कोरोना पीड़ित

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पिंकी मेरा चश्मा तो देना, श्रीमान जी लगातार आवाजें लगा रहे थे। पिंकी अपने फोन पर दोस्तों के साथ कॉन्फरेन्स कॉल में व्यस्त थी। मैं सुधा श्रीमान जी की पत्नी सुबह से तीसरी बार पति के लिए स्पेशल वाली लीफ टी बना रही थी। बेटा वीडियो गेम में व्यस्त था, हमेशा की तरह सासू मां अपने भगवान को जल चढ़ाने में व्यस्त थीं। मैं भी सोचती काम ना करने के कितने बहाने लोग ढूंढ़ लेते हैं और जिन्हें आराम करना है वो आराम ही करते रहते हैं। ये कोरोना नहीं हो गया मेरे लिए तो मानो अजाब बन गया। पति के हाथ में एक अलग ही फ़्लेवर वाली चाय पकड़ाई तो दूसरा काम बता दिया, यार मेरा चश्मा ले आओ, ये बच्चे भी न.. तुमने कुछ सिखाया ही नहीं।
मन किया बोलूं श्रीमान आज तक आप को भी तो कुछ सिखा नहीं पाई और हां ये बच्चे तो मैं दहेज में लेकर आई थी, आप तो इनके कुछ हैं ही नहीं। सिखाना केवल मेरा काम नहीं। चश्मा लेने गई तो वह बेटी पिंकी से टकरा गई, उसने अपनी मां को प्यार किया और बोली,यू आर दी बेस्ट मॉम आॅफ यूनिवर्स! एक कप कॉफी मिलेगी, वो भी कड़क। सुबह से आपके पति ने चिल्ला चिल्ला कर सर खा लिया। पिंकी ये, पिंकी वो, डोंट नो कैसे झेलती हो ऐसे पति को। मैं चुप रही, झेलती तो हूं, लेकिन केवल उन्हें नहीं तुम सबको भी साथ में। चश्मा पति को दे फिर कॉफी बनाने की लिए जाने लगी तो पति ने उसे अपने पास बैठा लिया,थोड़े देर पास बैठो, अब घर पर हूं तो पास भी नहीं आओगी। हमेशा तुम्हारी शिकायत रहती है कि मैं तुम्हें समय नहीं देता। पिछले तीन दिनों से सभी हाउस अरेस्ट और मैं सबकी बांदी। बचपन की मल्लिका मैं गुड्डी हवा के साथ दौड़ती कभी यहां, कभी वहां। पढ़ने में भी अव्वल, सबकी चहेती, घर वालों की आंखों का तारा, और आज ये हाल। कोई भी काम बताता तो कहती, मैं क्यों बिट्टू को भी बोलो।
बिट्टू मेरा छोटा भाई, जो बचपन में मेरा गुलाम था पर मन ही मन मुझसे चिढ़ता भी था। अगर आज मुझे इस हालात में देख ले तो उसका रिऐक्शन होगा,जैसे को तैसा। शायद खुश भी हो लेकिन नहीं अब तो वो मेरा प्यारा भाई है और अपनी दीदी को चाहता भी बहुत है। जब भी हम मिलते मैं उसके और उसके बच्चों के लिए यूट्यूब से देख कर नई-नई डिश बनाती और वो कहता, दीदी इतना चेंज ये सब कब सीखा और इतना चेंज आया कैसे लव यू दी। नौकरानी के साथ मिलकर यानी दिमाग मेरा और मेहनत उसकी मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं।
इनफैक्ट मजा ही आता है, क्योंकि चाहे वो कल्पना चावला हो या इन्दिरा गांधी की किचन और डिशेज, हम महिलाओं के दिमाग में घुसा रहता है कि हम अपने से जुड़े मर्द यानी बाप, भाई, पति या बेटा सबको अच्छा खिलाकर, उनके पेट के रास्ते से उनके दिल में घुस सकते हैं और जो हमें कुछ हद तक अच्छा भी लगता है। लेकिन इन तीन दिनों में मानो सिर्फ मेरी जिÞंदगी में ही अफरा तफरी मची हुई थी, क्योंकि खाना बनाने वाली, घर साफ करने वाली दोनों नौकरानियां भी हाउस अरेस्ट थीं। मेरे अंदर की आईसीएमआर की चीफ साइंटिस्ट को घर के लोगों ने नजर अन्दाज कर घर की औरत बना दिया था। वैसे तो घर में तीन औरतें थी। पहली सासू मां, जो बड़े अफसर की मां, वो बेचारी कैसे काम करें। वो रात-दिन पूजा और भजन कर इस घर की शांति के उपाय करती हैं।
ऐसा उनका और उनके और उनके प्यारे साहेब बेटे का सोचना था। अब हालात असहनीय होते जा रहे थे। मुझे छोड़ सबका हाउस अरेस्ट तो जैसे स्वर्ग जैसा था। बेटी ऐमजॉन प्राइम या नेटफ्लिक्स में सिरीज या मूवी में व्यस्त और पतिदेव न्यूज चैनल में कोरोना के आंकड़ों के साथ। सासू मां बेटे को घर पर देख जोर-जोर के पूजा की घंटियां बजाने लगी थीं। मेरा तो जैसे वजूद ही खो गया था। मैं भी कभी पिंकी की ही तरह थी, हर समय अपनी ही दुनिया में और
आज हर कोई मुझे सीख दिए जा रहा थ।हरी सब्जियों को पहले गरम पानी फिर ठंडे पानी से धो लो, बार- बार पहले सेनेटाइजर फिर साफ पानी से हाथ धोओ। अगर धोखे से दूध के पैकेट को बिना धोए काट कर बरतन में गरम करने डाल दिया तो,अरे व्हाट इज दिस? आप को डिग्री किसने दी, दिन-रात देखती नहीं हो टीवी, कोरोना सबकी जान ले रहा है सब जगह हाहाकार मचा है। मॉम कुछ तो अपने दिमाग का इस्तेमाल करो यू शुड हैव वॉश्ड पैकेट, ये बेटी की चित्कार थी, उसके बाद कोरस में पति देव और सासू मां भी हिस्सा बन गए, तुम ना घर में एकाध को मारकर ही दम लोगी। अरे भागवान कुछ तो दिमाग चलाओ किस-किस ने छुआ होगा उस पैकेट को! मन तो किया पैकेट इनके सर पर दे मारूं, तभी सासूमां राम-राम जपती नजर आईं। अपने बेटे से उन्होंने गोहार लगाई, बौआ तुम्हारी बीवी तो बस नाम की ही पढ़ी-लिखी है। इतनी भी समझ नहीं बाहर से आई कोई भी चीज बिना धोए काम में नहीं लाना चाहिए।
कोरोना हो या ना हो। मैं कुछ बोलू तो तुम बचाने के लिए खड़े हो जाते हो। भला हो कोरोना का जो इसकी सब हरकत खुद तुम देख रहे हो। बाप रे मुझे नीचा गिराने की लिए माताश्री ने कोरोना की भी तारीफ कर दी। इधर पति देव जो नेटफ्लिक्स में जोर-शोर से चुपके चुपके सिनेमा देख रहे थे, मन ही मन सोच रहे थे उनकी ही मत मारी गई थी जो पढ़ी-लिखी बीवी उठा लाए। अम्मा ने बहुत मना किया था, बार-बार कहती थी, बहुत पछताओगे बौआ। औरतें रसोई में ही अच्छी लगती हैं। औरत की कमाई थोड़े खानी है। (Corona sufferer) आॅफिस मे हमेशा दूसरों टिफिन के साथ अपना टिफिन देखा। कहां उनका, और कहां उनके बॉस का टिफिन। घर में रहने वाली ज्यादातर बीवियां पति के दिल में घुसने का रास्ता जानती हैं। सब्जिÞयों को गार्निश करना, रोटियों को बड़े तरीके से सिल्वर फॉइल में लपेटकर रखना। ये भला नौकरानियां कहां कर पाती हैं। किसी तरह साहब और मेम साहब का डब्बा पैक कर दिया बस।
जब नौकरानी नदारद तो जैसे तैसे साइंटिस्ट बीवी के हाथों कटी आड़ी तेढ़ी सब्जिÞयों से भरे सैंडवीच या फिर आॅफिस कैंटीन में खा लेने का आदेश। वहां पतिदेव के दोस्त पति देव को ईर्ष्या की नजर से देखते। मन ही मन सोचते,इसकी किस्मत देखो, डबल इनकम, बड़ी कार, आलीशान बंगला और तो और पट-पट इंग्लिश बोलने वाली रोबदार बीवी। साला यहां तो एक ही बात सब्जी कैसे बनी? शाम को क्या बनाऊं? मैं कैसी दिख रही हूं? ये सब मेरे मन में चल रहा था। मन ही मन घबराहट भी हो रही थी कि मेरे जैसी इतनी इन्डिपेंडेंट, स्वाभिमानी महिला की इस कोरोना ने क्या दशा कर दी है।
लेकिन ये भी समझ आ रहा था कि जिदगी का डर कितना भी हो सास, पति, पिंकी और बेटू पर कोई असर नहीं। इनकी अपनी बेटी पिंकी पढ़ाई के नाम पर लैपटॉप पर कभी मूवीज तो कभी गेम खेल रही है और यही कुछ बेटे का भी हाल था। दोनों मां बेटे मेरी मरी हुई मां की खामियां गिना रहे थे कि मुझे काम नहीं सिखाया। मेरा अभी आत्ममंथन खत्म भी नहीं हुआ कि मेरी महरी मुझसे थोड़े पैसे लेने आ गई। उसके लिए मैं मसीहा थी जो उसके बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाती थी। तनख़्वाह के अलावा भी उसके शौक, छोटी-मोटी जरूरतों का खयाल भी रखती थी। मैंने हमेशा उसे उसकेवजूद का एहसास भी कराया था।
मैं उससे नौकरानी जैसा नहीं, बल्कि छोटी बहन जैसा व्यवहार करती थी। कर्फ़्यू में एक घण्टे की ढील भी थी, इससे वो मेरी मदद भी करने लगी। अचानक पति देव जोर के दहाड़ने लगे,एक घंटे से चिल्ला रहा हूं चाय चाय, कहां हो इतनी भी कामचोरी अच्छी नहीं। न ढंग से खाना बनाना आता है ना ही घर सम्भालना। पता नहीं मां-बाप ने क्या सिखाया है? वो तो भला हो रुक्मणी का, जो मुझे खाना मिल जाता है। सही जगह पर कपड़े मिल जाते हैं। अभी जो घर का हाल बना रखा है, सिर नोचने का मन करता है। कैसी औरत हो? औरत जैसा कोई गुण नहीं। मैं तो पति का ये रुख लॉकडाउन के पहले दिन से देख रही थी, लेकिन रुक्मणी (हमारी महरी) के लिए तो संसार का आठवां अजूबा था। कहां तो उसने मेरे पति अपने साहेब के मुंह से मेरे लिए यानी उनकी पत्नी की लिए, जान, चाँद ऐसे शब्दों के सिवाय कुछ नहीं सुना था। वो बेचारी मुझे ध्यान से देखने लगी कि उसकी जिÞंदगी बदलने वाली मेमसाब की ये हालत।
जिस मेमसाब ने उसके नशा करके मारने वाले पति की पुलिस कम्प्लेन कर उसे करीब-करीब सुधार दिया था। लेकिन उन दिनों भी उसके पति ने उसके तन पर वार कर हर बार मन से माफी मांगी थी। अभी पति का कोसना बंद भी नहीं हुआ कि सासू मां का कर्कश गर्जन सुनाई दिया, कौन है? इतनी बार समझाया है कि किसी को भी मत आने दो। मरूंगी तो मैं ही ना। सुबह से बैठी हूं अभी तक नाश्ता भी तैयार नहीं हुआ और ये मैडम लॉकडाउन में भी महरी को बुला कॉन्फेरेन्स कर रही हैं।
बेचारी…रुक्मिणी सारे माहौल को अवाक देख रही थी और दिन होता तो वो बरसती मां जी पर, आज साहेब की उपस्थिति में चुप रही। हमारे घर से निकलने के बाद उसके और मां के बीच सांप और नेवले का खेल चलता है। मां कमाऊ बहू का सारा गुस्सा नौकरानी पर ही निकालती थी। उसने एक गुस्से की नजर मां पर डाली और बड़े प्यार से मुझसे कहा, दी आप ने मुझे लड़ना सिखाया, नई जिÞंदगी दी पर एक बात बोलूं पर उन दिनों भी मेरे नशेड़ी पति ने मेरे तन पर वार किया और हर बार नशा उतरने के बाद मेरे पैरों पर गिर माफी मांगी और ढेर सारा प्यार किया। मेरी आत्मा को आहत नहीं किया। यहां तो बिना नशे के साहेब और मां जी आपके दिल वजूद को चीर रहे हैं और आप चुपचाप सह रही हैं।
तन की मार को सहना आसान है लेकिन दिल, स्वाभिमान की धज्जियां.. मैं उसे पकड़ कर जोर-जोर कर रोने लगी, मेरे अपमान की पीड़ा को उसने मुझसे ज्यादा महसूस किया। मेरा रोना सुन घर सभी लोग सब काम छोड़ दौड़कर मेरे पास आ गए और पिंकी नथुने फूलाकर चिल्लाने लगी, तुम्हें कुछ सूझता भी है या नहीं, नाटक करने चली आती हो। मम्मा का आराम तुमसे देखा नहीं जाता। कभी पति की पुलिस में शिकायत तो कभी बेटी की फीस का रोना। तुम्हें मना किया था ना आने के लिए। अब मैं तुम्हें मम्मा को इस्तेमाल नहीं करने दूंगी। आ गई अपना दुखड़ा सुना मेरी प्यारी अम्मा को रुलाने। नौकरानी ना हुई महारानी एलिजाबेथ हो गई!
रुक्मिणी ने आव देखा ना ताव और दोगनी आवाज में चिल्लाने लगी,हूं मैं क्वीन एलिजाबेथ अपने दिल की और मुझे क्वीन बनाने वाली है तुम्हारी मां मेरी सुधा दी। नौकरानी, तुम्हारे मुंह से अच्छा हुआ बेबी जी मेरी औकात बता दी। तुमको छोटे से बड़ा किया, कभी सोचा ही नहीं कि तुम मेरी बेटी नहीं हो। जब-जब तुम बीमार पड़ी, अपने बच्चों को घर पर छोड़ तुम्हारा खयाल किया। तुम लोगों ने इन तीन दिनों में मेरे से बदतर अपनी मां की हालात कर दी है। मेरे पति और बच्चे घर का सारा काम कर रहे हैं कि मैं रातदिन आपके यहां खटती रहती हूं, मुझे क्वीन बना कर रखा है। चलिए दी मेरे घर चलिए मैं इन लोगों से तो आप को अच्छा रखूंगी। मैं तो केवल आपकी क्वीन हूं आप तो मेरी मां दुर्गा हैं। मैं और दुर्गा का अपमान नहीं सह सकती।
पूरा परिवार सन्न रह गया, अब रोने की बारी उनकी थी। पिंकी और बेटू मुझसे चिपक गए। पति देव की आंखें नम थीं। मैंने रुक्मणी को धन्यवाद दिया उनकी आंखें खोलने के लिए। चलो कोरोना ने जहां मुझे एहसास कराया कि मैं किस तरह अपना वजूद खोते जा रही थी, वहीं जरूर हर घर में घर को टूटने से बचाने के लिए हर औरत की कवच रुक्मणी जरूर होगी।
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