चीनी बौखलाहट का परिणाम है, सैन्य झड़प

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Congress Talk About China

गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प ने चीन का वास्तविक चेहरा उजागर कर दिया है। हिसंक टकराव में भारत के 20 सैनिक व चीन के 43 सैनिकों के हताहत होने का समाचार हैं। साढे चार दशकों के बाद यह पहला अवसर है, जबकि सैन्य झड़प में इतनी बड़ी संख्या में दोनों पक्षों के सैनिक हताहत हुए हंै। इससे पहले साल 1975 में अरूणाचल प्रदेश के तुलुंग ला में हिसंक झड़प हुई थी, जिसमें असम राइफल्स के चार जवान शहीद हुए थे। भारत और चीन के बीच ताजा विवाद उस समय शुरू हुआ जब चीन की सेना ने लाइन आॅफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) से सटे पूर्वी लद्दाख के तीन स्थानों और सिक्किम में एक स्थान पर घुसपैठ की।

चीनी फौज ने पैंगोग झील, गलवान घाटी, डेमचोक और दौलतबेग ओल्डी सहित कई भारतीय क्षेत्रों में घुसपैठ कर एलएसी से सटे इलाके में सैन्य साजो-सामान जुटाना शुरू कर दिया था। भारत ने चीनी सैनिकों की इस हरकत का विरोध करते हुए उन्हें पीछे हटने के लिए कहा। इससे पहले मई माह में उत्तरी सिक्किम स्थित नाकूला सेक्टर में दोनों देशों के सैनिकों के बीच मारपीट और पत्थरबाजी की घटना हुई। हालांकी इसे स्थानीय स्तर पर हस्तक्षेप के बाद सुलझा लिया गया, लेकिन दोनों पक्षों की ओर से एलएसी पर सैनिकों की संख्या बढाने का काम जारी रहा । वर्ष 2017 में भी भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिसंक झड़प हो चुकी है, उस वक्त भी दोनों ओर के शीर्ष सैन्य अधिकारियों के दखल के बाद मामला शांत हुआ था।

वर्तमान विवाद में भी दोनों पक्षों के बीच कर्नल, और मेजर जनरल की कई दौर की बातचीत के बाद 6 जून को सीमा पर शांति और यथास्थिति बनाए रखने पर सहमति बनी थी। 6 जून को हुई चर्चा के मुताबिक ही सोमवार की रात गलवान घाटी में कर्नल बाबू ने चीन के सैनिकों को उनकी सीमा में पीछे जाने को कहा लेकिन उनके शांतिपूर्ण तरीके से बात करने के बावजूद चीन के सैनिकों ने बहस शुरू कर दी। बहस और गर्मागरमी के दौरान चीन के सैनिकों ने डंडों, पत्थरों और नुकीली चीजों से भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया। चीन भारतीय सैनिकों पर उसकी सीमा में घुसने और पहले हमला करने का आरोप लगाते हुए खुद को पीड़ित बताने की कोशिश कर रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि चीनी सैनिकों ने पत्थरबाजी कर भारत के जवानों को निशाना बनाया है।

पूरे घटनाक्रम को देखकर लगता है कि 6 जून को हुई वार्ता में सैनिकों की वापसी को लेकर जो सहमति बनी थी वह केवल वार्ता कक्ष तक ही सिमट कर रह गयी थी । मैदानी स्तर पर दोनों देशों के बीच कंही न कंही तनाव व्याप्त था, जिसका आभास भारतीय सैनिकों को नहीं था। इसी आधी अधुरी सहमति की कीमत दोनों देशों के सैनिकों को चुकानी पड़ी। सच तो यह है कि भारत और चीन के बीच एलएसी पर कई जगह विवाद है। नदियों, झीलों ओर लगातार बर्फबारी होते रहने की वजह से एलएसी की स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती है, जिसका फायदा उठाकर चीनी सैनिक अक्सर भारत की सीमा में घुस आते हैं। चीनी सेना की इन हरकतों पर अमूमन भारत यही कहता आया है कि एलएसी की अलग-अलग समझ की वजह से दोनों देशों के सैनिक जाने-अजाने एक दूसरे की सीमा लांघ जाते है। ऐसे बयानों के कारण चीन की हिम्मत बढ़ती चली गई। शुरू में वे कुछ मीटर तक घुसपैठ करते थे, अब वे कई किलोमीटर तक अंदर आने लगे हैं।

यह पहला अवसर नहीं है जबकि चीन ने भारत के साथ दगा किया है। इससे पहले भी वह अपने कुत्सित प्रयासों से हमे परिचित करवाता रहा है। ऐसे में प्रश्न यह उठ रहा है कि हमने चीनी सैनिकों के पीछे हटने और सीमा पर तनाव खत्म होने की बात कैसे स्वीकार कर ली। एक ओर प्रश्न जिस पर सामरिक हलकों में चर्चा हो रही है, वह यह है कि जब दोनों देश गलवान घाटी में पीछे हटने पर सहमत हो गए थे तो अचानक ऐसा क्या हुआ कि नौबत खूनी झड़प तक आ पहुंची। कोरोना महामारी के संक्रमण के लिए चीन पहले से ही दुनिया के निशाने पर है, ऐसे में वह भारत के विरूद्ध संघर्ष का मोर्चां खोल कर क्या हासिंल करना चाहता है।

दरअसल, पिछले कुछ दिनों से भारत जिस तरह से चीन को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा हैं, उससे चीन की बौखलाहट बढ़ गई। ताजा घुसपैठ और हिसंक झड़प चीन की इसी बौखलाहट का ही परिणाम है। पिछले साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर राज्य में धारा 370 हटाने व जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा खत्म करने के बाद जब गृहमंत्री अमितशाह ने संसद को बताया कि भारत का अगला कदम पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साई चिन को खाली कराना है। अमितशाह के इस बयान के बाद चीन को पीओके में अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीइसी) खतरे में पड़ती दिखाई देने लगी, जो कि उसके बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव का अहम हिस्सा है। इसी प्रकार पिछले दिनों भारत ने प्रत्यक्ष पूंजी निवेश (एफडीआई) के प्रावधानों में संशोधन करके चीन के वर्चस्ववादी मनसूबों पर पानी फेर दिया था।

चीन के कट्टर विरोधी आॅस्ट्रेलिया के साथ भारत के सुरक्षा समझौते से भी चीन की भ्रकुटियां तनी हुई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष पद पर भारत के केन्द्रीय स्वास्थ्यमंत्री का चुना जाना भी चीन को रास नहीं आ रहा था। उस पर भारत ने कोरोना वायरस के मूल उत्पत्ति स्थल का सच जानने के लिए स्वतंत्र जांच कमेटी बनाने की घोषणा की तो चीन के कान खड़े हो गए। भारत और अमेरिका के बीच लगातार मजबूत होते रिश्ते भी चीन को खटकने लगे थे। ऐसे में चीन सीमा विवाद को हवा देकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नेशनल पीपुल्स कांग्रेस के सत्र में भारत को चेतावनी देते हुए कहा भी था कि स्वयं को सीमित करने की रणनीति का मुकाबला करने के लिए वह सीमा पर दबाव के बिंदु तैयार कर सकता हैं। लद्दाख व सिक्किम के कुछ क्षेत्रों पर नियंत्रण करने का प्रयास उसकी इसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। दबाव की इन कार्रवाइयों का असल लक्ष्य भारत का रणनीतिक राजमार्ग है, जो एलएसी के समानान्तर दौलत बेग ओल्डी को कराकोरम दर्रे से जोड़ता है।

चीन जानता है कि इस सड़क के पूरा हो जाने से लद्दाख व खासकर विवादित अक्साईचिन सड़क पर उसका प्रभुत्व खतरे में पड़ जाएगा। चीन और उसकी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) पूर्वी लद्दाख में भारत की ओर से किए जाने वाले किसी भी निर्माण का दीर्घकालीन खतरे को तौर पर देखती हैं, इसलिए चीन किसी न किसी तरह भारतीय सेना को श्योक नदी के पश्चिम में तथा सिंधु नदी के दक्षिण में 1960 के एलएसी दावे वाली रेखा तक पीछे धकेलना चाहता है। थोड़े शब्दों में कहें तो डोकलाम में क्षेत्र विस्तार के अधूरे सपने को वह गलवान घाटी के जरिए पूरा करना चाहता है।

दो कदम आगे बढ़कर एक कदम पीछे हटना चीन की पुरानी नीति है। ऐसे में प्रश्न यह है कि चीन को रोकने के लिए भारत क्या कर सकता है। इसका एक जवाब तो यह है कि सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के जरिए मौजूदा तनाव को कम करने का प्रयास करे। यदि बातचीत से कोई खास नतीजे नहीं निकलते हैं, तो भारत को भी आक्रामक रूख अपनाना चाहिए। चीन को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए रणनीतिक रूप से जरूरी और विवादित क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में लेने की पहल भारत कर सकता है। निसंदेह इससे बडे़ टकराव की आशंका तो बढ़ेगी, हो सकता है भारत को नुकसान भी उठाना पड़े लेकिन अगले कुछ दशकों तक चीन का आक्रामक रूख अवश्य ही ठंडा पड़ जाएगा। इसके विपरीत अगर भारत चीन को पीछे धकेलने में कामयाब हो गया तो विश्व महाशक्ति की लालसा पाले रखने वाले साम्यवादी चीन की छवि को धूमिल होते देर नहीं लगेगी। रणनीतिक और कूटनीतिक मोर्चें पर भारत अभी जिस स्थिति में खड़ा है, वहां से इस तरह का स्टेंड लेना हमारे लिए गलत भी नहीं होना चाहिए।

                                                                                                              -एन.के. सोमानी

 

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