लेख

स्वच्छता को जीवन का अंग बनाना होगा

Cleanliness must be a part of life

स्वच्छता को जीवन की आदत बनाकर ही हम इस देश के गौरव को बरकरार रख सकेंगे। स्वच्छता को अपनाकर ही हम सर्वांगीण विकास के सौपान तय कर पाएंगे। ये तमाम वो बातें हैं जिसे शायद हम सब जानते हैं लेकिन उस पर अमल नहीं करते हैं। देश के स्वच्छता कायम रखने के लिये चलाये जा रहे स्वच्छता अभियान की तस्वीर में परिवर्तन तो आया है, लेकिन मनोवांछित परिणाम अभी तक सामने नहीं आये हैं। पिछले दिनों सरकार ने राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण के नतीजे घोषित किये हैं।

सबसे स्वच्छ शहर का खिताब एक बार फिर इंदौर के नाम रहा और भोपाल सबसे स्वच्छ राजधानी वर्ग में पहले स्थान पर रहा। वहीं इस सर्वे में छत्तीसगढ़ को बेस्ट परफॉर्मेंस स्टेट अवार्ड से नवाजा गया है। 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में अहमदाबाद और पांच लाख से कम आबादी वाले शहरों में उज्जैन पहले स्थान पर रहे। देश भर में किए गये सर्वेक्षण के उपरांत गत दिवस जो परिणाम आए उनसे ये तो लगा ही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारम्भ राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन जनता के स्तर पर भी मुख्यधारा का एजेंडा बन गया है। हालांकि अभी भी इस मुहिम में सरकारी भागीदारी ही ज्यादा है लेकिन ये स्वीकार करना गलत नहीं होगा कि स्वच्छता को लेकर प्रारम्भ प्रतियोगिता ने एक उपेक्षित समझे जाने वाले विषय को प्रासंगिक बना दिया है । यद्यपि पुरस्कार बांटने मात्र से स्वच्छता नहीं लाई जा सकती।

स्वच्छता का दायरा इतना विस्तृत है कि इसे अमल में लाने के लिए कई स्तरों पर विचार करने की आवश्यकता है। मन, वाणी, कर्म, शरीर, हृदय, चित्त, समाज, परिवार, संस्कृति और व्यवहार से लेकर धर्म और विज्ञान तक में स्वच्छता का विशेष महत्व है। या कहें, बिना स्वच्छता के जीवन, परिवार, समाज, संस्कृति, राष्ट्र, विश्व और चेतना के उच्च आदर्श को प्राप्त करने के लिए स्वच्छता प्रथम सोपान है। केन्द्र में नई सरकार बनने के बाद ऐसी अनेक योजनाएं मिशन के रूप में कार्यान्वित करने का बीड़ा उठाया गया है जो सीधे-सीधे देश के प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ी हुई हैं। ये योजनाएँ व्यक्ति से होती हुईं परिवार, समाज और देश के प्रत्येक क्षेत्र तक जुड़ती हैं। इसमें स्वच्छता मिशन भी एक है। स्वच्छता को लेकर केन्द्र सरकार कितनी गम्भीर है इसे अपने चारों ओर सरकारी, अर्द्धसरकारी और गैर सरकारी कार्यों में देख सकते हैं।

भारतीय जीवनशैली में स्वच्छता का विशेष महत्व होता है। इसे संस्कार कहना भी उचित ही होगा । इसीलिए जब विश्व हैंड वॉश डे पर हाथ धोने जैसी बातें प्रचारित होती हैं तब हंसी आती है क्योंकि ये तो हमारे समाज में बचपन से ही सिखाया जाता है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों और गरीबों की बस्तियों में घर के सामने लिपाई-पुताई के जरिये सफाई रखी जाती है। बेहतर हो स्वच्छता को प्रतियोगिता और पुरस्कार से आगे बढ़ाकर दैनिक जीवन का संस्कार बनाने की मुहिम चलाई जाए। इसमें दो मत नहीं है कि इस तरह के अभियान से नागरिकों की सोच भी प्रभावित होती है। मसलन चंडीगढ़ के लोग अपने शहर को सिटी ब्यूटीफुल कहे जाने से केवल गौरवान्वित ही नहीं महसूस करते अपितु इस विशेषण को बनाए रखने के प्रति सजग भी रहते हैं ।

मप्र के इंदौर शहर में भी स्वच्छता लोगों की आदत में शुमार हुई है। ये प्रतियोगिता लोगों में जागरूकता फैलाने के लिहाज से नितांत उपयोगी और लाभदायक है लेकिन अब जरूरी हो गया है कि इस अभियान को केवल प्रतियोगिता और सर्वेक्षण से बढ़ाकर एक दैनिक क्रिया के तौर पर विकसित किया जाए । सिंगापुर एक शहर का देश है जो पांच दशक पहले तक गंदगी से पटा था किंतु वहां के प्रधानमंत्री ने खुद आगे होकर सफाई अभियान का नेतृत्व किया जिसने सिंगापुर की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल दी । जिन शहरों ने इस वर्ष बाजी मारी उनकी प्रशंसा होनी चाहिए और जो पिछड़ गए वे अगले साल के सर्वेक्षण का इंतजार किये बिना स्वच्छता को कर्तव्य के तौर पर अपना लें तो वे किसी पुरस्कार के मोहताज नहीं रहेंगे । भारत में जनसंख्या का अनुपात पिछले 10 वर्षों में मध्यम गति से तेजी के साथ बड़ा है। इसकी वजह से शहरों में अनेक घनी बस्तियाँ बसी हैं जहाँ पर स्वच्छता और विकास दोनों पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। गाँवों से आई यह आबादी शहरों में बिना किसी रहवास प्रशिक्षण के रहती है जिससे वह गन्दगी में जीने के लिए अभिशप्त होती है। इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है।

जिस प्रकार जीवन में हमने कई आदतें शामिल कर रखी हैं, उसी प्रकार स्वच्छता को भी एक आदत बनाकर जीवन में उतारने की जरूरत है। वैसे तो हम नदियों को मां का दर्जा देते हैं पर साथ ही उनमें कूड़ा कचरा डाल देते हैं, गंदगी फैलाते हैं। अब यह सोचने वाली बात है कि आखिर हम अपनी मां को किस प्रकार का सम्मान दे रहे हैं। जबकि हम नदियों को प्रदूषित कर के खुद को ही नुक्सान पहुंचाने में लगे हुए हैं। असल में स्वच्छता एक आदत है और हर व्यक्ति को इसे अपनाना चाहिए। स्वच्छता अभियान के रूप में देश में पहली बार जमीनी स्तर का कोई अभियान चलाया जा रहा है और हर व्यक्ति से इसका संबंध है। अभी तक इस दिशा में सरकारी एजेंसियों ने जो भी पहल की है वह काबिले तारीफ है।

यदि इस अभियान को सफल बनाना है तो हर व्यक्ति को इसमें शामिल होना चाहिए। अन्य देशों में सड़कों पर कूड़ा कचरा देखने को नहीं मिलता है क्योंकि वहां का हर व्यक्ति वातावरण साफ रखने को अपनी जिम्मेदारी समझता है। इस तरह की सोच भारत में भी विकसित करने की जरूरत है। जब हर व्यक्ति को लगेगा कि वातावरण को साफ रखना उसकी जिम्मेदारी है तभी हम अपने आसपास के माहौल को साफ सुथरा बना सकेंगे। लोग अपने आसपास के माहौल को साफ रखने के लिए इसमें झाड़ू भले न लगाएं पर कूड़ा न फैलाकर भी इस अभियान में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
शकील सिद्दीकी

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