बाल श्रम की गिरफ्त में सिसकता बचपन!

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child labor!

बचपन मानव जीवन की ऐसी अवस्था है, जहां एक बच्चे को स्वतंत्र एवं तनाव रहित जीवन जीकर पोषण तथा खेलकूद संग सीखते रहने और आगे बढ़ने की लालसा होती है। लेकिन यह विडंबना ही है कि देश में बाल श्रम के कारण अनचाहे रूप से करोड़ों बच्चों का बचपन तबाह हो रहा है। इनमें से बहुतेरे बच्चों को चोरी-छिपे बाल श्रम रूपी बेबसी के दलदल में धकेला गया है, तो कई बच्चे अनाथ होने या दयनीय पारिवारिक स्थिति की वजह से मजबूर होकर अपने बचपन को दांव पर लगाने को राजी हुए हैं।

बाल श्रम की गिरफ्त में सिसकते बचपन को चाय की दुकानों, ढाबों, होटलों और रेस्तराओं में अक्सर देखा जा सकता है!2011 की जनगणना के अनुसार देश में चौदह वर्ष से कम उम्र के सवा करोड़ से भी अधिक बाल मजदूर हैं। ये बाल-श्रमिक स्कूल जाने के बजाय पेट की आग बुझाने के लिए विभिन्न स्थानों पर कठोर श्रम करने को लाचार हैं। इन बच्चों से ईंटभट्ठों, गैरेजों, कारखानों तथा अन्य प्रतिबंधित और जोखिम भरे स्थानों पर भी काम लिया जाता है! भारतीय समाज में देश के भविष्य के रूप में देखे जाने वाले बच्चों के शोषण की यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 24 में वर्णित 14 वर्ष से कम आयु वाले बच्चे को कारखानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियोजन का प्रतिशोध तथा अनुच्छेद 21(क) के तहत निहित नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून का मुंह चिढ़ा रहा है!

बचपन बचाने के प्रति हम कितने गंभीर हैं, इसकी झलक राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा हाल ही में पेश की गई एक रिपोर्ट से होती है, जिसके मुताबिक 2017 में प्रत्येक दिन बच्चों के खिलाफ हिंसा की 350 वारदातें सामने आई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2016-2017 के बीच बाल-अपराध में 20 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं उतर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, हरियाणा और असम जैसे राज्य बच्चों के खिलाफ हिंसा में अन्य राज्यों के मुकाबले आगे रहे हैं।

झारखंड में महज एक साल के भीतर बाल अपराध में 73 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि इसी समयंतराल में मणिपुर बाल अपराध को 18 फीसद घटाने में सफल रहा है। इससे जाहिर होता है कि बचपन सहेजने का काम बहुत हद तक कागजों पर ही सिमटकर रह गया है। कुछ माह पहले अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 108वें वार्षिक अधिवेशन में सम्मिलित होने जेनेवा गये केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री संतोष गंगवार ने बाल श्रम रोकने की दिशा में भारत सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा था कि भारत को बाल श्रम से मुक्त कराने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं और हमें पूरा भरोसा है कि भारत जल्द ही ये लक्ष्य हासिल कर लेगा। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 1.4 मिलियन बच्चों को वापस पुनर्वासित किया जा चुका है।

जाहिर है, बाल श्रम की बेड़ियों में कैद होने के बाद बच्चे समाज की मुख्यधारा से दूर चले जाते हैं और ‘मानव संसाधन’ के रूप में विकसित होने से पूर्व ही राह भटक जाते हैं। देश में बचपन बचाने के लिए आगे आईं कई सामाजिक संगठनों का काम सराहनीय रहा है। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ चलाकर हजारों बच्चों को नया जीवन देने वाले कैलाश सत्यार्थी को इस कार्य के लिए 2014 में नोबेल पुरस्कार मिलने से काफी उम्मीदें बढ़ी हैं। देश में बाल श्रम की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि इसके संपूर्ण खात्मे के लिए देश को ऐसे हजारों समर्पित कैलाश सत्यार्थी की आवश्यकता है!

देश में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए अब तक ढेर सारे कानूनी उपाय किये गये हैं। समाज की मुख्यधारा से वंचित देश के करोड़ों बच्चों के भविष्य को संवारने और बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में नरेंद्र मोदी सरकार ने तीन साल पहले बाल-श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन)संशोधन कानून-2016 को अमलीजामा पहना चुकी है। बालश्रम रोकथाम अधिनियम-1986 को तीन दशक बाद संशोधित कर इसे सख्त और ताकतवर बनाने की कोशिश की गई। इस कानून को शिक्षा का अधिकार कानून-2009 से जोड़ते हुए कहा गया कि बच्चे अपने स्कूल के समय के बाद पारिवारिक व्यवसाय में घरवालों की मदद कर सकते हैं।

इस कानून में 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम करवाने और 18 साल तक के किशोरों से खतरनाक क्षेत्रों में काम लेने पर रोक का प्रावधान है। कानून के उल्लंघन पर नियोक्ता के साथ-साथ माता-पिता को भी दंडित किया जाना इस कानून की प्रमुख विशेषता रही है। अगर सही मायनों में बाल श्रम उन्मूलन के लिए बनाए गए कानूनों को सतही स्तर पर लागू किया जाता है, तो करोड़ों बच्चों के बचपन को सुरक्षित करने में सफलता मिल सकती है।

पर याद रहे, ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की थीम ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ और छह वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों के लिए लाई गई शिक्षा का अधिकार कानून तब तक सार्थक सिद्ध नहीं होगा, जब तक हमारा समाज गरीबी, बेरोजगारी व निरक्षरता के जाल से पूरी तरह मुक्त नहीं हो जाता। बालश्रम, बंधुआ मजदूरी, रंपरागत रूप से व्याप्त अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी जैसे कारक ही तय करते हैं। गौरतलब है कि 1979 में बाल श्रम अध्ययन पर गठित गुरुपाद स्वामी समिति ने अपनी रिपोर्ट में बाल श्रम उन्मूलन के लिए गरीबी दूर करना एकमात्र उपाय बतलाया था। जाहिर है, बाल श्रम के खात्मे से पूर्व सबसे पहले हमें गांवों की उन्नति हेतु बनाए गये कार्यक्रमों को जमीनी स्तर पर उतारना होगा। हर हाथ को काम मिले, हर पेट को भोजन मिले तथा समाज में स्वच्छ, स्वस्थ व सुरक्षित वातावरण का निर्माण हो;तभी जाकर कलंकित करने वाली सामाजिक समस्याएं हमारा पीछा छोड़ेंगी।

हालांकि बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में सरकार से ज्यादा अभिभावकों का योगदान सर्वोपरि साबित होगा। अभिभावकों से अपेक्षा की जाती है कि वो आर्थिक मजबूरियों को अपने बच्चों पर हावी न होने दें। अपने बच्चे को बेहतर परवरिश देकर उसके शिक्षा तथा स्वास्थ्य की व्यवस्था करें ताकि वह शिक्षित होकर अपने अधिकारों को जान सके तथा राष्ट्र-कर्तव्यों का पालन कर एक सफल नागरिक की भूमिका निभा सके। जिस उम्र में बच्चे को खिलौने और स्लेट-पैंसिल की आवश्यकता होती है, उस कच्ची उम्र में उन्हें ढाबे, होटल, ईंट-भट्ठों या औद्योगिक संयंत्रों पर किसी भी कीमत पर न भेजें। अभिभावक जितने जागरुक होंगे, स्थिति उतनी ही नियंत्रण में होगी। यही बाल श्रम उन्मूलन का मूलमंत्र है।
बाल श्रम पर रोक लगाने के लिए शिक्षा के अधिकार कानून को कारगर बनाना होगा।

हर एक बच्चा विद्यालय से जुड़कर ज्ञानार्जन कर रहा है या नहीं, सरकार और समाज को इसकी सुनिश्चितता तय करनी होगी। वे बच्चे जो अनाथ हैं, झुग्गी बस्तियों में रहते हैं या वंचित परिवारों से आते हैं, उनकी शिक्षा तथा सुरक्षा के लिए शहरों में ‘बाल शिक्षण-प्रशिक्षण केंद्र’ नाम से आवासीय विद्यालय की स्थापना की जा सकती है, जहां बच्चे रहकर ना सिर्फ पढ़ाई कर सकें, बल्कि अपनी रुचि और हूनर के अनुसार काम का प्रशिक्षण भी प्राप्त कर सके। बच्चे देश के भविष्य हैं। छोटी उम्र में उनका समाजीकरण जिस प्रकार से होगा, उससे उसका भविष्य और क्रमश: देश का भविष्य तय होगा। हमारी कोशिश बच्चों को एक सुखद बचपन देने की होनी चाहिए। देश के नौनिहालों के बाल्यावस्था को सुरक्षित किये बिना कैसे कोई बच्चा भविष्य में जाकर चाचा नेहरू और कलाम साहब के सपने को साकार कर पाएगा?
-सुधीर कुमार

 

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