अपराधी बने नेता: पार्टियां दे रही सुपारी

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Criminal became leader parties are giving Supari
हम छोटे-मोटे चोरों को फांसी की सजा दे देते हैं और बडे अपराधियों को सार्वजनिक पदों के लिए चुन लेते हैं। यह तथ्य भारत की कटु सच्चाई को उजागर करता है। एक सांसद और विधायक का बिल्ला माफिया डॉनों, कातिलों और अपराधियों के लिए एक रक्षा कवच का कार्य करता है तथा बिहार विधान सभा चुनावों के इस राजनीतिक मौसम में खूनी अपराधियों का बोलबाला है।
राजनीतिक दल विधान सभा चुनावों के लिए अपराधियों को टिकट दे रहे हैं। अपराधियों से नेता बने लोग बुलेट प्रूफ जैकेट अर्थात एमएलए बनने की होड में हैं। अपराधी बने नेता और जो जीता वो सिकंदर के इस नए युग में आपका स्वागत है। ऐसे वातावरण में जहां पर साध्य महत्वपूर्ण बन जाता है न कि साधक और विजेता का बोलबाला रहता है, बाहुबलियों, हत्यारों, गैंगस्टरों की प्रत्येक पार्टी में बड़ी मांग है किंतु लगता है चुनावी राजनीति में ईमानदारी से अधिक अपराधियों का महत्व है और यह चुनाव भी कोई अलग नहीं है।
बिहार विधान सभा के पहले चरण के चुनावों में 1066 उम्मीदवारों में से 319 की आपराधिक पृष्ठभूमि है। इस सूची में गया में सर्वाधिक 49 उम्मीदवार, उसके बाद भोजपुर में 39, रोहतास में 37 और बक्सर में 33 उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि है। उसके बाद पटना, जहानाबाद औरंगाबाद, जमुई आदि का स्थान आता है। मोकामा के वर्तमान विधायक छोटे सरकार अर्थात सिंह जेल में विधि विरुद्ध कार्यकलाप निवारण अधिनियम के अधीन बंद हैं। उन्होंने जेल से बाहर आकर राजद के टिकट पर अपना नामांकन पत्र भरा है। उन्होंने अपने चुनाव शपथ पत्र में घोषणा की है कि उनके विरुद्ध हत्या के सात मामलों सहित 38 गंभीर आपराधिक मामले हैं।
राजनीतिक दलों ने न्यायालयों के विभिन्न निर्णयों के बावजूद अपराधियों को टिकट दिया है। इसी वर्ष फरवरी में उच्चतम न्यायालय ने पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए यह अनिवार्य कर दिया था कि वे अपना अपराधिक पृष्ठभूमि का ब्यौरा दें और निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया था कि वे इन उम्मीदवारों के विधि विरुद्ध कायकलापों का ब्यौरा प्रकाशित करें और उनके नामांकन के कारण स्पष्ट करें ताकि मतदाता इस सूचना के आधार पर अपने मत का प्रयोग कर सकें। इसका उद्देश्य आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतरने से रोकना था किंतु इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अनेक उम्मीदवारों ने अपने घनिष्ठ रिश्तेदारों को टिकट दिलवाकर इन नियमों की धज्जी उड़ायी। हत्या के मामलों में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे तीन माफिया डॉनों की पत्नियों को राजद ने टिकट दिया। जद (यू) और लोजपा ने ऐसे दो-दो माफिया डॉनों की पत्नियों को टिकट दिया।
एक पूर्व मुख्यमंत्री से जब यह पूछा गया कि उनके मंत्रिमंडल में 22 मंत्री आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं तो उन्होंने कहा, मुझे अपने मंत्रियों के अतीत की कोई परवाह नही है। सरकार में शामिल होने के बाद वे अब अपराधों में संलिप्त नहीं है और वे आपराधिक गतिविधियों को रोकने में सहायता करने के लिए तैयार हैं। आप जनता से पूछिए कि उन्होंने उन्हें क्यों चुना है। आप इस मुख्यमंत्री के इस तर्क का क्या उत्तर देंगे? हमारे अपराधियों से राजनेता बने हमारे विधायकों को एक विजयी ट्राफी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके चलते आज राज्य माफिया डॉनों, उनकी सेना, उनके सशस्त्र ब्रिगेडों का युद्धस्थल बन गया है और इस बात की कोई परवाह नहीं करता है कि वे आज समाज और राष्ट्र के लिए सबसे बडा खतरा बन गए हैं।
आज माफिया डॉन जेल में बैठकर चुनाव जीतते हैं। कुछ विधायक जेल में ही अपना दरबार लगाते हैं। उन्हें वहां घर जैसी सारी सुविधाएं मिलती हैं। वे अपने चमचों को सेलफोन के माध्यम से निर्देश देते हैं और जेल से ही अपना साम्राज्य चलाते हैं, वहीं से आदेश देते हैं और किसी की हिम्मत नहीं कि उनके आदेशों का पालन न करें। ऐसे कुछ नेता गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत का सहारा लेते हैं और कुछ भाग जाते हैं तथा जब स्थितियां अनुकूल होती हैं तो आत्मसमर्पण करते हैं। ऐसे अपराधियों का तिरस्कार करने के बजाय वे चुनावों में जीत जाते हैं।
कुछ लोग अपराधियों के राजनीतिकरण को हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास का एक चरण कह सकते हैं किंतु त्रासदी यह है कि आज केवल महत्वपूर्ण यह रह गया है कि अपराधी किस पक्ष में है। उनके पक्ष में या हमारे पक्ष में। आज सारे दल एक जैसे हैं केवल अपराधी नेताओं की संख्या में अंतर है और उनके बीच लेनदेन चलता रहता है। वे एक दूसरे की सहायता करते रहते हैं और अपराधियों और पार्टियों के बीच परस्पर लाभ और मैत्री के चलते हमारे नेतागण ऐसे कानून को पारित करने का विरोध करते हैं जिससे अपराधीकरण, भ्रष्टाचार और विश्वसनीयता के संकट की महामारियों से राजनीति को मुक्ति दिलायी जा सके।
विभिन्न मुद्दों पर हमारे नेताओं में दलीय आधार पर मतभेद होता है किंतु जब इस समस्या का निराकण करने के लिए कदम उठाने की बात आती है तो वे एकजुट हो जाते हैं और देश के विभिन्न राज्यों में कानून और व्यवस्था की स्थिति खराब होने का एक मुख्य कारण यह भी है। यह भी सच है कि राज्य द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं को गिरफ्तार करने और उनके विरुद्ध मुकदमा चलाने में सफल न होने का मुख्य कारण राज्य ही है। अपराधी राजनेताओं के अवैध हितों को संरक्षण देते है और उसके बदले उन्हें राजनेताओं तथा उनकी पाटियों से संरक्षण मिलता है और सबसे दुख की बात यह है कि इस स्थिति पर किसी को दुख नहीं होता है। हर चुनाव में अपराधियों को टिकट देने पर जनता हैरान नहीं होती है न ही इसको लेकर जनता विरोध करती है और धीरे धीरे यह स्वीकार्य बनता जा रहा है।
फिर इसका उपाय क्या है? हम राजनीतिक कलियुग कहकर इसे नजरंदाज नहीं कर सकते हैं। आज भारत एक नैतिक चौराहे पर खड़ा है विशेषकर इसलिए कि हमारे राजनेताओं ने निम्न नैतिकता और उच्च प्रलोभन की तलाश में महारथ हासिल कर ली है। उच्चतम न्यायालय ने भारत की राजनीति की खामियों को उजागर किया है। भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए अयोग्य घोषित करने हेतु किसी व्यक्ति के विरुद्ध हत्या के कितने आरोप होने चाहिए? हमारे राजनेताओं को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा और ऐसा कानून बनाना होगा जिससे अपराधियों और माफिया डॉनों का राजनीति में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जा सके। क्या हमारे नेता दलीय राजनीति से ऊपर उठकर राजनीतिक की पवित्रता को बनाए रखेगे? अब हमारा देश छोटे लोगों की बड़ी छाया को सहन नहीं कर सकता है क्योंकि देश को सबसे बड़ी कीमत अपराधी राजनेता की चुकानी पड़ती है।

 

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