।

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