Children’s Ram Leela: बच्चों की राम लीला

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चच्चा चिरौंजी लाल अपनी आदतानुसार, रोज की तरह आज भी अपनी इकलौती चारपाई पर झूलते हू, जोर जोर से खर्राटे भरकर सपनों की दुनियां में सैर कर रहे थे। तभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। ‘कौन है ?’ रसोईघर में से ही चिल्लाकर चच्ची ने पूछा। अरे चच्ची, दरवाजा खोलो मैं हूँ राजू! ‘बाहर से आवाज आई।
‘आती हूँ, जरा ठहरो।’ कहकर आटे से सने हुए हाथ से ही अपना पल्लू ठीक करतीं हुई,भारी भरकम चच्ची लगभग लुढ़कती हुई दरवाजे तक आईं और धीरे से कुंडी खोल दी ।
‘चच्चा कहां हैं चच्ची’ विपिन ने पूछा ।
‘अरे, और कहाँ होंगे ? वहीं, जहाँ रोज होते हैं। लेटे होंगे अपनी झूले सी चारपाई पर! उन्हें कोई काम धाम तो है नहीं। बस, सारा दिन सोते रहते हैं । अभी उन्हें 60 बरस पूरे करने में पूरा एक साल बाकी है । लेकिन मुझे लगता है कि वह अभी से सठिया गए हैं। चच्ची नाक भौं सिकोड़ती हुई बोलीं
‘अरे चच्ची, आप भी हमारे प्यारे प्यारे चच्चा को क्या क्या कह जातीं हैं? इतने सीधे चच्चा तो चिराग लेकर ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे।’ दीपू ने मुस्कराते हुए कहा और चच्ची का उत्तर सुने बिना ही बच्चों की टोली चच्चा के बगीचे की ओर चल पड़ी ।
आज दशहरे का त्योहार था। इस बार कोरोना महामारी के कारण शहर में रामलीला नहीं हो रही थी। इसीलिए मौहल्ले के बच्चों ने मिलकर रामलीला का आयोजन किया था। खूब अच्छी रामलीला चल रही थी। लेकिन आज सुबह अचानक दिलीप के पैर में उस समय मोच आ गई, जब वह अपने घर की सीढ़ियों से उतर रहा था। बच्चों की रामलीला में रावण की भूमिका वही अदा कर रहा था । दिलीप के पैर में बहुत सूजन आ गई थी। उससे बिलकुल भी नहीं चला जा रहा था।
आज रामलीला का अंतिम दिन था। समझ में नहीं आ रहा था कि आज रावण की भूमिका कौन निभाएगा? बहुत सोच विचार के बाद सबने चच्चा चिरौंजीलाल को रावण बनाने की सोची थी। इसीलिए मोहल्ले के कुछ बच्चे उनसे अनुमति लेने आए थे ।
बगीचे में पहुंचकर बच्चों ने देखा कि चच्चा की खर्राटों की रफ़्तार रेलगाड़ी के इंजन की तरह सरपट दौड़ रही है। उनके बार-बार फूलते, पिचकते गालों को देखकर सबको हंसी आ गई। दीपू उनके कान के पास अपना मुंह ले जाकर चिल्लाया, ‘चच्चा….!’
उसकी चिल्लाहट से चच्चा ऐसे उठकर खड़े हुए, मानो सपने में कोई भूत देख लिया हो। आँखें मलते हुए अपने चारों ओर भूत की जगह बच्चों को देखकर कुछ ठीक हुए।
‘क्या है बच्चों ? क्या काम है ? सब ठीक तो है न! चच्चा ने अपने झुर्रियोंदार चेहरे पर हाथ फेरते हुए तीन प्रश्न एक साथ कर डाले ।
‘बस, कुछ मत पूछो चच्चा! हम सब मुसीबत के मारे हैं। अब तो बस आपके सहारे हैं।’ यह कहकर विपिन ने उन्हें सारी घटना सुना दी ।
सारी बात सुनकर चच्चा एक लम्बी सांस खींचकर बोले, ‘अच्छा, तो मुझे रावण बनाने के लिए आए हो। भई, मैं रावण तो बन जाऊँगा, लेकिन मुझे संवाद तो इतनी जल्दी याद नहीं होंगे। फिर मैं बोलूँगा क्या ?’
‘उसकी चिंता मत करो चच्चा! वह सब हम पर छोड़ दो।’ चच्चा की स्वीकृति देखकर राजू चहकते हुए बोला, ‘हम में से कोई परदे के पीछे से धीर-धीरे संवाद बोलता जाएगा। आप उन्हें दोहराते रहिएगा। लड़ाई के समय तो कोई संवाद बोला नहीं जाएगा।’
‘ठीक है बच्चों, आज तुम्हारा यह रावण चच्चा खूब जमकर युद्ध करेगा । लेकिन एक बात का ध्यान रखना। चच्ची को इस बात का पता नहीं लगना चाहिए। यदि चच्ची को पता लग गया और वह वहां पहुँच गईं तो मेरे मुंह से संवाद तो दूर रहे, एक शब्द भी नहीं फूटेगा।’ चच्चा धीरे से फुसफुसाते हुए बोले ।
‘ठीक है । चच्ची को कानोंकान खबर नहीं होगी कि आप रावण बन रहे हैं।’ सभी बच्चों ने एक स्वर में कहा ।
शाम को चच्चा तैयार होकर जब घर से चलने लगे तो चच्ची ने पूछा, ‘कहाँ चल दिए? आज तो ऐसे अकड़कर चल रहे हो, जैसे युद्ध करने जा रहे हो ।’ चच्ची के मुख से यह वाक्य सुनकर चच्चा सकपका गए। वह मन ही मन सोच रहे थे, ‘इस मोटी को कैसे पता लग गया कि मैं युद्ध करने जा रहा हूँ ?’ फिर धीरे से अपने गालों में हवा भरकर मुस्कराते हुए बोले, ‘युद्ध…..नहीं तो….!’ मैं कहाँ युद्ध करने जाऊँगा? मैं तो बच्चों की रामलीला देखने जा रहा था।’
‘तो मुझे भी ले चलो न! मुझे भी तो दशहरा देखने चलना है।’ चच्ची बड़े प्यार से होंठों पर मुस्कान बिखेरते हुए बोलीं ।
चच्ची की बात सुनकर चच्चा की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई । बड़ी मुश्किल से थूक निगलते हुए बोले, ‘क्या…..तुम, और मेरे साथ चलोगी? देखो, मुझे रास्ते में कुछ काम है। देर से पहुंचुंगा रामलीला में! इसलिए तुम खुद ही चली जाना।’
‘अरे, तो तुम्हारे साथ जा ही कौन रहा है? मैंने तो यूँ ही तुम्हारा मन देखने के लिए कह दिया था। उस दिन कितने प्यार से कह रहे रहे थे, ‘चलो लाजवंती, तुम्हें रामलीला दिखा लाऊं और आज जरा सा चलने के कह दिया तो प्राण सूख गए।’ चच्ची मारे गुस्से के दहाड़ती हुई बोलीं ।
चच्चा तुरंत लम्बे लम्बे डग भरते हुए ऐसे भागे, जैसे जेल से कोई कैदी भाग रहा हो। रामलीला में पहुँचने के बाद चच्चा का मेकअप किया गया। कुछ देर बाद रामलीला शुरू हुई। पर्दा खुलते ही मंच के एक कोने से चच्चा कूदते फांदते अपनी सेना के साथ आ गए। दूसरी ओर से राम की सेना भी रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी के साथ आ गई। परदे के पीछे से दीपू जो-जो संवाद बोल रहा था, चच्चा उसे दोहरा रहे थे। अभी युद्ध चल ही रहा था, कि चच्चा धड़ाम से मंच पर गिर पड़े। सभी लोग भौचक्के रह गए। राम स्वयं आश्चर्यचकित थे।
उन्होंने तो बाण मारा ही नहीं, फिर रावण कैसे मर गया? अभी कोई कुछ कहता, इससे पहले ही राजू तेजी से दौड़कर मंच पर आया और चच्चा के कान के पास अपना मुंह ले जाकर कुछ बुदबुदाने लगा। उसके कान में कुछ कहते ही चच्चा रूपी रावण तुरंत उठकर खड़ा हो गया। किसी की समझ में नहीं आया कि राजू ने कौन सा अनोखा मंत्र फूंक दिया कि रावण इतनी जल्दी पुन: उठ बैठा? युद्ध फिर से शुरू हो गया। कुछ देर बाद राम ने रावण का वध कर दिया। मंच से दूर कोने में खड़े रावण के बड़े से पुतले में राम ने आग लगा दी ।
रावण धू धू करके जलने लगा । मंच पर वापस आकर राम की भूमिका निभा रहे मनोज ने राजू से पूछा, ‘चच्चा बीच में बेहोश क्यों हो गए थे? और तूने उनके कान में कौन सा ऐसा मंत्र फूंक दिया कि वह फिर से उठकर खड़े हो गए ? मनोज की बात सुनकर राजू जोर से ठहाका लगाते हुए बोला, ‘बात दरअसल यह थी कि चच्चा ने सामने बैठी चच्ची का गुस्से से भरा चेहरा देख लिया था। इसीलिए बेहोश हो गए थे। मैंने तुरंत विपिन को भेजकर चच्ची को दूसरे कोने में बैठा दिया, जहां से चच्चा को चच्ची न दिखाई पड़ें। और फिर चच्चा के कान कह दिया कि जिन्हें आपने अभी देखा था, वह चच्ची नहीं, कोई और था। बस, चच्चा उठ खड़े हुए।’ राजू की बात सुनकर मनोज भी जोर से ठहाका लगाते हुए बोला, तेरे मंत्र से अपनी रामलीला तो पूरी हो गई, लेकिन अब चच्चा के घर पर चच्चा और चच्ची के बीच महाभारत शुरू होगी।’
-डॉ. देशबन्धु शाहजहांपुरी
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