चीन-ईरान समझौता, बढ़ेगी भारत की मुश्किलें

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China-Iran Agreement

आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया चीन की विस्तारवादी नीति का नया क्षेत्र होगा। रणनीतिक रूप से अहम और अक्सर चर्चा में रहने वाले इस क्षेत्र से चीन अब तक दूर था। लेकिन पिछले दिनों उसने ईरान के साथ 400 अरब डॉलर का स्ट्रैटेजिक समझौता करके पश्चिम एशिया में धमाकेदार एंट्री की है। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के अकूत भंडार वाले इस क्षेत्र में चीन की पैठ बढ़ने से न केवल भारत बल्कि अमेरिका, इजरायल और सउदी अरब जैसे देशों की मुश्किलें भी बढ़ने वाली हैं। चीन-ईरान( स्ट्रैटेजिक समझौते) समझौते के बाद भारत-ईरान चाबहार रेल प्रोजेक्ट का खटाई में पड़ना कंही न कंही इसी बात का उदाहरण हैं।

चीन और ईरान अगले 25 वर्षों तक इस समझौते से बंधे रहेंगे। समझौते के तहत चीन ईरान में 400 बिलियन डॉलर (करीब 32 लाख करोड़ रुपए) का निवेश करेगा। 280 बिलियन डॉलर का निवेश तेल और गैस क्षेत्र में, जबकि 120 बिलियन डॉलर सड़क, रेल मार्ग, बंदरगाह तथा रक्षा सम्बन्धी क्षेत्रों में किया जायेगा। दूसरी ओर ईरान ने चीनी निवेश के बदले में उसे अगले अढ़ाई दशक तक रियायती दर पर तेल की आपूर्ति करते रहने का वचन दिया है।

अमेरिकी प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान के लिए चीन का भारी भरकम निवेश संजीवनी से कम नहीं है। हो सकता है, 400 बिलियन डॉलर के आकर्षण के चलते ईरान ने भारत के साथ रिश्तों को ताक पर रखकर चाबहार रेल प्रोजेक्ट से भारत को बाहर कर दिया हो। चीन-ईरान समझौते के बाद से ही रणनीतिक हलकों में इस बात के कयास लगाए जाने लगे थे कि ईरान की ओर से भारत को असहज करने वाला कदम कोई उठाया जा सकता है। हालांकि ईरान का कहना है कि प्रोजेक्ट के लिए निर्धारित फंड देने में देरी किए जाने के कारण भारत को इससे अलग किया गया है।

मई 2016 में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की ईरान यात्रा के दौरान आईपीजीपीएल (इंडिया पोटर््स ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड) और ईरान के आर्या बनादर निगम के बीच चाबहार बंदरगाह के विकास और संचालन संबंधी समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत ही इंडियन रेलवेज कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (इरकॉन) और ईरान के सड़क एवं रेल मार्ग विकास निगम (सीडीटीआईसी) के बीच चाबहार से 628 किमी उत्तर में स्थित जाहिदान तथा उत्तर पूर्व में ईरान-तुर्कमेनिस्तान के बार्डर पर स्थित सरख्स तक रेल मार्ग के निर्माण पर सहमति हुई थी। यह सच है कि चार साल की इस अवधि के दौरान ईरान ने भारत से इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए कई बार आग्रह किया।

हो सकता है भारत की ओर से कोई ठोस आश्वासन न मिलता देखकर ईरान ने प्रोजेक्टस से भारत को हटाने का निर्णय किया हो। रणनीतिक रूप से चाबहार रेल प्रोजेक्ट भारत के लिए काफी अहम था। इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत अपना सामान मध्य एशियाई देशों तक पहुंचा सकता था। लेकिन अब ईरान ने इस प्रोजेक्ट से भारत को अलग कर एक तरह से हमारे सरल और सुगम व्यापारीक मार्ग को अवरूद्ध कर दिया है।

देखा जाए तो अन्य पड़ोसी देशों की तरह ईरान में भी भारत की नीति कंन्फूयजन वाली रही है। आजादी के बाद भारत ने जिस स्ट्रैटिजिक अटॉनमी की नीति को अपनाया था, धीरे-धीरे उसका रंग उतरने लगा है। गुटनिरपेक्षता का हमारा सिंद्धात कमजोर पड़ चुका है। साल 2016 के भारत-अमेरिका रक्षा समझौते (लेमोआ) के बाद भारत के पड़ोसी देशों के मन में यह विश्वास और गहरा हुआ है कि भारत कंही न कंही अमेरिकी प्रभाव में आ रहा है। एक हद तक यह सही भी है। लेमोआ के बाद भारत-रूस संबंधों में भी बदलाव आया है।

अमेरिका के साथ भारत के बढ़ते रिश्तों को देखते हुए रूस को यह लगने लगा है कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अमेरिका से बड़ी मात्रा में हथियारों की खरीद कर रहा है। दो दशक पहले तक भारत 80 फीसदी रक्षा उपकरण रूस से खरीदता था जो अब घटकर 60 फीसदी रह गया है । यह एक कठोर सच्चाई है कि रूस की शर्त पर अमेरिका से संबंध बढ़ाने की नीति से भारत वैश्विक मोर्चे पर कमजोर ही हुआ है। भारत इस समय यूरेशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के दोराहे पर खड़ा है। भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके विकास का एक मार्ग यूरेशिया से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में भारत को न केवल अमेरिका बल्कि रूस और ईरान को भी साथ लेकर आगे बढ़ने की नीति पर चलना चाहिए।

चीन के बाद भारत ईरानी तेल का सबसे बड़ा ग्राहक था । प्रतिबंधों से पहले साल 2017- 18 के बीच भारत ने ईरान से 220.4 मीलियन बैरल तेल का आयात किया था। लेकिन अब अमेरिका के साथ एक तरफा रिश्ते गढते रहने के चक्कर में भारत की तेल आपूर्ति तो प्रभावित हुई ही है, भारत-ईरान संबंधों में भी ठहराव आ गया है।

चीन भला ऐसे मौके को कब हाथ से जाने देता । उसकी रणनीति बिल्कुल साफ है। वह भारत को घेरने के लिए भारत के पड़ोसी देशों में निवेश कर रहा है। पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका के बाद अब वह ईरान की माली हालत का फायदा उठाकर मध्य पूर्व में भारत के विरूद्ध नया मोर्चा तैयार कर रहा है। कोई दोराय नहीं कि आने वाले समय में चीन ईरान को अपने कर्ज जाल में फंसाकर चाबहार लीज पर लेने की कोशिश करे। अगर ऐसा होता है, तो यह भारत के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। इस आशंका की दो बड़ी वजह है।

पहली, ईरान-चीन समझौते के एक अनुच्छेद में इस बात का प्रावधान किया है कि ईरान की आधी-अधूरी या बंद पड़ी परियोजनाओं को शुरू करने का अधिकार भी चीन को होगा। ऐसे में यदि भारत चाबहार के विकास में कोताही करता है, तो चीन चाबहार के विकास की आड़ में उस पर नियंत्रण कर सकता है। द्वितीय, मीडिया खबरों की मानें तो ईरान ने पिछले साल चीन को ग्वादर बंदरगाह और चाबहार को जोड़ने का प्रस्ताव दिया था। सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण इस बंदरगाह पर यदि चीन का नियंत्रण हो जाता है, तो भारत का पश्चिम एशिया से लगता समुद्री तेल मार्ग चीन के नियंत्रण में आ जाएगा। इससे न केवल भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होगी बल्कि मध्य एशियाई देशों से संपर्को में जटिलता आ जाएगी। ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि मध्य-पूर्व में चीन को साधने के लिए भारत क्या कर सकता है।

यहां भारत के पास दो-तीन विकल्प हो सकते हैं। पहला तो यह कि भारत अमेरिकी हितों की परवाह किए बिना ईरान में निवेश की नई संभावनाओं की तलाश करे। दूसरा चीन-ईरान गठबंधन को साधने के लिए उसे अमेरिका, इजरायल और सउदी अरब जैसे देशों के साथ मिलकर मध्यपूर्व में चीन के विरूद्ध मोर्चा खोलने के लिए एंलियास बनाने के लिए आगे बढना चाहिए। चीन और ईरान अमेरिका को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं। ऐसे में भारत को यह नेरेटिव भी विकसित करना चाहिए कि दो धुर विरोधी शक्तियों के एक साथ आने से पश्चिम एशिया में शक्ति का नया केन्द्र विकसित होगा जो यकीनन अमेरिका, इजरायल और सउदी अरब को चुनौती देगा।

निसंदेह चीन-ईरान समझौते के बाद खाड़ी क्षेत्र में शक्ति के नये समीकरण विकसित होगें। भारत के पास यहां बहुत ज्यादा विकल्प भी नहीं हैं। ऐसे में भारत को मध्य-पूर्व में अपने हितों को ध्यान में रखते हुए चीन-ईरान मैत्री गठबंधन को साधने की दिशा में काम करना होगा। यहां भारत की चूक का अर्थ ईरान जैसे एक और परंपरागत मित्र कोे चीन के पाले जाने देना होगा।

                                                                                                            -एन के सोमानी

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