स्वच्छता: जिम्मेदारी किसकी

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Cleanliness: Whose responsibility
स्वच्छता यानी सफाई, इसे हम स्वर्ग या भगवान का दूसरा रूप कह सकते हैं। हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी स्वच्छता को विशेष स्थान दिया गया है। जहां भी पूजा-पाठ, कोई भी शुभ कार्य हो या फिर कोई भी तीज त्यौहार, सबसे पहले हम सफाई करते हैं। विश्व स्तर पर प्रदूषण यानी गंदगी को नियंत्रित करने की कवायद जारी है। जगह-जगह सम्मेलन हो रहे हैं। तरह-तरह की योजनाएं बन रही है।
भारत में स्वच्छता को लेकर काफी समय से प्रयास चल रहा है। 1986 में सेंट्रल रूरल सैनिटेशन प्रोग्राम शुरू हुआ। फिर 1999 में कंप्रिहेन्सिव रूरल सैनिटेशन प्रोग्राम शुरू हुआ। इसमें ग्रामीण क्षेत्र पर ध्यान दिया गया। सन 2003 में टोटल सैनिटेशन कैंपेन शुरू हुआ। इसमें साफ पर्यावरण व खुले में शौच पर रोक को पंचायत, गांव, ब्लॉक व जिला स्तर पर लागू किया गया। सबसे साफ व सुंदर गांव को निर्मल ग्राम पुरस्कार देने की योजना रखी गई। गांव का नाम भी निर्मल ग्राम रखा जाता था। 1 अप्रैल 2012 को निर्मल भारत अभियान की शुरूआत की गई। इसमें ग्रामीण व शहरी दोनों क्षेत्रों को लिया गया। इसमें व्यक्तिगत शौचालय, स्कूल, आंगनवाड़ी में शौचालय, ठोस व तरल कचरा प्रबंधन व समुदाय संचालित शौचालय शामिल हैं।
2 अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की गई। इसमें 62000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा तथा यह राज्य व केंद्र सरकारों में बांटा जाएगा। इसके मुख्य उद्देश्य हैं – 1. खुले में शौच को पूरी तरह खत्म करना 2.100 प्रतिषत कचरा प्रबंधन 3. सफाई के प्रति लोगों के व्यवहार में बदलाव लाना 4. नई पीढ़ी को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना 5. प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी। इस अभियान में देश के 3 मिलियन से अधिक सरकारी कर्मचारियों ने भाग लिया। देश के असंख्य लोगों ने संकल्प लिया कि वे महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के सपने में अपना योगदान देंगे। इसके साथ साथ हमारे देश के संविधान में पर्यावरण व स्वच्छता के लिए कानून बने हैं।
जैसे 1882 का इजमेंट एक्ट जो कि किसी भी संसाधन को प्रयोग करने का अधिकार देता है। 1897 का इंडियन फिशरी एक्ट मछली पकड़ने के लिए किसी चीज के प्रयोग का अधिकार देता है। 1927 का इंडियन फॉरेस्ट एक्ट इसके अंतर्गत जंगल को हर प्रकार सुरक्षित और संरक्षित रखना है। 1948 का फैक्ट्री एक्ट जो कामगारों के लिए अच्छा वातावरण प्रदान करने के लिए है। 1970 का मर्चेंट शिपिंग एक्ट जिसमें जहाज से निकली गंदगी को समुंदर के किनारे पर ही डाला जाना चाहिए ना कि समुंदर के बीच में। 1972 का वाइल्ड लाइफ प्रोटक्शन एक्ट जो सभी पशु पक्षियों की हर प्रकार से सुरक्षा जैसे कि किसी भी पशु या पक्षी को बंधक बनाया जाना वह मारना इसके अंतर्गत आते हैं प्रदान करता है। 1977 का वॉटर प्रीवेंशन एक्ट ये पानी को किसी भी प्रकार से दूषित ना करने के लिए बना है।
1982 का एटॉमिक एनर्जी एक्ट जिसमें सभी प्रकार के रेडियोधर्मी पदार्थों से फैली गंदगी से निपटना है। 1986 का एनवायरमेंट प्रोटक्शन एक्ट इसमें पर्यावरण को किसी भी प्रकार से होने वाले नुकसान से बचाना है। 1988 का मोटर व्हीकल एक्ट इसमें परिवहन द्वारा फैलने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना है। 2002 का बायोलॉजिकल डायवर्सिटी एक्ट जो जैव विविधता को हर प्रकार से संरक्षित करता है। भारत कृषि प्रधान देश है। कृषि से निकली गंदगी का ठीक से प्रबंधन ना होने के कारण वह भी प्रदूषण में मुख्य भूमिका निभा रहे है। धर्म ग्रंथों के साथ-साथ भारत के कवियों ने भी स्वच्छता के लिए काफी कुछ लिखा है। कबीर जी कहते हैं- कबीरा कूआं एक है पानी भरे अनेक, भांडे में ही भेद है पानी सब में एक। स्वच्छता सिर्फ एक दिन का काम नहीं है जैसा कि अगर हम एक दिन या एक सप्ताह स्वच्छता अभियान से जुड़े और फिर पीछे कदम हटा लें, इससे स्वच्छ भारत का सपना पूरा नहीं होगा। जरूरत है तो स्वच्छता को अपने जीवन का हिस्सा बनाने की। जैसा स्वच्छता मिशन का नारा है एक कदम स्वच्छता की ओर। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार गंदगी के कारण भारत में समय पर बिमारियां फैलती हैं और लोगों के बीमार होने के कारण काम में रुकावट आती है। प्रतिवर्ष प्रत्येक भारतीय नागरिक को औसतन 6500 का नुकसान उठाना पड़ता है। गरीब लोग ठीक से दवा नहीं ले पाते, उन्हें तो प्रतिवर्ष 12000 से 15000 तक का नुकसान होता है।
अगर हम सफाई रखें तो प्रत्येक भारतीय 6500 प्रति वर्ष होने वाले नुकसान से बच सकता है। खुले में शोच, भारत में होने वाली गंदगी का मुख्य कारण है। यह गंदगी वर्षा के साथ पानी वह आसपास के क्षेत्र में फैल जाती है तथा कई बार बीमारी या महामारी का कारण बनती है। हमें यह नहीं सोचना है कि अकेले मेरे सफाई करने से क्या फर्क पड़ता है। फर्क पड़ता है जब एक एक करके पूरे देश के लोग इकट्ठा होंगे और स्वच्छता मिशन से जुड़ेंगे, तभी तो स्वच्छ भारत की सुंदर तस्वीर तैयार कर सकते हैं। जहां हिम्मत समाप्त होती है, वहीं से हार की शुरूआत होती है। इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति को हिम्मत के साथ स्वच्छता की ओर कदम बढ़ाना है। फिर तो अपने आप लोग जुड़ते चले जाएंगे और कारवां बनता जाएगा। कौन कहता है आसमां में छेद नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों में जल, अग्नि, इंद्र को देवता माना है। यह सब इन प्राकृतिक संसाधनों की सफाई व संरक्षण हेतु किया गया है। बात आती है कि इससे छुटकारा कैसे पाया जा सकता है।

इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर यह बातें ध्यान रखनी चाहिए।

  • जहां तक संभव हो मानव को प्रकृति के निकट रहना चाहिए। ताकि कम से कम भौतिकवादी चीजों का प्रयोग हो व गंदगी कम फैले।
  • दिखावे की जिंदगी से परे हटना चाहिए। क्योंकि दिखावे में आकर हम नित नई चीजें खरीद रहे हैं व गंदगी में पुरानी चीजों का ढेर बढ़ता जा रहा है। जिससे ठोस कचरे की मात्रा दिन प्रतिदिन कई गुना बढ़ रही है।
  • खाना ताजा बनाकर खाएं उतना ही खाना बनाए जितनी जरूरत हो ताकि बचा हुआ खाना गंदगी में फेंकने की जरूरत ही ना पड़े।
  • पॉलिथीन का कम से कम या फिर मैं यह कहूं कि प्रयोग ना करें। हम खाली हाथ बाजार जाते हैं व सामान के साथ पॉलिथीन का भंडार उठा लाते हैं।
  • सामान्य दुकानों से सामान खरीदें क्योंकि मल्टीनेशनल वह ब्रांडेड शोरूम में पैकिंग के रूप में इतना थरमोकोल व पॉलिथीन सामान के साथ आ जाता है जो गंदगी का मुख्य कारण है।
  • ग्रामीण भारत में गोबर गंदगी का मुख्य कारण है। जो कि खेतों में कार्बन का मुख्य स्त्रोत है। उसे वापस खेत में पहुंचाया जाना चाहिए।
  • कृषि अपशिष्ट को खेत में ही दबाकर पुनर्चक्रण करना चाहिए ताकि भूमि की उर्वरता बढ़ाई जा सके।
  • यूज एंड थ्रो की नीति हमें बिल्कुल नहीं अपनानी चाहिए क्योंकि इसमें पुनर्चक्रण नहीं हो सकता।
  • गलनीय व अगलनीय कूड़े को अलग अलग डालना चाहिए ताकि पुनर्चक्रण में बाधा ना आए।
  • बस, रेल या अन्य किसी भी परिवहन के साधन में चलते समय गंदगी को बाहर ना फेंके। एक जगह इकट्ठा कर लें फिर स्टेशन पर पहुंच कर कूड़ेदान में डाल दें।
  • सभी भारतवासियों को अपनी मानसिकता बदल कर सच्चाई व ईमानदारी से स्वच्छता में अपनी भागीदारी निभानी होगी।
  • कसम लें ये प्रत्येक भाई भाई, रखेंगे हम अपने हर तरफ सफाईं।

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